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बुधवार, 12 नवंबर 2008
सोमवार, 24 दिसंबर 2007
अपनी मां भाजपा से बड़ा नहीं हूं: नरेंद्र मोदी

गुजरात विधानसभा चुनाव में भाजपा को शानदार सफलता दिलाने वाले नरेंद्र मोदी ने पार्टी से खुद को बड़ा बताए जाने पर स्पष्टीकरण देते हुए आज कहा कि वह अपनी मां भाजपा से बड़े नहीं हैं। गुजरात विधानसभा चुनाव में बड़ी जीत हासिल करने के एक दिन बाद मोदी ने पार्टी से खुद को बड़ा बताने के लिए मीडिया को आड़े हाथ लिया। ऐसा करके उन्होंने अपनी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को आश्वस्त करने की कोशिश की।
भाजपा विधायक दल का नेता चुने जाने के बाद मोदी ने अपने भाषण में कहा जो लोग यह कहते हैं कि मोदी पार्टी से बड़े हैं वे भाजपा और जनसंघ का इतिहास नहीं जानते। पुत्र कभी भी मां से बड़ा नहीं हो सकता। आरएसएस के पूर्व प्रचारक 57 वर्षीय मोदी खुद को संगठन से बड़ा बताए जाने के संबंध में मीडिया को आड़े हाथ लेते वक्त रुआंसे और भावुक हो गये। उन्होंने कहा कि यह कहना विकृत मानसकिता है कि मोदी पार्टी से बड़ा है। उन्होंने कहा कि जनसंघ के दिनों में पार्टी के उम्मीदवार ज्यादातर चुनावों में अपनी जमानत खो देते थे उस समय अनेक समर्पित कार्यकर्ताओं और परिवारों ने पार्टी की सेवा की।
मोदी ने कहा कि मेरी छवि इसलिए बड़ी लगती है क्योंकि आपका लेंस सीमित है जो मुझ पर आकर रुकता है, लेकिन अगर आप अपना फोकस बढ़ा लेंगे तो आप हजारों भाजपा कार्यकर्ताओं को देख सकेंगे जिन्होंने मुझे अपने कंधों पर उठाया है। उन्होंने कहा कि प्रमुख मीडिया का गुजरात चुनाव के नतीजों की ओर झुकाव नहीं है बल्कि वे सट्टा बाजार पर भरोसा करने के लिए प्रोत्साहित हो रहे हैं।
ंनचनिर्वाचित विधायकों को पार्टी नेता एम. वेंकैया नायडू और अरुण जेटली की उपस्थिति में संबोधित करते हुए मोदी ने कहा कि लोगों ने हमें सिर्फ सत्ताा नहीं सौंपी है बल्कि जिम्मेदारी भी सौंपी है। उन्होंने कहा कि लोगों ने उनकी पार्टी की ओर से पिछले पांच साल में किए गए कार्यों पर विचार करने के बाद भाजपा को चुना। मोदी ने कहा कि यह पुनर्निर्वाचन इस बात का पर्याप्त संकेत है कि हम सही राह पर बढ़ रहे हैं। उन्होंने कहा कि सरकार पहले की ही तरह कार्य करती रहेगी। इससे पहले नचनिर्वाचित भाजपा विधायकों ने सर्वसम्मति से नरेंद्र मोदी को यहां भाजपा विधायक दल का नेता चुना। स्रोत: प्रभासाक्षी ब्यूरो
भाजपा विधायक दल का नेता चुने जाने के बाद मोदी ने अपने भाषण में कहा जो लोग यह कहते हैं कि मोदी पार्टी से बड़े हैं वे भाजपा और जनसंघ का इतिहास नहीं जानते। पुत्र कभी भी मां से बड़ा नहीं हो सकता। आरएसएस के पूर्व प्रचारक 57 वर्षीय मोदी खुद को संगठन से बड़ा बताए जाने के संबंध में मीडिया को आड़े हाथ लेते वक्त रुआंसे और भावुक हो गये। उन्होंने कहा कि यह कहना विकृत मानसकिता है कि मोदी पार्टी से बड़ा है। उन्होंने कहा कि जनसंघ के दिनों में पार्टी के उम्मीदवार ज्यादातर चुनावों में अपनी जमानत खो देते थे उस समय अनेक समर्पित कार्यकर्ताओं और परिवारों ने पार्टी की सेवा की।
मोदी ने कहा कि मेरी छवि इसलिए बड़ी लगती है क्योंकि आपका लेंस सीमित है जो मुझ पर आकर रुकता है, लेकिन अगर आप अपना फोकस बढ़ा लेंगे तो आप हजारों भाजपा कार्यकर्ताओं को देख सकेंगे जिन्होंने मुझे अपने कंधों पर उठाया है। उन्होंने कहा कि प्रमुख मीडिया का गुजरात चुनाव के नतीजों की ओर झुकाव नहीं है बल्कि वे सट्टा बाजार पर भरोसा करने के लिए प्रोत्साहित हो रहे हैं।
ंनचनिर्वाचित विधायकों को पार्टी नेता एम. वेंकैया नायडू और अरुण जेटली की उपस्थिति में संबोधित करते हुए मोदी ने कहा कि लोगों ने हमें सिर्फ सत्ताा नहीं सौंपी है बल्कि जिम्मेदारी भी सौंपी है। उन्होंने कहा कि लोगों ने उनकी पार्टी की ओर से पिछले पांच साल में किए गए कार्यों पर विचार करने के बाद भाजपा को चुना। मोदी ने कहा कि यह पुनर्निर्वाचन इस बात का पर्याप्त संकेत है कि हम सही राह पर बढ़ रहे हैं। उन्होंने कहा कि सरकार पहले की ही तरह कार्य करती रहेगी। इससे पहले नचनिर्वाचित भाजपा विधायकों ने सर्वसम्मति से नरेंद्र मोदी को यहां भाजपा विधायक दल का नेता चुना। स्रोत: प्रभासाक्षी ब्यूरो
रविवार, 23 दिसंबर 2007
गुजरात में नकारात्मकता हारी: मोदी

अहमदाबाद: गुजरात परिणामों को नकारात्मकता की हार और सकारात्मकता की जीत बताते हुए मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सभी राजनीतिक दलों से स्वर्णिम गुजरात बनाने के लिए सहयोग की अपील की।
चुनाव परिणामों की सभी अटकलों के मुंह के बल गिरने के बाद अपने पहले संवाददाता सम्मेलन में मोदी ने अपनी जीत को 'जीतेगा गुजरात' मंत्र की जीत बताया और कहा, 'यह सकारात्मक वोट है। सरकार को दोबारा लाने का वोट है। अनेक नकारात्मक प्रचार किए गए नई तरकीबें अपनाई गईं। नए शब्दों के इस्तेमाल के बावजूद जनता ने नकारात्मकता को नकार दिया और सकारात्मकता के पक्ष में फैसला दिया।'
मोदी के चेहरे पर जीत की खुशी साफ झलक रही थी मोदी ने अपने संक्षिप्त संबोधन में कहा कि गुजरात की जनता ने गुजरात विरोधी सभी ताकतों को परास्त कर दिया और 'जीतेगा गुजरात' मंत्र को बल दिया है। उल्लेखनीय है कि कांग्रेस के 'चक दे गुजरात' चुनावी नारे के मुकाबले में बीजेपी ने 'जीतेगा गुजरात' नारा दिया था। तीसरी बार राज्य में मुख्यमंत्री बनने जा रहे मोदी ने मतदान से कुछ पहले उनके खिलाफ बगावत करने वाले पूर्व मुख्यमंत्री और पार्टी के वरिष्ठ नेता केशुभाई पटेल द्वारा बधाई दिए जाने के बारे में पूछे जाने पर कहा - मैं एडवांस में ही सबको धन्यवाद कर चुका हूं। इस बारे में बार-बार पूछे जाने पर उन्होंने केशुभाई का नाम लिए बिना कहा -मैं सभी की बधाई लेता हूं। प्रधानमंत्री ने बधाई दी है। विभिन्न राजनीतिक दलों की बधाई मिली है।
संवाददाताओं को माध्यम बनाते हुए उन्होंने कहा कि आप भी बधाई देंगे तो मैं स्वीकार करूंगा लेकिन आप पीड़ित हैं तो अलग बात है। मोदी ने कहा कि 2010 गुजरात की स्थापना का स्वर्ण जयंती वर्ष है और इसे लेकर वह आगे बढ़ना चाहते हैं। उन्होंने सभी राजनीतिक दलों गुजरात प्रेमी नागरिकों और देश विदेश में रहने वाले गुजरातियों से गुजरात को स्वर्णिम बनाने में सहयोग देने की अपील की।
मोदी: चाय बेचने से सीएम तक का सफर

छोटे से रेलवे स्टेशन पर कभी चाय बेचकर अपनी जिंदगी चलाने वाले भाजपा नेता नरेंद्र मोदी गुजरात की राजनीति में एक ऐसे क्षत्रप के रूप में उभरे हैं जो लगातार तीसरी बार राज्य का मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं जो एक रिकार्ड है।
मुख्यमंत्री के तौर पर 27 दिसंबर को पद और गोपनीयता की शपथ लेने जा रहे मोदी गोधरा कांड के बाद गुजरात में भड़के दंगों के दिनों से आज तक विपक्ष और अपने ही दल के कुछ छोटे बडे़ नेताओं की आलोचनाओं और विरोध का सामना करते आ रहे हैं। 57 वर्षीय इस नेता ने इस बार के चुनाव में सभी बाधाओं को पार करते हुए लगातार तीसरी बार मुख्यमंत्री पद अपने पास बनाए रखा।
गुजरात में आए भूकंप से मची तबाही और फिर तत्कालीन मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल के खिलाफ असंतोष उभरने पर तत्कालीन भाजपा महासचिव और पार्टी प्रवक्ता मोदी को प्राकृतिक और पार्टी के संकट से निपटने के लिए वहां मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी दे कर भेजा गया। संकटमोचक बन कर पहुंचे मोदी ने छह अक्तूबर 2001 को पटेल की जगह गुजरात के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। मुख्यमंत्री बनने के बाद मोदी ने कहा था कि वह गुजरात में एक दिवसीय मैच खेलने आए हैं लेकिन 27 फरवरी 2002 को साबरमती एक्सप्रेस अग्निकांड और उसके बाद राज्य में भड़के सांप्रदायिक दंगों ने पूरी तस्वीर ही बदल दी।
दोनों ही घटनाओं के बाद गुजरात की राजनीति का मुख्य बिंदु हिंदुत्व बन गया और मोदी उसकी केंद्रीय भूमिका में आ गए। आरएसएस के दुलारे रहे मोदी देखते ही देखते हिंदुत्व के पर्याय बन गए।
मोदी की जिंदगी का सफरनामा 17 सितंबर 1950 को मेहसाणा जिले के छोटे से वाडनगर शहर में एक निर्धन परिवार से शुरू हुआ। वह घांची समुदाय के हैं जो अन्य पिछड़ा वर्ग में आता है।
शुरू से ही दृढ़ इच्छा शक्ति रखने वाले मोदी वाडनगर रेलवे स्टेशन पर चाय बेचने और बाद में अहमदाबाद में एक कैंटीन चलाकर संघर्ष करते हुए गुजरात में सत्ता के सर्वोच्च शिखर तक पहुंचे हैं।
संघर्षो के बीच ही मोदी ने वाडनगर में अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की और आरएसएस प्रचारक रहते हुए 1980 के दशक में गुजरात विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में एमए किया। उनमें नेतृत्व क्षमता छात्र जीवन से ही दिखने लगी थी जब वह अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के नेता के रूप में उभरे।
वर्ष 1987 में संघ से भाजपा में आने के बाद मोदी के राजनीतिक जीवन की शुरुआत हुई। एक वर्ष के भीतर ही उन्हें पार्टी की गुजरात इकाई का महासचिव बना दिया गया। 1995 में उन्हें भाजपा ने दिल्ली भेजा और वह राष्ट्रीय सचिव बनाए गए।
गुजरात दंगों के लिए भारी आलोचनाओं सामना करने के बावजूद उन्होंने गौरव यात्रा निकाल कर दिसंबर 2002 के विधानसभा चुनाव में भारी बहुमत से भाजपा की झोली में जीत डाली।
22 दिसंबर 2002 को मोदी को मुख्यमंत्री पद के दूसरे कार्यकाल के लिए शपथ दिलाई गई। पहले कार्यकाल में उन्होंने जहां अपने हिंदुत्व की छवि को धार दी वहीं दूसरे कार्यकाल में वह विकास पुरुष के रूप में खुद को स्थापित करने में जुट गए।
पांच वर्ष के दूसरे कार्यकाल में मोदी ने जीवंत गुजरात का नारा दिया और बड़े पैमाने पर उद्योगपतियों तथा निवेशकों को गुजरात की ओर आकर्षित करने में सफल भी हुए। हालांकि राज्य के किसान आदिवासी और कुछ अन्य समुदाय उनकी नीतियों से नाराज भी नजर आए लेकिन एक बड़ा तबका राज्य का तेजी से औद्योगिक विकास होने के कारण खुश भी हुआ।
गुजरात में लहराया केसरिया -दैनिक जागरण

अहमदाबाद। गुजरात में आजादी के बाद से लड़ी गई सत्ता की अब तक की सबसे तीखी लड़ाई में अंतत: मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को जनता ने विजयश्री का वरण करा दिया। जनता की जय जय के साथ ही कांग्रेस को भी हारकर उनकी जयजय करनी पड़ी।
हालांकि भाजपा को सीटों का घाटा उठाना पड़ा लेकिन बहुमत के लिए जरूरी 92 के मुकाबले सीटों पर कब्जा कर लगातार तीसरी बार वह सरकार बनायेगी। विधानसभा की कुल 182 सीटों में से अब तक 106 सीटों पर कब्जा कर भाजपा ने भगवा गढ़ फतह करने के कांग्रेस के मंसूबों को धूल धूसरित कर दिया। संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी के नेतृत्व में मोदी को चुनौती दे रही पार्टी को मुकाबला नजदीकी होने की उम्मीद थी और हर दौर के मतदान के बाद एक्जिट पोल के नतीजों से उसकी आशा बढ़ रही थी लेकिन अब तक उसे केवल 55 सीटें ही मिली हैं। अन्य मात्र 4 सीट जीतने में सफल रहे है।
वर्ष 2002 में गोधरा दंगों के बाद हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 127 तथा कांग्रेस ने 51 सीटें जीती थीं और इस बार भले ही कांग्रेस की सीटों में कुछ इजाफा हो रहा हो लेकिन दोनों दलों में जीत का अंतर काफी रहेगा।
गुजरात में मुख्यमंत्री पद की हैट्रिक के संकेत मिलने के साथ ही मोदी ने अपने अंदाज में प्रसन्नता जताते हुए कहा कि वह सीएम हैं और सीएम रहेंगे।
भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने गुजरात में जबर्दस्त कामयाबी के बाद इन सुझावों को खारिज कर दिया कि मोदी को केंद्रीय राजनीति में लाया जाएगा और साफ तौर पर कहा कि लालकृष्ण आडवाणी पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बने रहेंगे।
मोदी तीसरी बार राज्य के मुख्यमंत्री पद की शपथ 27 दिसंबर को लेंगे। मणिनगर से 87 हजार से भी अधिक मतों से जीत दर्ज कर अपनी मजबूत स्थिति का अहसास करा दिया है। उन्होंने केंद्रीय मंत्री ढींढसा पटेल को शिकस्त दी है।
शुरूआती रुझानों के बीच ही नरेंद्र मोदी ने एसएमएस संदेश में कहा कि वह सीएम हैं और सीएम रहेंगे। उन्होंने सीएम का मतलब स्पष्ट करते हुए कहा कि इसका अर्थ कामन मैन है।
मोदी के मंत्रिमंडलीय सहयोगी रमनलाल वोहरा वजुभाई वाला (वित्त) तथा आनंदीबेन पटेल (शिक्षा) चुनाव जीत गए हैं।
दिल्ली से मिली खबरों के अनुसार भाजपा मुख्यालय में जहां जश्न का माहौल है वहीं मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने घुटने टेकते हुए न केवल अपनी हार स्वीकार कर ली बल्कि मोदी को बधाई दी है।
भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने चुनाव परिणामों को पार्टी की विचारधारा की जीत और मोदी के नेतृत्व में पार्टी कार्यकर्ताओं की मेहनत का परिणाम बताया वहीं भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार लालकृष्ण आडवाणी ने कहा कि गुजरात चुनावों का राष्ट्रीय राजनीति पर दूरगामी प्रभाव पड़ेगा। उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं से लोकसभा चुनावों की तैयारी में जुट जाने का भी आह्वान किया।
कांग्रेस ने गुजरात में अपनी पराजय पूरे नतीजे आने से पहले ही स्वीकार कर ली और उसके प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने दिल्ली में संवाददाताओं से कहा कि नरेंद्र मोदी की महान विजय है यह उल्लेखनीय जीत है। उनकी जीत पर मुझे कोई ईर्ष्या नहीं है।
मोदी का करिश्माई सफर

23 दिसम्बर 2007 सीएनएन-आईबीएन नई दिल्ली।
उत्तरी गुजरात के वड़नगर में 17 सितम्बर 1950 को जन्में नरेन्द्र मोदी का राजनीतिक सफर राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के प्रचारक के रूप में शुरू हुआ। उन्हें वर्ष 1972 में प्रचारक के रूप में हिमाचल प्रदेश के कागड़ा भेजा गया। उनके संगठन कौशल को देखते हुए वर्ष 1984 में उन्हें भाजपा में प्रवेश मिला। भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी के ‘प्रिय’ मोदी ने उनकी सोमनाथ यात्रा में जमकर हिस्सेदारी ली। वर्ष 1992 में उन्हें पार्टी का महासचिव बनाकर गुजरात का प्रभार सौंपा गया।
वर्ष 1995 में उन्होंने गुजरात में विधानसभा चुनाव प्रचार का प्रभारी बनाया गया। इस चुनाव में राज्य में भाजपा को विजयश्री हासिल हुई। इसके बाद मोदी को पार्टी का राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया। वर्ष 2001 में उनकी जिंदगी में उस वक्त नया मोड़ आया जब उन्हें पार्टी के केन्द्रीय नेतृत्व ने मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल की जगह गुजरात के मुख्यमंत्री पद की कुर्सी सौंप दी।
गोधरा कांड के बावजूद गुजरात की 11वीं विधानसभा के चुनावों में कांग्रेस का पत्ता साफ कर उन्होंने साबित कर दिया कि वे राजनीति के एक बड़े खिलाड़ी हैं। मोदी ने अपनी जीत को गुजरात की अस्मिता से जोड़कर रख दिया। उन्होंने कहा कि यह उनकी नहीं बल्कि गुजरात की 5 करोड़ जनता की जीत है। जब सोनिया गांधी ने उन्हें ‘मौत का सौदागर’ की उपाधि दी तो उन्होंने पलटवार करते हुए कहा कि मैं नहीं बल्कि कांग्रेसी पार्टी ‘मौत का सौदागर’है। उनका करिश्मा इस बार के चुनाव में भी साफ तौर पर दिखाई दिया। अब लोग उन्हें प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार भी बता रहे हैं। साभार- जोश18 डॉट कॉम
गुजरात में भाजपा को पूर्ण बहुमत

अहमदाबाद। भारतीय जनता पार्टी ने लगातार चौथी बार गुजरात को फतह कर लिया है। पार्टी ने ताजा समाचार मिलने तक पूर्ण बहुमत लायक सीटें भी जीत ली हैं।भाजपा ने खबर लिखे जाने तक राज्य विधानसभा की 182 सीटों में से 103 सीटें जीतकर बहुमत हासिल कर लिया। पूर्ण बहुमत के लिए 93 सीटों की जरूरत पड़ती है।
अब नरेन्द्र मोदी का तीसरी बार मुख्यमंत्री बनना तय है। उनका शपथ ग्रहण समारोह 27 नवम्बर को गांधी नगर के सरदार पटेल स्टेडियम में आयोजित किया गया है। कांग्रेस अभी तक 54 सीटों पर जीत हासिल कर चुकी है। उसे 60 या 61 सीटें मिलने की उम्मीद है। अन्य पार्टियों में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) को एक स्थान पर जीत हासिल हुई है। राज्य के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मणिनगर विधानसभा सीट पर कांग्रेस के केन्द्रीय मंत्री दिनशा पटेल को हरा दिया है। राज्य की शिक्षा मंत्री आनंदीबेन पटेल पाटन विधानसभा सीट पर चुनाव जीत गई हैं।
इधर कांग्रेस ने गुजरात विधानसभा चुनाव में अपनी हार को स्वीकार करते हुए भाजपा की जीत को ‘निराशाजनक’ बताया।विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्री कपिल सिब्बल ने कहा कि गुजरात चुनाव परिणामों से हमें गहरी निराशा हुई है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस परिणामों का अध्ययन करेगी ताकि गलती कहां हुई, इसका पता लगाया जा सके। कांग्रेस महासचिव और गुजरात के प्रभारी बी. के. हरिप्रसाद ने पार्टी की हार की जिम्मेदारी स्वीकार की है। उन्होंने कहा ‘मैं हार की जिम्मेदारी लेता हूं। यह मेरी असफलता है।’
उन्होंने इस बात को स्वीकार किया कि भाजपा असंतुष्टों के बारे पार्टी का गणित गलत साबित हुआ। पार्टी ने सोचा था कि भाजपा असंतुष्ट चुनाव में निर्णायक भूमिका निभाएंगे, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने कहा कि नरेन्द्र मोदी ने गुजरात का मॉडल राज्य बनाया है। पार्टी महासचिव अरुण जेटली ने कहा कि टीम भाजपा ने मैच जीता तथा मोदी मैन ऑफ द मैच रहे। साभार- http://www.josh18.com/
पार्टी की विचारधारा के चलते जीत हुई: राजनाथ

भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने कहा है कि गुजरात के चुनावों में पार्टी की जीत उसकी विचारधारा और राज्य में मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के कुशल नेतृत्व की जीत है। राजनाथ सिंह ने दिल्ली में भाजपा मुख्यालय में पत्रकारों को संबोधित करते हुए गुजरात के चुनाव नतीजों के लिए जनता के प्रति आभार जताया। उन्होंने अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं को चुनावी जीत के लिए बधाई दी।
श्री सिंह ने कहा कि गुजरात में भाजपा के चौथी बार सत्ताा में आने के पीछे भारतीय जनता पार्टी की विचारधारा और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व की जीत है। उन्होंने कहा कि गुजरात के चुनाव नतीजों ने यह संकेत दे दिया है कि अगर देश में कोई पार्टी सुशासन उपलब्ध करा सकती है तो वह भाजपा है। उन्होंने कहा कि श्री मोदी के नेतृत्व में भाजपा सरकार ने गुजरात को विकास के 'मॉडल राज्य' के रूप में विकसित किया है। मतदाताओं ने इसी वजह से पार्टी को जीत दिलाई। स्रोत: प्रभासाक्षी ब्यूरो
श्री सिंह ने कहा कि गुजरात में भाजपा के चौथी बार सत्ताा में आने के पीछे भारतीय जनता पार्टी की विचारधारा और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व की जीत है। उन्होंने कहा कि गुजरात के चुनाव नतीजों ने यह संकेत दे दिया है कि अगर देश में कोई पार्टी सुशासन उपलब्ध करा सकती है तो वह भाजपा है। उन्होंने कहा कि श्री मोदी के नेतृत्व में भाजपा सरकार ने गुजरात को विकास के 'मॉडल राज्य' के रूप में विकसित किया है। मतदाताओं ने इसी वजह से पार्टी को जीत दिलाई। स्रोत: प्रभासाक्षी ब्यूरो
सीएम हूं, सीएम रहूंगा: नरेंद्र मोदी का एसएमएस

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आज 'मुख्यमंत्री हूं- मुख्यमंत्री रहूंगा' का एसएमएस जारी कर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कटाक्ष का जवाब दिया। प्रधानमंत्री ने पिछले दिनों गुजरात चुनाव प्रचार के दौरान कहा था कि विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी को भाजपा ने नरेन्द्र मोदी के डर से लोकसभा चुनाव से पहले ही प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया है। इस बीच राजनीतिक खेमों में ऐसी अटकलें जाहिर की जाने लगी थीं कि दो बार राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके मोदी गुजरात में पार्टी की जीत सुनिश्चित करने के बाद शायद केन्द्र की राजनीति में जाना पसंद करेंगे। लेकिन श्री मोदी ने आज यह एसएमएस जारी कर इन अटकलों पर विराम लगा दिया।
नरेंद्र मोदी ने अपने एसएमएस में सीएम का अर्थ समझाते हुए कहा है सीएम मतलब कामन मैन। मोदी के इस अप्रत्याशित एसएमएस के बारे में पूछे जाने पर भाजपा संसदीय दल के नेता विजय कुमार मल्होत्रा ने कहा कि मीडिया और कुछ राजनीतिक दलों की व्यर्थ की अटकलों पर श्री मोदी की यह टिप्पणी है। यह पूछे जाने पर कि क्या मोदी गुजरात में अपना सिक्का जमा लेने के बाद केन्द्र की राजनीति में दबदबा बढ़ाने का प्रयास नहीं करेंगे, मल्होत्रा ने कहा कि मोदी खुद इस का जवाब दे चुके हैं। यह कहे जाने पर कि क्या पांच वर्ष बाद भी यही स्थिति रहेगी, मल्होत्रा ने कहा कि पांच साल अभी बहुत दूर हैं। स्रोत: प्रभासाक्षी ब्यूरो
नरेंद्र मोदी ने अपने एसएमएस में सीएम का अर्थ समझाते हुए कहा है सीएम मतलब कामन मैन। मोदी के इस अप्रत्याशित एसएमएस के बारे में पूछे जाने पर भाजपा संसदीय दल के नेता विजय कुमार मल्होत्रा ने कहा कि मीडिया और कुछ राजनीतिक दलों की व्यर्थ की अटकलों पर श्री मोदी की यह टिप्पणी है। यह पूछे जाने पर कि क्या मोदी गुजरात में अपना सिक्का जमा लेने के बाद केन्द्र की राजनीति में दबदबा बढ़ाने का प्रयास नहीं करेंगे, मल्होत्रा ने कहा कि मोदी खुद इस का जवाब दे चुके हैं। यह कहे जाने पर कि क्या पांच वर्ष बाद भी यही स्थिति रहेगी, मल्होत्रा ने कहा कि पांच साल अभी बहुत दूर हैं। स्रोत: प्रभासाक्षी ब्यूरो
गुजरात में भाजपा का परचम लहराया
गुजरात विधानसभा के लिए हुए चुनावों के शुरूआती रुझानों और नतीजों से जाहिर हो गया है कि राज्य में भारतीय जनता पार्टी एक बार फिर बहुमत पाकर सरकार बनाने जा रही है। अब तक मिले रुझानों में भाजपा कांग्रेस से काफी आगे चल रही है। गुजरात विधानसभा की 182 सीटों के लिए चुनाव हुए थे। इन सभी स्थानों के रुझान उपलब्ध हैं जिनमें से 120 भाजपा और 57 कांग्रेस के पक्ष में हैं। अन्य दलों और उम्मीदवारों को 5 स्थानों पर बढ़त मिलती दिखाई दे रही है। प्रदेश विधानसभा में बहुमत हासिल करने के लिए 92 सीटों की जरूरत है। स्रोत: प्रभासाक्षी ब्यूरो
बुधवार, 19 दिसंबर 2007
मौत के सौदागर- मैंने ऐसा तो नहीं कहा था
लेखक- डॉ. सूर्य प्रकाश अग्रवाल
गुजरात में विधानसभा के चुनावों की सुगबुगाहट शुरु होते ही गुजरात में सोहराबुददीन की पुलिस मुठभेड में मौत को लेकर जिस प्रकार कांग्रेस ने संसद में भाजपा सहित गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की छिछालेदर कर के राजनीतिक लाभ प्राप्त करने की असफल कोशिश की थी वैसा भारतीय राजनीतिक इतिहास में दूसरा कोई उदाहरण नहीं मिलता। इसमें कुछ मीडिया चैनलों ने सुबह से सायं तक इस प्रलाप में कांग्रेस का साथ दिया। चुनाव के प्रचार में कांग्रेस का सदैव यही प्रयास रहा कि गुजरात में किस प्रकार अल्पसंख्यकों के वोटों पर कब्जा किया जाय। इसके लिए कांग्रेस ने नरेन्द्र मोदी को सोहराबुददीन की मुठभेड में हुई मौत के लिए दोषी ठहराते हुए उनको मौत का सौदागर ही कह कर अल्पसंख्यकों में बहुसंख्यकों के प्रति द्वेष फैला व असुरक्षा का वातावरण पैदा कर दूसरी बार राजनीतिक लाभ प्राप्त करने की कोशिश की। जब वोटों के इस खेल में कांग्रेस असफल रही तो फौरन अपने बयान से मुकर कर ऐसा कहा गया कि मैने ऐसा तो नहीं कहा । कांग्रेस की अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गांधी ने अपने भाषण में गुजरात के शासकों को मौत का सौदागर करार दिया था। कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल ने कहा कि श्रीमती सोनिया गांधी का आशय मोदी नहीं थे। कपिल सिब्बल की इस विचारधारा से स्वयं उनके लिए ही खतरा उत्पन्न हो गया। कांग्रेस का मानना है कि कपिल सिब्बल जो भी मुंह में आता है, बोल देते हैं जिससे उन्हें अब पार्टी के कामकाज से दूर रखने का ही फैसला हो गया है और हो सकता है कि गुजरात में कांग्रेस की पराजय का ठीकरा कपिल सिब्बल के ही सिर पर फोड दिया जाय और परिणामस्वरुप उन्हें केन्द्रीय मंत्री पद ही छोडना पडे।
यह सर्वविदित है कि आतंकवाद फैलाने में कांग्रेस की मुस्लिम तुष्टीकरण की नीतियां ही दोषी रही हैं । आतंकवादी हजारों की संख्या में निर्दोष लोगों की हत्या कर रहे हैं, उन्हें तो मौत के सौदागर नहीं कहा गया, उनके साथ तो नरम रुख अख्तियार करते हुए उन्हें फांसी के फंदे से बचाये जाने की हर सम्भव कोशिश की जा रही है। देश के गृहमंत्री शिवराज पाटिल ने आतंकवादियों के सम्मुख हताश होकर बयान दिया कि आतंकवादी देश के किसी भी कोने में कभी भी आतंकवादी कार्रवाई कर सकते है और सरकार कोई प्रभावपूर्ण कार्रवाई करने में असमर्थ है। सरकार निरीह प्राणी की तरह कुछ भी नहीं कर सकती है। उनके बयान से पुलिस सहित सेना का मनोबल भी गिरा है। देश के प्रत्येक राज्य की पुलिस व देश की सेना में अब भी दमखम है कि यदि राजनेता मुस्लिम तुष्टीकरण की अपनी राजनीति छोड कर सुरक्षाबलों के बंधे हाथ खोल दें तो महीने भर में नहीं अपितु ज्यादा से ज्याद एक सप्ताह में ही देश के प्रत्येंक कोने में फैले आतंकवादी चूहे की तरह बिल में घुसते हुए नजर आएंगे । अलगाववाद सदा-सदा के लिए नेस्तनाबूद हो जायेगा। नरेन्द्र मोदी ने अपने दोनों कार्यकाल किस प्रकार गुजारे है? यह गुजारात की जनता उन्हें इन चुनावों में बता देगी।
'मौत के सौदागर' पर राजनेता बयानबाजी कर रहे है। उन्हें गुजरात के विकास व औद्योगिक उन्नति से कुछ लेना देना नहीं। 'मौत के सौदागर' तो कोई भी हो सकता है । भारत में जनता कभी भी ऐसे नेता का समर्थन नहीं करती है जो मौत का सौदागर हो। मौत के सौदागर शब्द का प्रयोग उन आतंकवादियों के लिए किया जाना चाहिए जो बम से देखते ही देखते हंसते-खिलखिलाते निर्दोष लोगों को चिथडे करके हवा में उडा देते है। मौत के सौदागर वे लोग है जिन्होंने उत्तरप्रदेश की न्याय व्यवस्था को ध्वंस व भंग करते हुए राज्य की अदालतों में बम विस्फोट किये व दर्जनों लोगों को मौत की नींद सुला दिया। मौत के सौदागर वे लोग है जिन्होंने नवयुवकों को बहलाफुसला कर गुमराह करके आतंकवाद की राह पर धकेल दिया। मौत के सौदागर वे लोग है जो हवाई जहाज को कब्जे में लेकर यात्रियों की जिन्दगियों का सौदा अपने आतंकवादी साथियों को जेल से छुडाने के लिए करते है। मौत के सौदागर वे लोग है जो भारत के लोकतंत्र के मंदिर संसद में घुस कर हमला करते है। मौत के सौदागर वे लोग है जो दोषी ठहराये गये आतंकवादी की फांसी की सजा को माफ करने के चक्कर में है। मौत के सौदागर वे लोग है जो देश के लोगों की सुरक्षा की जिम्मेदारी निभाने के प्रति आतंकवादी व आतंकवाद को राजनीतिक उद्देश्यों के लिए रोकने में स्वंय को अक्षम महसूस करते है और कुर्सी भी छोडते हैं।
नरेन्द्र मोदी ने अपनी सफाई दी कि मैंने कभी कोई ऐसी बात अपने भाषण में चुनाव प्रचार के दौरान नहीं कही जो उच्चतम न्यायालय में गुजरात सरकार की तरफ से पेश हलफनामें के विपरीत हो, मैं पहले भी अपनी स्थिति स्पष्ट कर चुका हूं कि मैं फर्जी मुठभेडों का समर्थन नहीं करता हूं। मोदी के भाषण को समग्रता से पढे जाने की आवश्यकता है। वे तो श्रीमती सोनिया गांधी की टिप्पणी का जबाब दे रहे थे। मोदी ने अपने भाषण को पूरी तरह आतंकवाद के खिलाफ बताते हुए कहा कि निश्चित तौर पर निर्वाचन आयोग की यह नीति नहीं होगी कि उनके (श्रीमती सोनिया गांधी ) बयान से हुए आचार संहिता के उल्लंघन को नजरांदाज कर दे और सोनिया गांधी के बयान के जबाब में दिये गये मेरे राजनैतिक जबाब को सेंसर करे। निर्वाचन आयोग के द्वारा दिये गये नोटिस को आयोग द्वारा वापस ले लेने की मांग करते हुए मोदी ने कहा कि मैनें कभी भी और खास कर सोहराबुद्दीन शेख की मुठभेड को तर्कसंगत नहीं ठहराया। भाजपा के नेता अरुण जेटली ने कहा कि आयोग ने सोहराबुद्दीन शेख की फर्जी मुठभेड में कत्ल को कथित तौर पर सही ठहराने वाले जिस भाषण के लिए मोदी को नोटिस भेजा था, उसे संदर्भ से काट कर पेश किया गया था। सोनिया गांधी व नरेन्द्र मोदी के बयानों को मीडिया ने तोड मरोड कर प्रचारित किया। नरेन्द्र मोदी सहित भाजपा का मानना है कि आयोग मोदी के जबाब से संतुष्ट हो जायेगा और तब तेज गति से खबरें देने वाले इन न्यूज चैनलों की क्या गत बनेगी? जिन्होंने सोनिया गांधी की चमचागिरी करते हुए नरेन्द्र मोदी के बयान को गलत ढंग से पेश किया परन्तु खबरों को गलत व गैर जिम्मेदाराना ढंग से पेश करने वालों को इसका कोई अफसोस भी नहीं होगा।
निर्वाचन आयोग ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी से कहा था कि 4 दिसम्बर 2007 को मंगरौल में उनका भाषण उसके सामने आया और एक सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड ने शिकायत करते हुए नरेन्द्र मोदी पर आरोप लगाया कि यह हिंसा को खुले आम प्रोत्साहन देने वाला तथा राजनैतिक लाभ के लिए धर्म का दुरुपयोग करने वाला है। आयोग को लगा कि प्रथम दृष्टया भाषण में दिवंगत सोहराबुद्दीन का उल्लेख और उसका नाम आतंकवाद से जोडना, व्याप्त मतभेदों को बढाने, पारस्परिक घृणा उत्पन्न करने और विभिन्न समुदायों के बीच तनाव पैदा करने वाला है तथा इससे चुनाव की आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन होता है। नरेन्द्र मोदी ने इस नोटिस का जबाब दे दिया तथा भाजपा ने निर्वाचन आयोग में शिकायत की कि 1 दिसम्बर 2007 को चुनाव सभा में श्रीमती सोनिया गांधी ने आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग किया था। निर्वाचन आयोग ने कांग्रेस की अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गांधी के इस भाषण का ब्यौरा तलब किया है। अब जब लगा कि सोनिया के इस बयान से नरेन्द्र मोदी को लाभ मिल सकता है तो कांग्रेस की तरफ से कहा गया कि सोनिया गांधी ने ऐसाश् तो नहीं कहा। उन्होंने तो शासन की व्यवस्था पर सवाल उठाया था। कांग्रेस को गुजरात के हिन्दुओं की चिन्ता नहीं परन्तु उसको तो इस्लामिक आतंकवाद जिसको जिहाद का नाम देकर व बम फोड कर निर्दोष लोगों की हत्याऐं की जाती है,, उन आतंकवादियों की ज्यादा चिन्ता है जिन्होंने मानवाधिकारों का जबरदस्त उल्लंघन किया है।
गुजरात में नरेन्द्र मोदी ने अपने दो कार्यकालों में गुजरात में किये गये विकास के कार्यों के आधार पर चुनाव लडना तय किया था परन्तु सोहराबुद्दीन मामले को कांग्रेस ने संसद सहित गुजरात में भी उछाल दिया जिससे नरेन्द्र मोदी ने भी अपनी चुनावी रणनीति बदल कर हिन्दू-मुस्लिम के बीच ही नीति तय कर दी जिससे तथाकथित धर्मनिरपेक्षवादी राजनीतिक ताकतें विचलित हो गयी। गुजरात में वर्ष 2002 में गोधराकाण्ड में हिन्दुओं के मारे जाने से उपजी हिंसा में मुस्लिमों के मारे जाने के बाद तथाकथित धर्मनिरपेक्षवादियों के निशाने पर नरेन्द्र मादी है। परन्तु नरेन्द्र मोदी एक कुशल प्रशासक होने के साथ साथ स्वच्छ छवि के राजनेता भी है। इसी स्वच्छ छवि के सहारे उन्होंने गुजरात के बाहर से बडी मात्रा में विनिवेश आकर्षित किया तथा सम्पूर्ण देश में गुजरात को उन्होंने तेजी से प्रगति के मार्ग पर अग्रसर होने वाला सर्वोत्तम प्रदेश बना दिया। बडे पैमाने पर हुए इस विनियोग (जो मुख्यत: रिलाइन्स व एस्सार के तेल क्षेत्र में ही था) से अपेक्षाकृत रोजगार के कम अवसर उत्पन्न हुए जिससे ग्रामीण क्षेत्र के लोग मोदी के इस आर्थिक विकास के सिध्दांत को समझ नहीं पाये। गुजरात में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में भी बढोत्तरी हुई। विपक्षी दलों ने रोजगार के उत्पन्न हुए कम अवसर व बढती मंहगाई को नरेन्द्र मोदी के विरुध्द अस्त्र बनाया। इधर उत्तराखण्ड, पंजाब व उत्तरप्रदेश में शासित रही पार्टियां चुनावों में पराजित हो गयी। इस आधार पर मोदी को भी अपनी वापसी खतरे में पडी दिखाई दीं । स्वंय उनकी ही भाजपा के नेता सुरेश मेहता व केशू भाई पटेल उनके लिए गड्ढ़ा खोद रहे थे। भाजपा ने गुजरात में गत तीन चुनाव जीते हैं । यदि चौथी बार जीतना है तो कडी मेहनत तो करनी ही पडेगी क्योंकि पश्चिमी बंगाल के अलावा भारत के किसी भी राज्य में लगातार चौथी बार एक ही दल सत्ता में नहीं आया है। सोनिया के मौत के सौदागर के बयान से नरेन्द्र मोदी को ही फायदा मिलता नजर आने लगा है रही सही कसर निर्वाचन आयोग ने सोनिया व नरेन्द्र मोदी को नोटिस भेज कर मौत के सौदागर वाले बयान को पर्याप्त प्रचार देकर पूरी कर दी है।
नरेन्द्र मोदी ने हिन्दुओं से अपील की है कि इस्लामिक आतंकवादियों ने भारत में पिछले तीन वर्षों में 5,617 लोगों को अपनी आतंकवादी घटनाओं में मार दिया है जबकि गुजरात में केवल एक ही व्यक्ति आतंकवादियों के द्वारा मारा गया है। भाजपा ने ही गुजरातवासियों की रक्षा की है। कांग्रेस ने पोटा को हटा कर आतंकवाद को बढाने में सहयोग दिया है। पंजाब में खालिस्तान के लिए सिख आतंकवाद उस समय पनपा जब कांग्रेस शासन में थी। कश्मीर में निर्दोष लोगों के साथ साथ सेना पर आतंकवादी हमले करके हजारों लोगों को मारा जा रहा है जबकि वहां कांग्रेस की सरकार है। पश्चिमी बंगाल में कम्युनिस्ट पार्टी ने लोगों के मौलिक व संवैधानिक अधिकारों को नजरादांज करके नन्दीग्राम जैसी भयंकर घटनाओं को अंजाम दिया तथा नक्सली आतंकवाद पनपा वहां भी कांग्रेस का सीधा सीधा शासन नहीं परन्तु फिर भी केन्द्र में सरकार चलाने के लिए कांग्रेस को वामपंथियों की बैसाखी के सहारे की आवश्यकता है इसलिए पश्चिमी बंगाल में आतंकवाद को रोकने में कांग्रेस चुप्पी साधे हुई है। उत्तरप्रदेश में भी आतंकवादियों ने अपनी गतिविधियां बढायी हैं। वहां की बसपा सरकार को कांग्रेस का समर्थन प्राप्त है क्योंकि राष्ट्रपति के चुनाव में कांग्रेस ने बसपा का साथ ग्रहण किया था अत: उसके अहसान तो उतारने पडेंगे ही।
आंतकवाद के बढने के लिए किसी भी दल व शासन तंत्र को दोष देकर उसको 'मौत के सौदागर' ठहराना कतई ठीक नहीं है। आंतकवादी घटनाओं को रोकना सुरक्षा बलों का मामला होता है उसी के ऊपर छोडना चाहिए व आतंकवाद के रोकने के मामले में राजनीतिक हस्तक्षेप बिल्कुल भी नहीं किया जाना चाहिए। आवश्यकता इस बात की है कि सभी दल राष्ट्रवाद के सहारे आतंकवाद से लडें। पुलिस व सेना के बंधे हाथ खोलें। आतंकवादियों से निपटने के लिए कुछ कुर्बानी तो देनी ही पडेगी। पुलिस व सेना जब आतंकवादियों के प्रति सख्त व तेजी से कार्यवाही करेगी तभी आतंकवादियों के बढते हौसले रुक पायेंगें। राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण पुलिस व सेना का मनोबल टूटता है जिससे आतंकवादियों के हौसले बुलन्द होते है।
(नवोत्थान लेख सेवा हिन्दुस्थान समाचार)
गुजरात में विधानसभा के चुनावों की सुगबुगाहट शुरु होते ही गुजरात में सोहराबुददीन की पुलिस मुठभेड में मौत को लेकर जिस प्रकार कांग्रेस ने संसद में भाजपा सहित गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की छिछालेदर कर के राजनीतिक लाभ प्राप्त करने की असफल कोशिश की थी वैसा भारतीय राजनीतिक इतिहास में दूसरा कोई उदाहरण नहीं मिलता। इसमें कुछ मीडिया चैनलों ने सुबह से सायं तक इस प्रलाप में कांग्रेस का साथ दिया। चुनाव के प्रचार में कांग्रेस का सदैव यही प्रयास रहा कि गुजरात में किस प्रकार अल्पसंख्यकों के वोटों पर कब्जा किया जाय। इसके लिए कांग्रेस ने नरेन्द्र मोदी को सोहराबुददीन की मुठभेड में हुई मौत के लिए दोषी ठहराते हुए उनको मौत का सौदागर ही कह कर अल्पसंख्यकों में बहुसंख्यकों के प्रति द्वेष फैला व असुरक्षा का वातावरण पैदा कर दूसरी बार राजनीतिक लाभ प्राप्त करने की कोशिश की। जब वोटों के इस खेल में कांग्रेस असफल रही तो फौरन अपने बयान से मुकर कर ऐसा कहा गया कि मैने ऐसा तो नहीं कहा । कांग्रेस की अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गांधी ने अपने भाषण में गुजरात के शासकों को मौत का सौदागर करार दिया था। कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल ने कहा कि श्रीमती सोनिया गांधी का आशय मोदी नहीं थे। कपिल सिब्बल की इस विचारधारा से स्वयं उनके लिए ही खतरा उत्पन्न हो गया। कांग्रेस का मानना है कि कपिल सिब्बल जो भी मुंह में आता है, बोल देते हैं जिससे उन्हें अब पार्टी के कामकाज से दूर रखने का ही फैसला हो गया है और हो सकता है कि गुजरात में कांग्रेस की पराजय का ठीकरा कपिल सिब्बल के ही सिर पर फोड दिया जाय और परिणामस्वरुप उन्हें केन्द्रीय मंत्री पद ही छोडना पडे।
यह सर्वविदित है कि आतंकवाद फैलाने में कांग्रेस की मुस्लिम तुष्टीकरण की नीतियां ही दोषी रही हैं । आतंकवादी हजारों की संख्या में निर्दोष लोगों की हत्या कर रहे हैं, उन्हें तो मौत के सौदागर नहीं कहा गया, उनके साथ तो नरम रुख अख्तियार करते हुए उन्हें फांसी के फंदे से बचाये जाने की हर सम्भव कोशिश की जा रही है। देश के गृहमंत्री शिवराज पाटिल ने आतंकवादियों के सम्मुख हताश होकर बयान दिया कि आतंकवादी देश के किसी भी कोने में कभी भी आतंकवादी कार्रवाई कर सकते है और सरकार कोई प्रभावपूर्ण कार्रवाई करने में असमर्थ है। सरकार निरीह प्राणी की तरह कुछ भी नहीं कर सकती है। उनके बयान से पुलिस सहित सेना का मनोबल भी गिरा है। देश के प्रत्येक राज्य की पुलिस व देश की सेना में अब भी दमखम है कि यदि राजनेता मुस्लिम तुष्टीकरण की अपनी राजनीति छोड कर सुरक्षाबलों के बंधे हाथ खोल दें तो महीने भर में नहीं अपितु ज्यादा से ज्याद एक सप्ताह में ही देश के प्रत्येंक कोने में फैले आतंकवादी चूहे की तरह बिल में घुसते हुए नजर आएंगे । अलगाववाद सदा-सदा के लिए नेस्तनाबूद हो जायेगा। नरेन्द्र मोदी ने अपने दोनों कार्यकाल किस प्रकार गुजारे है? यह गुजारात की जनता उन्हें इन चुनावों में बता देगी।
'मौत के सौदागर' पर राजनेता बयानबाजी कर रहे है। उन्हें गुजरात के विकास व औद्योगिक उन्नति से कुछ लेना देना नहीं। 'मौत के सौदागर' तो कोई भी हो सकता है । भारत में जनता कभी भी ऐसे नेता का समर्थन नहीं करती है जो मौत का सौदागर हो। मौत के सौदागर शब्द का प्रयोग उन आतंकवादियों के लिए किया जाना चाहिए जो बम से देखते ही देखते हंसते-खिलखिलाते निर्दोष लोगों को चिथडे करके हवा में उडा देते है। मौत के सौदागर वे लोग है जिन्होंने उत्तरप्रदेश की न्याय व्यवस्था को ध्वंस व भंग करते हुए राज्य की अदालतों में बम विस्फोट किये व दर्जनों लोगों को मौत की नींद सुला दिया। मौत के सौदागर वे लोग है जिन्होंने नवयुवकों को बहलाफुसला कर गुमराह करके आतंकवाद की राह पर धकेल दिया। मौत के सौदागर वे लोग है जो हवाई जहाज को कब्जे में लेकर यात्रियों की जिन्दगियों का सौदा अपने आतंकवादी साथियों को जेल से छुडाने के लिए करते है। मौत के सौदागर वे लोग है जो भारत के लोकतंत्र के मंदिर संसद में घुस कर हमला करते है। मौत के सौदागर वे लोग है जो दोषी ठहराये गये आतंकवादी की फांसी की सजा को माफ करने के चक्कर में है। मौत के सौदागर वे लोग है जो देश के लोगों की सुरक्षा की जिम्मेदारी निभाने के प्रति आतंकवादी व आतंकवाद को राजनीतिक उद्देश्यों के लिए रोकने में स्वंय को अक्षम महसूस करते है और कुर्सी भी छोडते हैं।
नरेन्द्र मोदी ने अपनी सफाई दी कि मैंने कभी कोई ऐसी बात अपने भाषण में चुनाव प्रचार के दौरान नहीं कही जो उच्चतम न्यायालय में गुजरात सरकार की तरफ से पेश हलफनामें के विपरीत हो, मैं पहले भी अपनी स्थिति स्पष्ट कर चुका हूं कि मैं फर्जी मुठभेडों का समर्थन नहीं करता हूं। मोदी के भाषण को समग्रता से पढे जाने की आवश्यकता है। वे तो श्रीमती सोनिया गांधी की टिप्पणी का जबाब दे रहे थे। मोदी ने अपने भाषण को पूरी तरह आतंकवाद के खिलाफ बताते हुए कहा कि निश्चित तौर पर निर्वाचन आयोग की यह नीति नहीं होगी कि उनके (श्रीमती सोनिया गांधी ) बयान से हुए आचार संहिता के उल्लंघन को नजरांदाज कर दे और सोनिया गांधी के बयान के जबाब में दिये गये मेरे राजनैतिक जबाब को सेंसर करे। निर्वाचन आयोग के द्वारा दिये गये नोटिस को आयोग द्वारा वापस ले लेने की मांग करते हुए मोदी ने कहा कि मैनें कभी भी और खास कर सोहराबुद्दीन शेख की मुठभेड को तर्कसंगत नहीं ठहराया। भाजपा के नेता अरुण जेटली ने कहा कि आयोग ने सोहराबुद्दीन शेख की फर्जी मुठभेड में कत्ल को कथित तौर पर सही ठहराने वाले जिस भाषण के लिए मोदी को नोटिस भेजा था, उसे संदर्भ से काट कर पेश किया गया था। सोनिया गांधी व नरेन्द्र मोदी के बयानों को मीडिया ने तोड मरोड कर प्रचारित किया। नरेन्द्र मोदी सहित भाजपा का मानना है कि आयोग मोदी के जबाब से संतुष्ट हो जायेगा और तब तेज गति से खबरें देने वाले इन न्यूज चैनलों की क्या गत बनेगी? जिन्होंने सोनिया गांधी की चमचागिरी करते हुए नरेन्द्र मोदी के बयान को गलत ढंग से पेश किया परन्तु खबरों को गलत व गैर जिम्मेदाराना ढंग से पेश करने वालों को इसका कोई अफसोस भी नहीं होगा।
निर्वाचन आयोग ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी से कहा था कि 4 दिसम्बर 2007 को मंगरौल में उनका भाषण उसके सामने आया और एक सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड ने शिकायत करते हुए नरेन्द्र मोदी पर आरोप लगाया कि यह हिंसा को खुले आम प्रोत्साहन देने वाला तथा राजनैतिक लाभ के लिए धर्म का दुरुपयोग करने वाला है। आयोग को लगा कि प्रथम दृष्टया भाषण में दिवंगत सोहराबुद्दीन का उल्लेख और उसका नाम आतंकवाद से जोडना, व्याप्त मतभेदों को बढाने, पारस्परिक घृणा उत्पन्न करने और विभिन्न समुदायों के बीच तनाव पैदा करने वाला है तथा इससे चुनाव की आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन होता है। नरेन्द्र मोदी ने इस नोटिस का जबाब दे दिया तथा भाजपा ने निर्वाचन आयोग में शिकायत की कि 1 दिसम्बर 2007 को चुनाव सभा में श्रीमती सोनिया गांधी ने आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग किया था। निर्वाचन आयोग ने कांग्रेस की अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गांधी के इस भाषण का ब्यौरा तलब किया है। अब जब लगा कि सोनिया के इस बयान से नरेन्द्र मोदी को लाभ मिल सकता है तो कांग्रेस की तरफ से कहा गया कि सोनिया गांधी ने ऐसाश् तो नहीं कहा। उन्होंने तो शासन की व्यवस्था पर सवाल उठाया था। कांग्रेस को गुजरात के हिन्दुओं की चिन्ता नहीं परन्तु उसको तो इस्लामिक आतंकवाद जिसको जिहाद का नाम देकर व बम फोड कर निर्दोष लोगों की हत्याऐं की जाती है,, उन आतंकवादियों की ज्यादा चिन्ता है जिन्होंने मानवाधिकारों का जबरदस्त उल्लंघन किया है।
गुजरात में नरेन्द्र मोदी ने अपने दो कार्यकालों में गुजरात में किये गये विकास के कार्यों के आधार पर चुनाव लडना तय किया था परन्तु सोहराबुद्दीन मामले को कांग्रेस ने संसद सहित गुजरात में भी उछाल दिया जिससे नरेन्द्र मोदी ने भी अपनी चुनावी रणनीति बदल कर हिन्दू-मुस्लिम के बीच ही नीति तय कर दी जिससे तथाकथित धर्मनिरपेक्षवादी राजनीतिक ताकतें विचलित हो गयी। गुजरात में वर्ष 2002 में गोधराकाण्ड में हिन्दुओं के मारे जाने से उपजी हिंसा में मुस्लिमों के मारे जाने के बाद तथाकथित धर्मनिरपेक्षवादियों के निशाने पर नरेन्द्र मादी है। परन्तु नरेन्द्र मोदी एक कुशल प्रशासक होने के साथ साथ स्वच्छ छवि के राजनेता भी है। इसी स्वच्छ छवि के सहारे उन्होंने गुजरात के बाहर से बडी मात्रा में विनिवेश आकर्षित किया तथा सम्पूर्ण देश में गुजरात को उन्होंने तेजी से प्रगति के मार्ग पर अग्रसर होने वाला सर्वोत्तम प्रदेश बना दिया। बडे पैमाने पर हुए इस विनियोग (जो मुख्यत: रिलाइन्स व एस्सार के तेल क्षेत्र में ही था) से अपेक्षाकृत रोजगार के कम अवसर उत्पन्न हुए जिससे ग्रामीण क्षेत्र के लोग मोदी के इस आर्थिक विकास के सिध्दांत को समझ नहीं पाये। गुजरात में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में भी बढोत्तरी हुई। विपक्षी दलों ने रोजगार के उत्पन्न हुए कम अवसर व बढती मंहगाई को नरेन्द्र मोदी के विरुध्द अस्त्र बनाया। इधर उत्तराखण्ड, पंजाब व उत्तरप्रदेश में शासित रही पार्टियां चुनावों में पराजित हो गयी। इस आधार पर मोदी को भी अपनी वापसी खतरे में पडी दिखाई दीं । स्वंय उनकी ही भाजपा के नेता सुरेश मेहता व केशू भाई पटेल उनके लिए गड्ढ़ा खोद रहे थे। भाजपा ने गुजरात में गत तीन चुनाव जीते हैं । यदि चौथी बार जीतना है तो कडी मेहनत तो करनी ही पडेगी क्योंकि पश्चिमी बंगाल के अलावा भारत के किसी भी राज्य में लगातार चौथी बार एक ही दल सत्ता में नहीं आया है। सोनिया के मौत के सौदागर के बयान से नरेन्द्र मोदी को ही फायदा मिलता नजर आने लगा है रही सही कसर निर्वाचन आयोग ने सोनिया व नरेन्द्र मोदी को नोटिस भेज कर मौत के सौदागर वाले बयान को पर्याप्त प्रचार देकर पूरी कर दी है।
नरेन्द्र मोदी ने हिन्दुओं से अपील की है कि इस्लामिक आतंकवादियों ने भारत में पिछले तीन वर्षों में 5,617 लोगों को अपनी आतंकवादी घटनाओं में मार दिया है जबकि गुजरात में केवल एक ही व्यक्ति आतंकवादियों के द्वारा मारा गया है। भाजपा ने ही गुजरातवासियों की रक्षा की है। कांग्रेस ने पोटा को हटा कर आतंकवाद को बढाने में सहयोग दिया है। पंजाब में खालिस्तान के लिए सिख आतंकवाद उस समय पनपा जब कांग्रेस शासन में थी। कश्मीर में निर्दोष लोगों के साथ साथ सेना पर आतंकवादी हमले करके हजारों लोगों को मारा जा रहा है जबकि वहां कांग्रेस की सरकार है। पश्चिमी बंगाल में कम्युनिस्ट पार्टी ने लोगों के मौलिक व संवैधानिक अधिकारों को नजरादांज करके नन्दीग्राम जैसी भयंकर घटनाओं को अंजाम दिया तथा नक्सली आतंकवाद पनपा वहां भी कांग्रेस का सीधा सीधा शासन नहीं परन्तु फिर भी केन्द्र में सरकार चलाने के लिए कांग्रेस को वामपंथियों की बैसाखी के सहारे की आवश्यकता है इसलिए पश्चिमी बंगाल में आतंकवाद को रोकने में कांग्रेस चुप्पी साधे हुई है। उत्तरप्रदेश में भी आतंकवादियों ने अपनी गतिविधियां बढायी हैं। वहां की बसपा सरकार को कांग्रेस का समर्थन प्राप्त है क्योंकि राष्ट्रपति के चुनाव में कांग्रेस ने बसपा का साथ ग्रहण किया था अत: उसके अहसान तो उतारने पडेंगे ही।
आंतकवाद के बढने के लिए किसी भी दल व शासन तंत्र को दोष देकर उसको 'मौत के सौदागर' ठहराना कतई ठीक नहीं है। आंतकवादी घटनाओं को रोकना सुरक्षा बलों का मामला होता है उसी के ऊपर छोडना चाहिए व आतंकवाद के रोकने के मामले में राजनीतिक हस्तक्षेप बिल्कुल भी नहीं किया जाना चाहिए। आवश्यकता इस बात की है कि सभी दल राष्ट्रवाद के सहारे आतंकवाद से लडें। पुलिस व सेना के बंधे हाथ खोलें। आतंकवादियों से निपटने के लिए कुछ कुर्बानी तो देनी ही पडेगी। पुलिस व सेना जब आतंकवादियों के प्रति सख्त व तेजी से कार्यवाही करेगी तभी आतंकवादियों के बढते हौसले रुक पायेंगें। राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण पुलिस व सेना का मनोबल टूटता है जिससे आतंकवादियों के हौसले बुलन्द होते है।
(नवोत्थान लेख सेवा हिन्दुस्थान समाचार)
मंगलवार, 11 दिसंबर 2007
कांग्रेस को सोहराबुद्दीन की चिंता
लेखक- डा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री
कांग्रेस को आतंकवादियों की चिंता सता रही है। उनकी दृष्टि में आतंकवादियों के मानवाधिकारों की चिंता सरकार नहीं करेगी तो और कौन करेगा? लगता है कांग्रेस की दृष्टि में आतंकवादी का मसला अल्पसंख्यक से भी जुड़ा हुआ है। क्योंकि ज्यादातर आतंकवादी मुसलमान ही हैं इसलिए जब कोई आतंकवादी मरता है तो कांग्रेस का अल्पसंख्यक सैल तुरंत जीवित हो जाता है। उसको लगता है यह आतंकवादी नहीं मरा बल्कि एक बदनसीब अल्पसंख्यक को गोली मार दी गई है। ऐसा नहीं कि कांग्रेस आतंकवादियों के पक्ष में खुले तौर पर आ गई है। उसमें आतंकवादियों के पक्ष में आने के लिए कानूनी प्रक्रिया को ढाल के तौर पर इस्तेमाल किया है। शायद कांग्रेस यह मानती है कि सच्चा आतंकवादी होने के लिए जरूरी है पहले आतंकवादी अपनी ए.के. -47 से कुछ हिन्दुओं को मार गिराए। उसके बाद पुलिस उन आतंकवादियों को पकड़े और पकड़ने के बाद उस पर मुकदमा चलाए। मुकदमा में यदि इनको फांसी की सजा हो जाए तो उस पर दया की अपील करते हुए राष्ट्रपति के पास आवेदन भेजा जाए और वह आवेदन परंपरागत तरीके से लंबित हो जाए। आतंकवाद की भी एक पूरी प्रक्रिया है और आतंकवादी को पकड़ने की भी अलग प्रक्रिया है। लेकिन दुर्भाग्य से कई बार पुलिस को पता चल जाता है कि आतंकवादी कोई वारदात करने वाले हैं। पुलिस पहले ही घेराबंदी कर लेती हैं और उस आतंकवादी को मार गिराती है। कांग्रेस की दृष्टि में इससे बड़ा जघन्य अपराध और पाप कोई नहीं है। जब तक सड़क पर पाँच-छ: हिन्दुओं की लाशें न बिछ जाए तब तक किसी को आतंकवादी भला कैसे ठहराया जा सकता है? जैसे न्यायालय में किसी तथ्य को सिध्द करने के लिए सबूतों की जरूरत पड़ती है वैसे ही कांग्रेस की दृष्टि में आतंकवादी कहलवाने के लिए छ: सात हिन्दुओं की लाशों की जरूरत हैं। दुर्भाग्य से आतंकवादी भी कांग्रेस और सरकार दोनों की ही मानसिकता को अच्छी तरह समझ गए हैं और इसका वे पूरा लाभ भी उठा रहे हैं । कश्मीर में आतंकवादियों ने दिन दहाड़े हजारों लोगों की हत्या कर दी हैं।
लेकिन सौ दौ सौ आतंकवादियों को कानूनी प्रक्रिया के चलते फांसी की सजा हो गई हो और सचमुच ही उनको फांसी के तख्ते पर चढ़ा दिया हो अभी तक ऐसा देश के देखने में नहीं आया है। पंजाब में आतंकवादी वर्षों वर्ष अपना सिक्का जमाते रहे और निर्दोषों को मारते रहे। लेकिन आतंकवादियों को कानून ने कोई सजा दी हो ऐसा देखने के लिए पंजाब के डीजीपी के.पी.एस. गिल भी तरसते रहे। सीपीएम तो कांग्रेस से आगे बढ़ा हुआ है। उसका मानना है कि नंदीग्राम के किसानों को जो अपनी जमीन की रक्षा के लिए लड़ रहे हैं मारने का अधिकार सीपीएम के कैडर के पास है। पश्चिमी बंगाल के मुख्यमंत्री बुध्ददेव भट्टाचार्य ने तो कह दिया था कि जो जैसा करेगा वैसा भरेगा। संकेत स्पष्ट था कि नंदीग्राम का किसान पार्टी के खिलाफ गर्दन उठाएगा तो गर्दन कटेगी। लेकिन आतंकवादियों के मामले में सीपीएम का स्पष्ट मानना है कि पुलिस जगह-जगह उन पर अत्याचार कर रही है।
इस पृष्ठभूमि में सोहराबुद्दीन की मुठभेड़ को देखना होगा। गुजरात में आतंकवादी कोई बड़ी वारदात करने में सफल नहीं हो पा रहे हैं। सामान्य नागरिक तो इसका अर्थ यह निकालेगा कि वहां पुलिस सख्त है और आतंकवादी वारदात करने से पहले ही मार दिए जाते हैं। लेकिन कांग्रेस के लिए इसका दूसरा अर्थ है। यदि आतंकवादियों को काम करने का मौका नहीं दिया जा रहा तो इसका अर्थ है कि गुजरात सरकार आतंकवादियों के मानवाधिकारों का हनन कर रही है। कपिल सिब्बल से लेकर सोनिया गांधी तक सोहराबुद्दीन के लिए हलकान हो रहे हैं। उनका दु:ख यह है कि उन्होंने अफजल गुरू को तो फांसी के तख्ते पर लटकने से बचा लिया है लेकिन वे बेचारे सोहराबुद्दीन को बचा नहीं पाए। वह बेचारा अकेला पुलिस के हत्थे चढ़ गया और मुठभेड़ में मारा गया। कपिल सिब्बल मौके पर अपनी कानून की किताबें लेकर हाजिर नहीं हो पाए। उनका आग्रह है कि पुलिस को सोहराबुद्दीन जैसे आतंकवादियों को जिंदा पकड़ना चाहिए और फिर कचहरी में पेश करना चाहिए और फिर वकील मोटी फीस लेकर वकालत करने के लिए तैयार मिलेंगे ही। लेकिन शायद वे नहीं जानते ए.के. 47 लेकर घूम रहा आतंकवादी बकरी का बच्चा नहीं होता जिसको पुलिस जब चाहे रस्सी से बांध ले। कांग्रेस गुजरात में सोहराबुद्दीन की मुठभेड़ में हुई मौत को लेकर जनता का फतवा ढूँढ रही है। सोनिया गांधी तो इतने गुस्से में आ गई कि उसने नरेन्द्र मोदी को मौत का सौदागर तक कह दिया। अब गुजरात की जनता को ही फैसला करना है कि मौत का सौदागर सोहराबुद्दीन था या नरेन्द्र मोदी? और उससे बड़ा प्रश्न यह है कि सोहराबुद्दीन के पक्ष में खड़े होने वाले लोग कौन है? और उनकी मंशा क्या है?
(नवोत्थान लेख सेवा हिन्दुस्थान समाचार)
कांग्रेस को आतंकवादियों की चिंता सता रही है। उनकी दृष्टि में आतंकवादियों के मानवाधिकारों की चिंता सरकार नहीं करेगी तो और कौन करेगा? लगता है कांग्रेस की दृष्टि में आतंकवादी का मसला अल्पसंख्यक से भी जुड़ा हुआ है। क्योंकि ज्यादातर आतंकवादी मुसलमान ही हैं इसलिए जब कोई आतंकवादी मरता है तो कांग्रेस का अल्पसंख्यक सैल तुरंत जीवित हो जाता है। उसको लगता है यह आतंकवादी नहीं मरा बल्कि एक बदनसीब अल्पसंख्यक को गोली मार दी गई है। ऐसा नहीं कि कांग्रेस आतंकवादियों के पक्ष में खुले तौर पर आ गई है। उसमें आतंकवादियों के पक्ष में आने के लिए कानूनी प्रक्रिया को ढाल के तौर पर इस्तेमाल किया है। शायद कांग्रेस यह मानती है कि सच्चा आतंकवादी होने के लिए जरूरी है पहले आतंकवादी अपनी ए.के. -47 से कुछ हिन्दुओं को मार गिराए। उसके बाद पुलिस उन आतंकवादियों को पकड़े और पकड़ने के बाद उस पर मुकदमा चलाए। मुकदमा में यदि इनको फांसी की सजा हो जाए तो उस पर दया की अपील करते हुए राष्ट्रपति के पास आवेदन भेजा जाए और वह आवेदन परंपरागत तरीके से लंबित हो जाए। आतंकवाद की भी एक पूरी प्रक्रिया है और आतंकवादी को पकड़ने की भी अलग प्रक्रिया है। लेकिन दुर्भाग्य से कई बार पुलिस को पता चल जाता है कि आतंकवादी कोई वारदात करने वाले हैं। पुलिस पहले ही घेराबंदी कर लेती हैं और उस आतंकवादी को मार गिराती है। कांग्रेस की दृष्टि में इससे बड़ा जघन्य अपराध और पाप कोई नहीं है। जब तक सड़क पर पाँच-छ: हिन्दुओं की लाशें न बिछ जाए तब तक किसी को आतंकवादी भला कैसे ठहराया जा सकता है? जैसे न्यायालय में किसी तथ्य को सिध्द करने के लिए सबूतों की जरूरत पड़ती है वैसे ही कांग्रेस की दृष्टि में आतंकवादी कहलवाने के लिए छ: सात हिन्दुओं की लाशों की जरूरत हैं। दुर्भाग्य से आतंकवादी भी कांग्रेस और सरकार दोनों की ही मानसिकता को अच्छी तरह समझ गए हैं और इसका वे पूरा लाभ भी उठा रहे हैं । कश्मीर में आतंकवादियों ने दिन दहाड़े हजारों लोगों की हत्या कर दी हैं।
लेकिन सौ दौ सौ आतंकवादियों को कानूनी प्रक्रिया के चलते फांसी की सजा हो गई हो और सचमुच ही उनको फांसी के तख्ते पर चढ़ा दिया हो अभी तक ऐसा देश के देखने में नहीं आया है। पंजाब में आतंकवादी वर्षों वर्ष अपना सिक्का जमाते रहे और निर्दोषों को मारते रहे। लेकिन आतंकवादियों को कानून ने कोई सजा दी हो ऐसा देखने के लिए पंजाब के डीजीपी के.पी.एस. गिल भी तरसते रहे। सीपीएम तो कांग्रेस से आगे बढ़ा हुआ है। उसका मानना है कि नंदीग्राम के किसानों को जो अपनी जमीन की रक्षा के लिए लड़ रहे हैं मारने का अधिकार सीपीएम के कैडर के पास है। पश्चिमी बंगाल के मुख्यमंत्री बुध्ददेव भट्टाचार्य ने तो कह दिया था कि जो जैसा करेगा वैसा भरेगा। संकेत स्पष्ट था कि नंदीग्राम का किसान पार्टी के खिलाफ गर्दन उठाएगा तो गर्दन कटेगी। लेकिन आतंकवादियों के मामले में सीपीएम का स्पष्ट मानना है कि पुलिस जगह-जगह उन पर अत्याचार कर रही है।
इस पृष्ठभूमि में सोहराबुद्दीन की मुठभेड़ को देखना होगा। गुजरात में आतंकवादी कोई बड़ी वारदात करने में सफल नहीं हो पा रहे हैं। सामान्य नागरिक तो इसका अर्थ यह निकालेगा कि वहां पुलिस सख्त है और आतंकवादी वारदात करने से पहले ही मार दिए जाते हैं। लेकिन कांग्रेस के लिए इसका दूसरा अर्थ है। यदि आतंकवादियों को काम करने का मौका नहीं दिया जा रहा तो इसका अर्थ है कि गुजरात सरकार आतंकवादियों के मानवाधिकारों का हनन कर रही है। कपिल सिब्बल से लेकर सोनिया गांधी तक सोहराबुद्दीन के लिए हलकान हो रहे हैं। उनका दु:ख यह है कि उन्होंने अफजल गुरू को तो फांसी के तख्ते पर लटकने से बचा लिया है लेकिन वे बेचारे सोहराबुद्दीन को बचा नहीं पाए। वह बेचारा अकेला पुलिस के हत्थे चढ़ गया और मुठभेड़ में मारा गया। कपिल सिब्बल मौके पर अपनी कानून की किताबें लेकर हाजिर नहीं हो पाए। उनका आग्रह है कि पुलिस को सोहराबुद्दीन जैसे आतंकवादियों को जिंदा पकड़ना चाहिए और फिर कचहरी में पेश करना चाहिए और फिर वकील मोटी फीस लेकर वकालत करने के लिए तैयार मिलेंगे ही। लेकिन शायद वे नहीं जानते ए.के. 47 लेकर घूम रहा आतंकवादी बकरी का बच्चा नहीं होता जिसको पुलिस जब चाहे रस्सी से बांध ले। कांग्रेस गुजरात में सोहराबुद्दीन की मुठभेड़ में हुई मौत को लेकर जनता का फतवा ढूँढ रही है। सोनिया गांधी तो इतने गुस्से में आ गई कि उसने नरेन्द्र मोदी को मौत का सौदागर तक कह दिया। अब गुजरात की जनता को ही फैसला करना है कि मौत का सौदागर सोहराबुद्दीन था या नरेन्द्र मोदी? और उससे बड़ा प्रश्न यह है कि सोहराबुद्दीन के पक्ष में खड़े होने वाले लोग कौन है? और उनकी मंशा क्या है?
(नवोत्थान लेख सेवा हिन्दुस्थान समाचार)
बुधवार, 5 दिसंबर 2007
महिलाओं के पक्षधर श्री नरेन्द्र मोदी

गुजरात के मुख्यमंत्री श्री नरेंद्र मोदी देश के अत्यधिक प्रसिद्ध अविवाहितों में से एक है। फिर भी, गुजरात के सर्वांगीण विकास को लेकर श्री मोदी महिलाओं के प्रति उदार हृदय हैं। इसी कारण वे चुनावी मैदान में महिलाओं को उतारने में पीछे नहीं हैं।
दिसम्बर में होने वाले चुनाव में जहां कांग्रेस ने सिर्फ 14 महिला उम्मीदवारी को चुनावी जंग में खड़ा किया है। वहीं भाजपा ने 26 महिला उम्मीदवारों को सियासी जंग में उतार रहा है।
श्री मोदी कहते हैं कि वे महिला उत्थान और उनके जुड़े मामलों को पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
साबरमती से खड़ी भाजपा उम्मीदवार गीताबेन पटेल का कहना है कि मोदी के पीछे सारे गुजरात की महिलाओं का समर्थन हैं।
नारोदा से खड़ी माया कोदानी कहती हैं कि काफी सोच विचार के बाद ही पार्टी ने उन्हें खड़ा करने का फैसला लिया है। उन्होंने कहा कि इससे पता चलता है कि भाजपा महिलाओं की भागेदारी बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है।
दिसम्बर में होने वाले चुनाव में जहां कांग्रेस ने सिर्फ 14 महिला उम्मीदवारी को चुनावी जंग में खड़ा किया है। वहीं भाजपा ने 26 महिला उम्मीदवारों को सियासी जंग में उतार रहा है।
श्री मोदी कहते हैं कि वे महिला उत्थान और उनके जुड़े मामलों को पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
साबरमती से खड़ी भाजपा उम्मीदवार गीताबेन पटेल का कहना है कि मोदी के पीछे सारे गुजरात की महिलाओं का समर्थन हैं।
नारोदा से खड़ी माया कोदानी कहती हैं कि काफी सोच विचार के बाद ही पार्टी ने उन्हें खड़ा करने का फैसला लिया है। उन्होंने कहा कि इससे पता चलता है कि भाजपा महिलाओं की भागेदारी बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है।
मंगलवार, 4 दिसंबर 2007
गुजरात में विकास युग - भाग- 3
शिक्षा में गुजरात मॉडल
भारत सरकार ने सर्वशिक्षा अभियान के गुजरात माडल की सराहना की है और अन्य राज्यों से भी इसे अपनाने का आग्रह किया है। कन्या केलावरी रथ यात्रा के माध्यम से प्राइमरी प्रवेश 85 से बढ़कर 100 प्रतिशत हो गया है और बीच में स्कूल छोड़ने वालों की संख्या में 34 प्रतिशत से घट कर 3.24 प्रतिशत रह गया है। अब राज्य में कांग्रेसी शासन के बाद से एक लाख अध्यापकों और एक लाख क्लास रूमों की कमी पूरी कर ली गई है और 44000 स्कलों में भी शौचालय की सुविधा उपलब्ध हो गई है। पिछले 5 वर्षों में उच्च शिक्षा संस्थान तथा तकनीकी/मेडिकल की सीटें दुगुनी हो गयी हैं क्योंकि गुजरात को इन उच्च शिक्षा सुविधाओं से वंचित रखा गया था। विश्वविद्यालयों की संख्या 7 से बढ़कर 17 हो गई है जिसमें प्राइवेट भागीदारी भी शमिल है, जैसे अंबानी, निरमा आदि।
कन्या केलावाड़ी निधि का निर्माण मुख्यमंत्री द्वारा प्राप्त उपहारों की नीलामी से किया गया है तथा 1000 रूपए के विद्यालक्ष्मी बंधपत्र प्रत्येक सरकारी विद्यार्थी को प्रवेश के समय दिए जाते हैं। गांव में पढ़नेवाली कन्याओं को स्कूल के लिए नि:शुल्क बस सेवा उपलब्ध कराई जाती है। बेरोजगारों को नि:शुल्क कंप्यूटर प्रशिक्षण दिया जाता है और युवाओं को भी अंग्रेजी प्रशिक्षण दिया जाता है। बड़ी संख्या में उच्च शिक्षा संस्थाएं स्थापित की गई हैं। नेशनल लॉ स्कूल तथा 19 विश्वस्तरीय पाठयक्रम शुरू किए गए हैं जिसमें दूरसंचार, मेरीन इंजीनियंरिंग आदि शामिल हैं।
निवेश के मोर्चे पर सबसे आगे
औद्योगिक मोर्चो पर 2003, 2005, तथा 2007 में तीन शिखर बैठकें हुई थी जिसमें गुजरात में 20 लाख लोगों को रोजगार देने के लिए 666000 करोड़ रूपए के निवेश के लिए 666 सहमति पत्रों पर हस्ताक्षर किए गए थे; 2 लाख करोड़ के एक और निवेश प्रस्ताव पर भी हस्ताक्षर किए गए थे। भारतीय रिजर्व बैंक की घोषणा के अनुसार, सभी राज्यों में से 2006-07 में निवेश के मामले में गुजरात का प्रथम स्थान रहा, जहां कुल निवेश का 25 प्रतिशत निवेश हुआ। गुजरात में औद्योगिक अशांति के कारण कार्य दिनों की क्षति के रूप में सबसे कम 0.9 प्रतिशत थी जबकि इसकी तुलना में राष्ट्रीय औसत 5.25 प्रतिशत है।
गुजरात के 40 लघु और मध्यम दर्जे के बंदरगाह निर्यात-आयात माल का 104 मिलियन टन कार्गो को संभालते हैं जो पूरे भारत का 74 प्रतिशत भाग बनता है। 2003 में श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने सबसे बड़े राजमार्ग अहमदाबाद-बड़ोदरा का उद्धाटन किया था। गुजरात के अधिकांश पीएसयू की हानि अब उलट गई है आर इनमें विशाल लाभ हो रहा है। गुजरात 132'/200' फीट रिंग रोड, फ्लाई ओवर, ऑप्टीकल फाइबर में भी तेजी से प्रगति कर रहा है जिससे वह विश्व तथा अन्य कई क्षेत्रों में दूसरे नंबर आने वाला राज्य बन गया है।
सर्वोत्कृष्ट शहरी योजना
साबरमती रिवर फ्रंट प्रोजेक्ट को सर्वोत्कृष्ट शहरी डिजाइन एवार्ड प्रधानमंत्री के हाथों प्राप्त हुआ था। अहमदाबाद में बीआरटीएस परियोजना पर काम चल रहा है। एएसमसी में स्लम अपग्रेडेशन प्रोग्राम को संयुक्त राष्ट्र संघ से अंतर्राष्ट्रीय एवार्ड मिला। अब गुजरात में मल्टीप्लेक्स, सुपरमाल और 15 फाइव स्टार होटलों की बाढ़ सी आ गई है।
अपवंचितों का विकास
किसानों, गरीबों और अपवंचित लोगों के लिए उनहें अनाज, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य तथा रोजगार देने के लिए बहुत सारे उपाय किए गए हैं। उन सभी का यहां वर्णन करना संभव नहीं है। परंतु, हाल में मुख्यमंत्री ने 185 लाख लोगों के लिए 39000 करोड़ रूपए के तीन मेगा पैकेज समर्पित किए थे जो 11वीं योजना में कुल 37 प्रशित जनसंख्या के लिए इस प्रकार हैं:
1- 60 लाख सागरखेड़ू (मछुआरे, खारवा, अगावियास आदि) के लिए 11000 करोड़ रूपए का पैकेज
2- 75 लाख वन बंधुओं (आदिवासी) के लिए 15000 करोड़ रूपए और
3- 50 लाख शहरी गरीबों के लिए 13000 करोड़ रूपए।
गुजरात पहला राज्य है जिसने अपवंचित तथा गरीब लोगों के लिए इतने समन्वित रूप में उपाय किए हैं।
क्षेत्रीय असंतुलन की समाप्ति
गुजरात ने 1 लाख करोड़ रूपए से अधिक की 11वीं योजना को 11 प्रतिशत विकास दर के साथ स्वीकार किया। योजना आयोग ने गुजरात के लिए 11 प्रतिशत विकास दर निश्चित की जो अन्य राज्यों से कहीं अधिक है, जबकि भारत की विकास दर 9 प्रतिशत निश्चित हुई है। गुजरात ने फिर इसे स्वीकार किया। गुजरात ने अपने राज्य से क्षेत्रीय असंतुलन समाप्त करने की एक और चुनौती भी स्वीकार की जिसके लिए विशेष रूप से 30 पिछड़े जिलों के लए उपाय किए गए।
विवेकपूर्ण वित्तीय प्रबंधन
गुजरात की वित्तीय प्रबंधन देश में सर्वोत्कृष्ट है। पिछले 3 वर्षों में इसका राजस्व अधिक रहा जबकि पिछले 5 वषों से कोई टैक्स बढ़ाया नहीं गया बल्कि 1200 करोड़ रूपए की रियायतें दी गई, स्टांप डयूटी 15 प्रतिशत से घटाकर 5 प्रतिशत की गई, वैट की दर 27 प्रशित रखकर शुरूआत की गई, ऑक्ट्राय शुल्क समाप्त कर दिया गया, वित्तीय संस्थानों के ऋण से 2000 करोड़ रूपए ब्याज की बचत की गई; कच्चे तेल की रायल्टी बढ़ाकर प्रति वर्ष 350 करोड़ रूपए की गई और कोयले की कीमत को घटाकर 125 करोड़ रूपए किया गया - ये सभी कदम गुजरात ने विवेकपूर्ण ढंग से किए। यही देश का एकमात्र राज्य है जिसने राजस्व अधिशेष, वित्तीय घाटे, सार्वजनिक ऋण और गारंटी आदि जैसे सभी लक्ष्य प्राप्त किए हैं।
नेतृत्व
ये तथ्य स्वयं अपनी कहानी कह रहे हैं कि गुजरात ने नवीन खोजें तथा पहल करके अपनी विकास रणनीति तैयार की और इस प्रकार गुजरात ने राज्य की प्रगति तथा लोगों के कल्याण के लिए लाभकारी परिणाम प्राप्त किए। मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अटल बिहारी वाजपेयी की गरीबों के प्रति उदारता और पूर्व अमरीकी महान राष्ट्रपति श्री जान एफ केनेडी के ग्लोबल विजन का गहन प्रदर्शन किया। हमारे आंकड़े तथा जमीनी हकीकत दर्शाती है कि मुख्यमंत्री ने लोगों के सपनों को साकार करने का प्रयास किया और लोगों का विश्वास जीता है। यही एक ऐसा तथ्य है जिसके कारण उनके नेतृत्व में भाजपा गुजरात चुनाव में विजय प्राप्त करेगी।
भारत सरकार ने सर्वशिक्षा अभियान के गुजरात माडल की सराहना की है और अन्य राज्यों से भी इसे अपनाने का आग्रह किया है। कन्या केलावरी रथ यात्रा के माध्यम से प्राइमरी प्रवेश 85 से बढ़कर 100 प्रतिशत हो गया है और बीच में स्कूल छोड़ने वालों की संख्या में 34 प्रतिशत से घट कर 3.24 प्रतिशत रह गया है। अब राज्य में कांग्रेसी शासन के बाद से एक लाख अध्यापकों और एक लाख क्लास रूमों की कमी पूरी कर ली गई है और 44000 स्कलों में भी शौचालय की सुविधा उपलब्ध हो गई है। पिछले 5 वर्षों में उच्च शिक्षा संस्थान तथा तकनीकी/मेडिकल की सीटें दुगुनी हो गयी हैं क्योंकि गुजरात को इन उच्च शिक्षा सुविधाओं से वंचित रखा गया था। विश्वविद्यालयों की संख्या 7 से बढ़कर 17 हो गई है जिसमें प्राइवेट भागीदारी भी शमिल है, जैसे अंबानी, निरमा आदि।
कन्या केलावाड़ी निधि का निर्माण मुख्यमंत्री द्वारा प्राप्त उपहारों की नीलामी से किया गया है तथा 1000 रूपए के विद्यालक्ष्मी बंधपत्र प्रत्येक सरकारी विद्यार्थी को प्रवेश के समय दिए जाते हैं। गांव में पढ़नेवाली कन्याओं को स्कूल के लिए नि:शुल्क बस सेवा उपलब्ध कराई जाती है। बेरोजगारों को नि:शुल्क कंप्यूटर प्रशिक्षण दिया जाता है और युवाओं को भी अंग्रेजी प्रशिक्षण दिया जाता है। बड़ी संख्या में उच्च शिक्षा संस्थाएं स्थापित की गई हैं। नेशनल लॉ स्कूल तथा 19 विश्वस्तरीय पाठयक्रम शुरू किए गए हैं जिसमें दूरसंचार, मेरीन इंजीनियंरिंग आदि शामिल हैं।
निवेश के मोर्चे पर सबसे आगे
औद्योगिक मोर्चो पर 2003, 2005, तथा 2007 में तीन शिखर बैठकें हुई थी जिसमें गुजरात में 20 लाख लोगों को रोजगार देने के लिए 666000 करोड़ रूपए के निवेश के लिए 666 सहमति पत्रों पर हस्ताक्षर किए गए थे; 2 लाख करोड़ के एक और निवेश प्रस्ताव पर भी हस्ताक्षर किए गए थे। भारतीय रिजर्व बैंक की घोषणा के अनुसार, सभी राज्यों में से 2006-07 में निवेश के मामले में गुजरात का प्रथम स्थान रहा, जहां कुल निवेश का 25 प्रतिशत निवेश हुआ। गुजरात में औद्योगिक अशांति के कारण कार्य दिनों की क्षति के रूप में सबसे कम 0.9 प्रतिशत थी जबकि इसकी तुलना में राष्ट्रीय औसत 5.25 प्रतिशत है।
गुजरात के 40 लघु और मध्यम दर्जे के बंदरगाह निर्यात-आयात माल का 104 मिलियन टन कार्गो को संभालते हैं जो पूरे भारत का 74 प्रतिशत भाग बनता है। 2003 में श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने सबसे बड़े राजमार्ग अहमदाबाद-बड़ोदरा का उद्धाटन किया था। गुजरात के अधिकांश पीएसयू की हानि अब उलट गई है आर इनमें विशाल लाभ हो रहा है। गुजरात 132'/200' फीट रिंग रोड, फ्लाई ओवर, ऑप्टीकल फाइबर में भी तेजी से प्रगति कर रहा है जिससे वह विश्व तथा अन्य कई क्षेत्रों में दूसरे नंबर आने वाला राज्य बन गया है।
सर्वोत्कृष्ट शहरी योजना
साबरमती रिवर फ्रंट प्रोजेक्ट को सर्वोत्कृष्ट शहरी डिजाइन एवार्ड प्रधानमंत्री के हाथों प्राप्त हुआ था। अहमदाबाद में बीआरटीएस परियोजना पर काम चल रहा है। एएसमसी में स्लम अपग्रेडेशन प्रोग्राम को संयुक्त राष्ट्र संघ से अंतर्राष्ट्रीय एवार्ड मिला। अब गुजरात में मल्टीप्लेक्स, सुपरमाल और 15 फाइव स्टार होटलों की बाढ़ सी आ गई है।
अपवंचितों का विकास
किसानों, गरीबों और अपवंचित लोगों के लिए उनहें अनाज, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य तथा रोजगार देने के लिए बहुत सारे उपाय किए गए हैं। उन सभी का यहां वर्णन करना संभव नहीं है। परंतु, हाल में मुख्यमंत्री ने 185 लाख लोगों के लिए 39000 करोड़ रूपए के तीन मेगा पैकेज समर्पित किए थे जो 11वीं योजना में कुल 37 प्रशित जनसंख्या के लिए इस प्रकार हैं:
1- 60 लाख सागरखेड़ू (मछुआरे, खारवा, अगावियास आदि) के लिए 11000 करोड़ रूपए का पैकेज
2- 75 लाख वन बंधुओं (आदिवासी) के लिए 15000 करोड़ रूपए और
3- 50 लाख शहरी गरीबों के लिए 13000 करोड़ रूपए।
गुजरात पहला राज्य है जिसने अपवंचित तथा गरीब लोगों के लिए इतने समन्वित रूप में उपाय किए हैं।
क्षेत्रीय असंतुलन की समाप्ति
गुजरात ने 1 लाख करोड़ रूपए से अधिक की 11वीं योजना को 11 प्रतिशत विकास दर के साथ स्वीकार किया। योजना आयोग ने गुजरात के लिए 11 प्रतिशत विकास दर निश्चित की जो अन्य राज्यों से कहीं अधिक है, जबकि भारत की विकास दर 9 प्रतिशत निश्चित हुई है। गुजरात ने फिर इसे स्वीकार किया। गुजरात ने अपने राज्य से क्षेत्रीय असंतुलन समाप्त करने की एक और चुनौती भी स्वीकार की जिसके लिए विशेष रूप से 30 पिछड़े जिलों के लए उपाय किए गए।
विवेकपूर्ण वित्तीय प्रबंधन
गुजरात की वित्तीय प्रबंधन देश में सर्वोत्कृष्ट है। पिछले 3 वर्षों में इसका राजस्व अधिक रहा जबकि पिछले 5 वषों से कोई टैक्स बढ़ाया नहीं गया बल्कि 1200 करोड़ रूपए की रियायतें दी गई, स्टांप डयूटी 15 प्रतिशत से घटाकर 5 प्रतिशत की गई, वैट की दर 27 प्रशित रखकर शुरूआत की गई, ऑक्ट्राय शुल्क समाप्त कर दिया गया, वित्तीय संस्थानों के ऋण से 2000 करोड़ रूपए ब्याज की बचत की गई; कच्चे तेल की रायल्टी बढ़ाकर प्रति वर्ष 350 करोड़ रूपए की गई और कोयले की कीमत को घटाकर 125 करोड़ रूपए किया गया - ये सभी कदम गुजरात ने विवेकपूर्ण ढंग से किए। यही देश का एकमात्र राज्य है जिसने राजस्व अधिशेष, वित्तीय घाटे, सार्वजनिक ऋण और गारंटी आदि जैसे सभी लक्ष्य प्राप्त किए हैं।
नेतृत्व
ये तथ्य स्वयं अपनी कहानी कह रहे हैं कि गुजरात ने नवीन खोजें तथा पहल करके अपनी विकास रणनीति तैयार की और इस प्रकार गुजरात ने राज्य की प्रगति तथा लोगों के कल्याण के लिए लाभकारी परिणाम प्राप्त किए। मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अटल बिहारी वाजपेयी की गरीबों के प्रति उदारता और पूर्व अमरीकी महान राष्ट्रपति श्री जान एफ केनेडी के ग्लोबल विजन का गहन प्रदर्शन किया। हमारे आंकड़े तथा जमीनी हकीकत दर्शाती है कि मुख्यमंत्री ने लोगों के सपनों को साकार करने का प्रयास किया और लोगों का विश्वास जीता है। यही एक ऐसा तथ्य है जिसके कारण उनके नेतृत्व में भाजपा गुजरात चुनाव में विजय प्राप्त करेगी।
गुजरात में विकास युग - भाग- 2
लेखक-डा. भरत जरीवाला
गुजरात के मुख्यमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी का कहना है कि 'गुजरात भारत को विकास की राह पर ले जाने का साधन बन गया है।' श्री मोदी ने सचमुच इसे सच कर दिखाया है। आज गुजरात भारत के राज्यों में एक आदर्श (मॉडल) बन गया है। गुजरात में इस कदर विकास हुआ है जिसे राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय स्तरों पर मान्यता दी जा रही है। गुजरात को विश्व बैंक, संयुक्त राष्ट्र संघ, यूनेस्को, कामनवेल्थ एसोसिएशन, माइक्रोसाफ्ट, वाशिंगटन पोस्ट, भारत सरकार, योजना आयोग, प्रधानमंत्री, राजीव गांधी फाउंडेशन, इंडिया टूडे और न जाने देश में कहां-कहां से 66 एवार्ड्स/मेडल/मान्यताएं प्राप्त हो चुकी हैं। ऐसा कौन सा क्षेत्र है जहां गुजरात का नाम 'विकास' के दायरे में नहीं आता है-भूकंप प्रबंधन से लेकर देश की विरासत को संभालकर रखना, ई-गवर्नेंस से लेकर विद्युत क्षेत्र में सुधार तक, स्त्री-शिक्षा से लेकर मातृत्व स्वास्थ्य तक, नगरीय डिजाइन तैयार करने से लेकर आर्थिक स्वतंत्रता तक और यहां तक कि सर्वश्रेष्ठ राज्य से लेकर सर्वश्रेष्ठ मुख्यमंत्री तक गुजरात का भंडार श्रेष्ठतम उत्कृष्टताओं से भरा पड़ा है। इतना ही नहीं गुजरात राज्य को तो कल्याण कार्यक्रमों के मामले में भी प्रथम स्थान पर रखा गया है।
कृषि क्रांति
पिछले 5 वर्षों में जल क्रांति के साथ साथ कृषि क्रांति भी आई; अब फसल उत्पादन 9000 करोड़ रूपए से बढ़कर 34000 करोड़ रूपए तक जा पहुंचा है और उपज के हिसाब से दुगुनी हो गई है, कपास की फसल में छह गुणा वृध्दि हुई है जो 2002-03 में 23 लाख गांठों से बढ़कर 2006-07 में 123 लाख गांठ तक पहुंच गई है और इस प्रकार प्रति हेक्टेयर में 700 कि.ग्रा. की पैदावार शुरू हो गई है जो विश्व में एक रिकार्ड है। अब चीन गुजरात से 60 प्रतिशत कपास का आयात करता है। फलों और सब्जियों की उपज में भी गुजरात का स्थान सबसे ऊपर है और यहां प्रति हेक्टेयर 16 मीट्रिक टन की उपज होती है। 'भूमि से प्रयोगशाला' तक कार्यक्रम में 20 लाख किसानों को 'साइल हैल्थ कार्ड' दिए गए हैं ताकि बेहतर फसल उगाने के तरीकों की उत्कृष्ट किस्म का पता लगाया जा सके। राज्य में ड्रिप तथा स्प्रिंकलर सिंचाई को फैलाने के लिए 'गुजरात ग्रीन रेवोल्यूशन कं.' बनाई गई है। गुजरात के किसान अब दो से चार फसलों तक उपज करते हैं और इससे राज्य की जीडीपी में कृषि का हिस्सा बढ़ गया है।
बिजली में आत्मनिर्भरता
अब गुजरात बिजली में लगभग आत्मनिर्भर हो चुका है। 2002 में लगभग 2500 मेगावाट बिजली की कमी थी और 5 वर्षों के अंदर गुजरात ने सेंट्रल सेक्टर तथा प्राइवेट भागीदारी से 8100 मेगावाट से 11000 मेगावाट तक अपनी क्षमता बढ़ा ली है। 9000 मेगावाट बिजली संयंत्र और भी बन रहे हैं जिसमें एनटीपीसी/टाटा संयुक्त रूप से 4000 मेगावाट के संयत्र लगा रहे हैं। गुजरात ने 2003 में बिजी सेक्टर में सुधार का काम शुरू जिससे टी एंड डी क्षति को 45 प्रतिशत से घटा कर 23 प्रतिशत तक ले आया गया और इसे फिर से गठित किया गया। परिणामस्वरूप 2500 करोड़ रूपए की हानि वाली जीईबी में प्रोडक्शन, ट्रांसमिशन, डिस्ट्रीब्यूशन और प्रशासन के लिए 7 कंपनियां बना कर अब इसे 250 करोड़ रूपए वाले लाभकारी कंपनी बना दिया गया है। बिजली का वितरण भी उचित ढंग से होता है - कृषि को 33 प्रतिशत, उद्योग को 33 प्रतिशत तथा निवासीय/वाणिज्य/उपयोगिताओं को 33 प्रतिशत बिजली दी जाती है।
बिजली सुधार
पिछले दो वर्षों से राज्य में बिजली की कटौती नहीं होती है। किसानों को 1700 करोड़ रूपए की बिजली सब्सिडी दी जाती है जो देश में सबसे अधिक है। पांच वर्षों से बिजली की दरें बढ़ाई नहीं गई है और वास्तव में कृषि बिजली पर पिछले 20 वर्षों से चले आ रहे पुराने बिक्री कर को खत्म कर 975 करोड़ रूपए का अनुदान दिया गया और घरों तथा औद्योगिक बिजली के शुल्क में 60 प्रतिशत से घटा कर 20 प्रतिशत कर दिया गया। ज्योतिग्राम योजना के अंतर्गत राज्य के सभी 18000 गांवों को 1200 करोड़ रूपए की लागत से पिछले 4 वर्षों के रिकार्ड समय में बिजली की व्यवस्था की गई, जिससे इन सभी को 24 घंटे बिजली उपलब्ध रहती है। गुजरात ही पहला प्रदेश है, जिसने यह सब कुछ कर दिखाया है। गुजरात में प्रति व्यक्ति बिजली का प्रयोग 1313 यूनिट है जो राष्ट्रीय औसत के 700 यूनिट से दुगूना है। गुजरात को भारत सरकार ने बिजली की इस उपलब्धि के लिए 'इंडिया एक्सीलेंस एवार्ड-2005' दिया था।
गैस इंटरनेशनल बिड
गैस और पेट्रोलियम सेक्टर में गुजरात पहला प्रदेश है जिसने दहेज और हाजिरा में दो एलएनजी टर्मिनल बनाए हैं तथा दो और टर्मिनल भी बनने वाले हैं। 20 शहरों में 2000 किमी लंबी गैस पाइप लाइन से 20 लाख घरों को शीघ्र ही रसोई गैस मिलने लगेगी। गुजरात पीएसयू पेट्रोलियम कार्पोरेशन को आस्ट्रेलिया में ऑयल एक्सप्लोरेशन के लिए 3 ब्लाक तथा मिस्र में 2 ब्लाक प्राप्त हुए हैं और कृष्णा-गोदावरी बेसिन में भी 2 लाख करोड़ रूपए प्राप्त हुए हैं। गुजरात ने सभी सार्वजनिक परिवहनों के लिए सीएनजी गैस में बदलने का काम शुरू कर दिया है ताकि पर्यावरण में सुधार लाया जा सके।
स्वास्थ्य में नई खोजें
'चिरंजीवी योजना' को सिंगापुर में वाशिंगटन पोस्ट का एशियन इन्नोवेटिव एवार्ड प्राप्त हुआ है। 'बेटी वैभव आंदोलन' के कारण महिलाओं की दर प्रति 1000 पुरूष के पीछे 802 से बढ़कर 870 हो गई है। विद्यार्थियों के नि:शुल्क मेडिकल चेक अप का काम हाथ में लिया जा रहा है और उनहें डाक्टरी उपचार तथा आप्रेशन मुफ्त दिया जाएगा। 44000 आंगनवाड़ियों के 3 वर्षा से कम आयु के 10 लाख बच्चों को विटामिन ए-डी पोषाहार दिया जाएगा। विश्व बैंक की सहायता से 30000 टन प्रतिदिन मल उपचार का काम हाथ में लिया जा रहा है जिसकी प्रशंसा सुप्रीम कोर्ट ने भी की है। मेडिकल टूरिज्म की संकल्पना सफल सिध्द हुई है और अहमदाबाद में प्रत्येक अंतर्राष्ट्रीय उड़ान से विदेशी/एनआरआई रोगी यहां आते है। नमक मजदूरों, मछुआरों, आदिवासियों तथा अंदरूनी क्षेत्रों के लए 85 मोबाइल वैन डाक्टरी सेवाओं के लिए दी गई है। शहरी क्षेत्रों से नगर स्वास्थ्य केंद्र शुरू किए गए है।
गुजरात के मुख्यमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी का कहना है कि 'गुजरात भारत को विकास की राह पर ले जाने का साधन बन गया है।' श्री मोदी ने सचमुच इसे सच कर दिखाया है। आज गुजरात भारत के राज्यों में एक आदर्श (मॉडल) बन गया है। गुजरात में इस कदर विकास हुआ है जिसे राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय स्तरों पर मान्यता दी जा रही है। गुजरात को विश्व बैंक, संयुक्त राष्ट्र संघ, यूनेस्को, कामनवेल्थ एसोसिएशन, माइक्रोसाफ्ट, वाशिंगटन पोस्ट, भारत सरकार, योजना आयोग, प्रधानमंत्री, राजीव गांधी फाउंडेशन, इंडिया टूडे और न जाने देश में कहां-कहां से 66 एवार्ड्स/मेडल/मान्यताएं प्राप्त हो चुकी हैं। ऐसा कौन सा क्षेत्र है जहां गुजरात का नाम 'विकास' के दायरे में नहीं आता है-भूकंप प्रबंधन से लेकर देश की विरासत को संभालकर रखना, ई-गवर्नेंस से लेकर विद्युत क्षेत्र में सुधार तक, स्त्री-शिक्षा से लेकर मातृत्व स्वास्थ्य तक, नगरीय डिजाइन तैयार करने से लेकर आर्थिक स्वतंत्रता तक और यहां तक कि सर्वश्रेष्ठ राज्य से लेकर सर्वश्रेष्ठ मुख्यमंत्री तक गुजरात का भंडार श्रेष्ठतम उत्कृष्टताओं से भरा पड़ा है। इतना ही नहीं गुजरात राज्य को तो कल्याण कार्यक्रमों के मामले में भी प्रथम स्थान पर रखा गया है।
कृषि क्रांति
पिछले 5 वर्षों में जल क्रांति के साथ साथ कृषि क्रांति भी आई; अब फसल उत्पादन 9000 करोड़ रूपए से बढ़कर 34000 करोड़ रूपए तक जा पहुंचा है और उपज के हिसाब से दुगुनी हो गई है, कपास की फसल में छह गुणा वृध्दि हुई है जो 2002-03 में 23 लाख गांठों से बढ़कर 2006-07 में 123 लाख गांठ तक पहुंच गई है और इस प्रकार प्रति हेक्टेयर में 700 कि.ग्रा. की पैदावार शुरू हो गई है जो विश्व में एक रिकार्ड है। अब चीन गुजरात से 60 प्रतिशत कपास का आयात करता है। फलों और सब्जियों की उपज में भी गुजरात का स्थान सबसे ऊपर है और यहां प्रति हेक्टेयर 16 मीट्रिक टन की उपज होती है। 'भूमि से प्रयोगशाला' तक कार्यक्रम में 20 लाख किसानों को 'साइल हैल्थ कार्ड' दिए गए हैं ताकि बेहतर फसल उगाने के तरीकों की उत्कृष्ट किस्म का पता लगाया जा सके। राज्य में ड्रिप तथा स्प्रिंकलर सिंचाई को फैलाने के लिए 'गुजरात ग्रीन रेवोल्यूशन कं.' बनाई गई है। गुजरात के किसान अब दो से चार फसलों तक उपज करते हैं और इससे राज्य की जीडीपी में कृषि का हिस्सा बढ़ गया है।
बिजली में आत्मनिर्भरता
अब गुजरात बिजली में लगभग आत्मनिर्भर हो चुका है। 2002 में लगभग 2500 मेगावाट बिजली की कमी थी और 5 वर्षों के अंदर गुजरात ने सेंट्रल सेक्टर तथा प्राइवेट भागीदारी से 8100 मेगावाट से 11000 मेगावाट तक अपनी क्षमता बढ़ा ली है। 9000 मेगावाट बिजली संयंत्र और भी बन रहे हैं जिसमें एनटीपीसी/टाटा संयुक्त रूप से 4000 मेगावाट के संयत्र लगा रहे हैं। गुजरात ने 2003 में बिजी सेक्टर में सुधार का काम शुरू जिससे टी एंड डी क्षति को 45 प्रतिशत से घटा कर 23 प्रतिशत तक ले आया गया और इसे फिर से गठित किया गया। परिणामस्वरूप 2500 करोड़ रूपए की हानि वाली जीईबी में प्रोडक्शन, ट्रांसमिशन, डिस्ट्रीब्यूशन और प्रशासन के लिए 7 कंपनियां बना कर अब इसे 250 करोड़ रूपए वाले लाभकारी कंपनी बना दिया गया है। बिजली का वितरण भी उचित ढंग से होता है - कृषि को 33 प्रतिशत, उद्योग को 33 प्रतिशत तथा निवासीय/वाणिज्य/उपयोगिताओं को 33 प्रतिशत बिजली दी जाती है।
बिजली सुधार
पिछले दो वर्षों से राज्य में बिजली की कटौती नहीं होती है। किसानों को 1700 करोड़ रूपए की बिजली सब्सिडी दी जाती है जो देश में सबसे अधिक है। पांच वर्षों से बिजली की दरें बढ़ाई नहीं गई है और वास्तव में कृषि बिजली पर पिछले 20 वर्षों से चले आ रहे पुराने बिक्री कर को खत्म कर 975 करोड़ रूपए का अनुदान दिया गया और घरों तथा औद्योगिक बिजली के शुल्क में 60 प्रतिशत से घटा कर 20 प्रतिशत कर दिया गया। ज्योतिग्राम योजना के अंतर्गत राज्य के सभी 18000 गांवों को 1200 करोड़ रूपए की लागत से पिछले 4 वर्षों के रिकार्ड समय में बिजली की व्यवस्था की गई, जिससे इन सभी को 24 घंटे बिजली उपलब्ध रहती है। गुजरात ही पहला प्रदेश है, जिसने यह सब कुछ कर दिखाया है। गुजरात में प्रति व्यक्ति बिजली का प्रयोग 1313 यूनिट है जो राष्ट्रीय औसत के 700 यूनिट से दुगूना है। गुजरात को भारत सरकार ने बिजली की इस उपलब्धि के लिए 'इंडिया एक्सीलेंस एवार्ड-2005' दिया था।
गैस इंटरनेशनल बिड
गैस और पेट्रोलियम सेक्टर में गुजरात पहला प्रदेश है जिसने दहेज और हाजिरा में दो एलएनजी टर्मिनल बनाए हैं तथा दो और टर्मिनल भी बनने वाले हैं। 20 शहरों में 2000 किमी लंबी गैस पाइप लाइन से 20 लाख घरों को शीघ्र ही रसोई गैस मिलने लगेगी। गुजरात पीएसयू पेट्रोलियम कार्पोरेशन को आस्ट्रेलिया में ऑयल एक्सप्लोरेशन के लिए 3 ब्लाक तथा मिस्र में 2 ब्लाक प्राप्त हुए हैं और कृष्णा-गोदावरी बेसिन में भी 2 लाख करोड़ रूपए प्राप्त हुए हैं। गुजरात ने सभी सार्वजनिक परिवहनों के लिए सीएनजी गैस में बदलने का काम शुरू कर दिया है ताकि पर्यावरण में सुधार लाया जा सके।
स्वास्थ्य में नई खोजें
'चिरंजीवी योजना' को सिंगापुर में वाशिंगटन पोस्ट का एशियन इन्नोवेटिव एवार्ड प्राप्त हुआ है। 'बेटी वैभव आंदोलन' के कारण महिलाओं की दर प्रति 1000 पुरूष के पीछे 802 से बढ़कर 870 हो गई है। विद्यार्थियों के नि:शुल्क मेडिकल चेक अप का काम हाथ में लिया जा रहा है और उनहें डाक्टरी उपचार तथा आप्रेशन मुफ्त दिया जाएगा। 44000 आंगनवाड़ियों के 3 वर्षा से कम आयु के 10 लाख बच्चों को विटामिन ए-डी पोषाहार दिया जाएगा। विश्व बैंक की सहायता से 30000 टन प्रतिदिन मल उपचार का काम हाथ में लिया जा रहा है जिसकी प्रशंसा सुप्रीम कोर्ट ने भी की है। मेडिकल टूरिज्म की संकल्पना सफल सिध्द हुई है और अहमदाबाद में प्रत्येक अंतर्राष्ट्रीय उड़ान से विदेशी/एनआरआई रोगी यहां आते है। नमक मजदूरों, मछुआरों, आदिवासियों तथा अंदरूनी क्षेत्रों के लए 85 मोबाइल वैन डाक्टरी सेवाओं के लिए दी गई है। शहरी क्षेत्रों से नगर स्वास्थ्य केंद्र शुरू किए गए है।
रविवार, 2 दिसंबर 2007
गुजरात में विकास युग - भाग-1
लेखक-डा. भरत जरीवाला
गुजरात के मुख्यमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी का कहना है कि 'गुजरात भारत को विकास की राह पर ले जाने का साधन बन गया है।' श्री मोदी ने सचमुच इसे सच कर दिखाया है। आज गुजरात भारत के राज्यों में एक आदर्श (मॉडल) बन गया है। गुजरात में इस कदर विकास हुआ है जिसे राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय स्तरों पर मान्यता दी जा रही है। गुजरात को विश्व बैंक, संयुक्त राष्ट्र संघ, यूनेस्को, कामनवेल्थ एसोसिएशन, माइक्रोसाफ्ट, वाशिंगटन पोस्ट, भारत सरकार, योजना आयोग, प्रधानमंत्री, राजीव गांधी फाउंडेशन, इंडिया टूडे और न जाने देश में कहां-कहां से 66 एवार्ड्स/मेडल/मान्यताएं प्राप्त हो चुकी हैं। ऐसा कौन सा क्षेत्र है जहां गुजरात का नाम 'विकास' के दायरे में नहीं आता है-भूकंप प्रबंधन से लेकर देश की विरासत को संभालकर रखना, ई-गवर्नेंस से लेकर विद्युत क्षेत्र में सुधार तक, स्त्री-शिक्षा से लेकर मातृत्व स्वास्थ्य तक, नगरीय डिजाइन तैयार करने से लेकर आर्थिक स्वतंत्रता तक और यहां तक कि सर्वश्रेष्ठ राज्य से लेकर सर्वश्रेष्ठ मुख्यमंत्री तक गुजरात का भंडार श्रेष्ठतम उत्कृष्टताओं से भरा पड़ा है। इतना ही नहीं गुजरात राज्य को तो कल्याण कार्यक्रमों के मामले में भी प्रथम स्थान पर रखा गया है।
हर मामले में सर्वोत्कृष्ट
एक मामूली से संकेत से सब कुछ सामने आ जाता है। 10वीं योजना (2002-07) की अवधि में गुजरात की विकास दर (जीडीपी) सभी राज्यों में सर्वश्रेष्ठ 10.67 प्रतिशत रही जबकि लक्ष्य 10 प्रतिशत का था और स्वयं देश की जीडीपी मात्र 8 प्रतिशत रही।
योजना आयोग के अनुसार गुजरात निर्धनता उन्मूलन में सभी राज्यों में प्रथम स्थान रखता है। इस राज्य में गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों की संख्या सब से कम 15 प्रतिशत मात्र हैं। गुजरात ने दलितों के 20 सूत्री कार्यक्रम कार्यान्वयन में भी तमाम 5 वर्षों में अव्वल श्रेणी प्राप्त की है। गुजरात ही ऐसा प्रदेश है जहां सभी असंगठित मजदूरों, किसानों, विकलांगों, विद्यार्थियों, विधवाओं आदि के लिए एक लाख रूपए का दुर्घटना बीमा किया जाता है। गुजरात ही रोजगार दफ्तरों के माध्यम से रोजगार प्रदान करता है, यहां सभी राज्यों का कुल 54 प्रतिशत रोजगार का हिस्सा बना हुआ है। पिछले 5 वर्षों से मोतियाबंद के आप्रेशन में भी गुजरात ने अपना प्रथम स्थान बनाए रखा है।
ग्रामीण बुनियादी ढांचा
गुजरात में 100 प्रतिशत गांवों में 24 घंटे बिजली उपलब्ध है, 99 प्रतिशत गांवों में सभी मौसमों वाली सड़कें बनी हुई हैं जिनमें 96 प्रतिशत गांवों में पक्की सड़कें बनी हैं, 99 प्रतिशत गांवों में सार्वजनिक बस सेवा उपलब्ध है और 99 प्रतिशत गांवों में स्वच्छ पेयजल मिलता रहता है जबकि इसकी तुलना में पूरे भारत का औसत केवल 50 प्रतिशत बैठता है।
जल क्रांति
स्वतंत्रता के समय से सूखा पीड़ित तथा चिरंतन जल के अभाव वाले राज्य में अब गुजरात जल क्रांति की दिशा में बढ़ रहा है। गुजरात में 18000 चैक-बांध, 45000 बोरी बांध, 13700 फार्म पौंड और गहरी खुदाई वाले 15000 ग्राम जलाशय बनाए गए हैं। जल स्तर बढ़ा कर 121.92 मीटर किया गया है जिससे सभी गांवों को पाइपलाइन के जरिए स्वच्छ जल मिल सके। भूमिगत जल टयूबवेल 150 फीट गहरे खोदे गए हैं। अब गुजरात टैंकर मुक्त राज्य बन गया है। सूखा पीड़ित राज्य तो इतिहास बन चुका है तथा सौराष्ट्र, कच्छ और उत्तरी गुजरात से लोगों का पलायन बंद हो गया है।
नर्मदा बिजली
सरदार सरोवर बांध का कंक्रीट वाला काम पूरा हो चुका है और अब केवल 30 द्वारों को पूरा करना बांकी है। 11450 मेगावाट के दोनों बिजली घरों का काम 2004 तथा 2006 में शुरू हुआ था। सरदार सरोवर परियोजना से मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र को उनके हिस्से की 57 प्रतिशत तथा 27 प्रतिशत बिजली मिलनी शुरू हो चुकी है। सुजला सुफलां योजना लगभग पूरी हो चुकी है जिससे नर्मदा नदी से बानस नदी से प्राप्त पानी को उपशहरों तथा 4000 गांवों को दिया जाता है।
गुजरात के मुख्यमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी का कहना है कि 'गुजरात भारत को विकास की राह पर ले जाने का साधन बन गया है।' श्री मोदी ने सचमुच इसे सच कर दिखाया है। आज गुजरात भारत के राज्यों में एक आदर्श (मॉडल) बन गया है। गुजरात में इस कदर विकास हुआ है जिसे राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय स्तरों पर मान्यता दी जा रही है। गुजरात को विश्व बैंक, संयुक्त राष्ट्र संघ, यूनेस्को, कामनवेल्थ एसोसिएशन, माइक्रोसाफ्ट, वाशिंगटन पोस्ट, भारत सरकार, योजना आयोग, प्रधानमंत्री, राजीव गांधी फाउंडेशन, इंडिया टूडे और न जाने देश में कहां-कहां से 66 एवार्ड्स/मेडल/मान्यताएं प्राप्त हो चुकी हैं। ऐसा कौन सा क्षेत्र है जहां गुजरात का नाम 'विकास' के दायरे में नहीं आता है-भूकंप प्रबंधन से लेकर देश की विरासत को संभालकर रखना, ई-गवर्नेंस से लेकर विद्युत क्षेत्र में सुधार तक, स्त्री-शिक्षा से लेकर मातृत्व स्वास्थ्य तक, नगरीय डिजाइन तैयार करने से लेकर आर्थिक स्वतंत्रता तक और यहां तक कि सर्वश्रेष्ठ राज्य से लेकर सर्वश्रेष्ठ मुख्यमंत्री तक गुजरात का भंडार श्रेष्ठतम उत्कृष्टताओं से भरा पड़ा है। इतना ही नहीं गुजरात राज्य को तो कल्याण कार्यक्रमों के मामले में भी प्रथम स्थान पर रखा गया है।
हर मामले में सर्वोत्कृष्ट
एक मामूली से संकेत से सब कुछ सामने आ जाता है। 10वीं योजना (2002-07) की अवधि में गुजरात की विकास दर (जीडीपी) सभी राज्यों में सर्वश्रेष्ठ 10.67 प्रतिशत रही जबकि लक्ष्य 10 प्रतिशत का था और स्वयं देश की जीडीपी मात्र 8 प्रतिशत रही।
योजना आयोग के अनुसार गुजरात निर्धनता उन्मूलन में सभी राज्यों में प्रथम स्थान रखता है। इस राज्य में गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों की संख्या सब से कम 15 प्रतिशत मात्र हैं। गुजरात ने दलितों के 20 सूत्री कार्यक्रम कार्यान्वयन में भी तमाम 5 वर्षों में अव्वल श्रेणी प्राप्त की है। गुजरात ही ऐसा प्रदेश है जहां सभी असंगठित मजदूरों, किसानों, विकलांगों, विद्यार्थियों, विधवाओं आदि के लिए एक लाख रूपए का दुर्घटना बीमा किया जाता है। गुजरात ही रोजगार दफ्तरों के माध्यम से रोजगार प्रदान करता है, यहां सभी राज्यों का कुल 54 प्रतिशत रोजगार का हिस्सा बना हुआ है। पिछले 5 वर्षों से मोतियाबंद के आप्रेशन में भी गुजरात ने अपना प्रथम स्थान बनाए रखा है।
ग्रामीण बुनियादी ढांचा
गुजरात में 100 प्रतिशत गांवों में 24 घंटे बिजली उपलब्ध है, 99 प्रतिशत गांवों में सभी मौसमों वाली सड़कें बनी हुई हैं जिनमें 96 प्रतिशत गांवों में पक्की सड़कें बनी हैं, 99 प्रतिशत गांवों में सार्वजनिक बस सेवा उपलब्ध है और 99 प्रतिशत गांवों में स्वच्छ पेयजल मिलता रहता है जबकि इसकी तुलना में पूरे भारत का औसत केवल 50 प्रतिशत बैठता है।
जल क्रांति
स्वतंत्रता के समय से सूखा पीड़ित तथा चिरंतन जल के अभाव वाले राज्य में अब गुजरात जल क्रांति की दिशा में बढ़ रहा है। गुजरात में 18000 चैक-बांध, 45000 बोरी बांध, 13700 फार्म पौंड और गहरी खुदाई वाले 15000 ग्राम जलाशय बनाए गए हैं। जल स्तर बढ़ा कर 121.92 मीटर किया गया है जिससे सभी गांवों को पाइपलाइन के जरिए स्वच्छ जल मिल सके। भूमिगत जल टयूबवेल 150 फीट गहरे खोदे गए हैं। अब गुजरात टैंकर मुक्त राज्य बन गया है। सूखा पीड़ित राज्य तो इतिहास बन चुका है तथा सौराष्ट्र, कच्छ और उत्तरी गुजरात से लोगों का पलायन बंद हो गया है।
नर्मदा बिजली
सरदार सरोवर बांध का कंक्रीट वाला काम पूरा हो चुका है और अब केवल 30 द्वारों को पूरा करना बांकी है। 11450 मेगावाट के दोनों बिजली घरों का काम 2004 तथा 2006 में शुरू हुआ था। सरदार सरोवर परियोजना से मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र को उनके हिस्से की 57 प्रतिशत तथा 27 प्रतिशत बिजली मिलनी शुरू हो चुकी है। सुजला सुफलां योजना लगभग पूरी हो चुकी है जिससे नर्मदा नदी से बानस नदी से प्राप्त पानी को उपशहरों तथा 4000 गांवों को दिया जाता है।
शुक्रवार, 30 नवंबर 2007
आदर्श के रूप में गुजरात
लेखक- राजनाथ सिंह सूर्य
स्वर्गीय लक्ष्मीकांत तिवारी उत्तर प्रदेश के मूर्धन्य पत्रकार थे। दायित्व की दक्षता के साथ-साथ हास-परिहास से सदैव प्रफुल्लित रहने वाले लक्ष्मीकांत तिवारी उस समय टूट गए जब उनके होनहार पुत्र की मोहल्ले के गुंडों ने चाकू मारकर हत्या कर दी। वह कई महीने घर से नहीं निकले। एक दिन अचानक विधानभवन स्थित प्रेस क्लब आ गए। वहां बैठे सभी लोग चुप हो गए, लेकिन तिवारी जी ने अपने पुराने अंदाज में लोगों को गुदगुदाना शुरू कर दिया। थोड़ी देर बैठने के बाद मुझसे बोले, चलो तुम्हारे कार्यालय चलता हूं। विधान भवन के द्वार पर निकलते समय एक और वरिष्ठ पत्रकार मिल गए। तिवारी जी को देखते ही लंबी सांस लेकर बोले, आपके बेटे के बारे में जानकर बहुत दु:ख हुआ। उनकी बात सुनकर तिवारी जी लड़खड़ा गए। थोड़ी देर बाद बोले, मैं जिस बात को भूलना चाहता हूं, सहानुभूति दिखाने वाले उसी को याद दिला देते है। इस घटना को तीस वर्ष के लगभग हो गए। जब-जब देश के सेकुलरिस्ट गुजरात के पीड़ितों के नाम पर एकजुटता दिखाकर मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को घेरने का प्रयास करते है तब-तब उक्त घटना मुझे याद आ जाती है। जैसे तिवारी जी अपने बेटे की मौत का गम भूल जाना चाहते हैं उसी तरह गुजरात के लोग भी गोधरा और उसके बाद की घटनाओं को भूल जाना चाहते है। उस काले अध्याय के बाद गुजरात ने विकास की जैसी दिशा पकड़ ली है वही ऐसी त्रासदी से उबरने का सर्वोत्तम उपाय है। जो लोग सार्वजनिक रूप से नरेन्द्र मोदी से गुजरात को मुक्त कराने की मुहिम चला रहे है वे भी यह स्वीकार किए बिना नहीं रह पाते हैं कि देश में यदि सर्वाधिक विकासोन्मुख कोई राज्य है तो वह गुजरात है और इसका श्रेय भी वे नरेन्द्र मोदी को देते है। आज के राजनीतिक माहौल में जहां ज्यादातर मुख्यमंत्री या अन्य राजनेता किसी न किसी निजी आचरण के कारण चर्चित है तब नरेन्द्र मोदी की चर्चा उनकी प्रशासन क्षमता के कारण हो रही है।
गुजरात में विधानसभा का चुनाव का वक्त आ गया है। नरेन्द्र मोदी के खिलाफ देश के सेकुलरिस्टों और कांग्रेस के साथ-साथ भाजपा के कुछ असंतुष्टों ने कमर कस ली है, लेकिन वे जो भी वार करते है उसकी धार मुड़ जाती है। तहलका द्वारा गोधरा के बाद की स्थिति के संदर्भ में जो स्टिंग आपरेशन किया गया उसके प्रसारण से देश के अन्य भागों में चाहे जैसी प्रतिक्रिया रही हो, गुजरात में उस कथित रहस्योद्घाटन को कोई महत्व नहीं दे रहा। अब तो सेकुलरिस्ट भी उसकी चर्चा नहीं करते, क्योंकि उन्हे भय है कि वर्णित तथ्यों के प्रचार का लाभ नरेन्द्र मोदी को ही मिलेगा। गुजराती स्वभाव से अध्यावसायी हैं। उनमें उद्यमशीलता कूट-कूट कर भरी हुई है। भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद से इस गुजराती स्वभाव को परवान चढ़ाने का प्रयास किया गया। नरेन्द्र मोदी ने उसे सफल कर दिखाया। साबरमती नदी में नौकायन हो रहा है। नदियों का जल समुद्र में जाने से रोक कर अनेक विशाल जलाशयों में संरक्षित किया गया ताकि लोगों को पर्याप्त जल मिल सके। कृषि में भी इस जल का भरपूर उपयोग हो रहा है। गुजरातियों की मानसिकता का अनुमान भयावह भूकंप से हुई तबाही के बाद पुन: संरचना के प्रयासों की सफलता से लगाया जा सकता है। ऐसी मानसिकता वाले अवाम को जब उसी मानसिकता का नेतृत्व मिल जाता है तो उसका वही परिणाम होता है जो आज गुजरात में हो रहा है। नरेन्द्र मोदी को राजनीतिज्ञ चाहे जिस दृष्टि से देखते हों, उनकी अपनी पार्टी में भी उनके प्रति चाहे जैसा असंतोष हो, गुजरात की जनता तो इस संभावना से चिंतित है कि आगामी लोकसभा चुनाव के बाद नरेन्द्र मोदी की भूमिका कहीं दिल्ली में केंद्रित न हो जाए। वे मोदी को अभी मुख्यमंत्री के रूप में ही देखना चाहते है।
यह आकलन उन सेकुलर पत्रकारों का है जो मोदी को जेल के सीखचों में बंद देखना चाहते है। मेरा मकसद नरेन्द्र मोदी की तारीफ में कसीदे काढ़ना नहीं है और न मेरा तात्पर्य यह समझाने का प्रयास करना है कि मोदी की चुनावी सफलता सुनिश्चित है। द्वितीय विश्व युद्ध जीतने के बावजूद यदि ब्रिटेन में विंस्टन चर्चिल चुनाव हार सकते हैं तो गुजरात में नरेन्द्र मोदी क्यों नहीं हार सकते। हमारे देश में चुनाव में हार-जीत तात्कालिक उभरी स्थानीय भावना का अधिक योगदान होता है। जो लोग गोधरा के बाद की घटनाओं को उजागर करने में लगे है वे ऐसा करते समय यह भूल जाते है कि आखिरकार बाद की घटनाएं क्यों घटित हुईं। गोधरा रेलवे स्टेशन पर साबरमती एक्सप्रेस के डिब्बे में दर्जनों लोगों को जिंदा जला देने की प्रतिक्रिया को वे लोग स्वाभाविक नहीं मानते जो विवादित ढांचा ध्वस्त होने के बाद की प्रतिक्रिया को स्वाभाविक मान लेने की वकालत बराबर करते रहे हैं। गोधरा न हुआ होता तो बाद की घटनाएं न होतीं। इसलिए जब बाद की घटनाओं को उभारा जाता है तो गोधरा अपने आप उभरकर सामने आ जाता है।
गुजरात के सभी विचारवान लोगों का मानना है कि उस काले अध्याय को भूलकर भविष्य की ओर देखने में ही गुजरात का भला है। नरेन्द्र मोदी ने यह किया और उसका लाभ प्रत्येक गुजराती को मिल रहा है। अतीत में जब भी कहीं ऐसी घटनाएं हुई है उन्हे और कुरेदने के बजाय मरहम लगाने का प्रयास किया गया। इसी कारण दंगों की जांच रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की जाती रही है, लेकिन अब इस मामले में भी कांग्रेस ने सेकुलरिस्टों और वामपंथियों के दबाव में झुकना शुरू कर दिया है। जिस कांग्रेस ने राजीव गांधी हत्याकांड में डीएमके की लिप्तता के संदर्भ में जैन कमीशन के निष्कर्ष के आधार पर गुजराल सरकार को गिरा दिया वही आज डीएमके के साथ मिलकर केंद्र की सत्ता चला रही है। यदि यह प्रयास अतीत के घावों को न कुरेदने की नीति के अनुरूप है तो फिर ऐसे अन्य घावों पर मरहम लगाने के बजाय उन्हें कुरेदने की कोशिश क्यों की जा रही है। गुजरात की जनता ही अब इसका उत्तर देगी।
स्वर्गीय लक्ष्मीकांत तिवारी उत्तर प्रदेश के मूर्धन्य पत्रकार थे। दायित्व की दक्षता के साथ-साथ हास-परिहास से सदैव प्रफुल्लित रहने वाले लक्ष्मीकांत तिवारी उस समय टूट गए जब उनके होनहार पुत्र की मोहल्ले के गुंडों ने चाकू मारकर हत्या कर दी। वह कई महीने घर से नहीं निकले। एक दिन अचानक विधानभवन स्थित प्रेस क्लब आ गए। वहां बैठे सभी लोग चुप हो गए, लेकिन तिवारी जी ने अपने पुराने अंदाज में लोगों को गुदगुदाना शुरू कर दिया। थोड़ी देर बैठने के बाद मुझसे बोले, चलो तुम्हारे कार्यालय चलता हूं। विधान भवन के द्वार पर निकलते समय एक और वरिष्ठ पत्रकार मिल गए। तिवारी जी को देखते ही लंबी सांस लेकर बोले, आपके बेटे के बारे में जानकर बहुत दु:ख हुआ। उनकी बात सुनकर तिवारी जी लड़खड़ा गए। थोड़ी देर बाद बोले, मैं जिस बात को भूलना चाहता हूं, सहानुभूति दिखाने वाले उसी को याद दिला देते है। इस घटना को तीस वर्ष के लगभग हो गए। जब-जब देश के सेकुलरिस्ट गुजरात के पीड़ितों के नाम पर एकजुटता दिखाकर मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को घेरने का प्रयास करते है तब-तब उक्त घटना मुझे याद आ जाती है। जैसे तिवारी जी अपने बेटे की मौत का गम भूल जाना चाहते हैं उसी तरह गुजरात के लोग भी गोधरा और उसके बाद की घटनाओं को भूल जाना चाहते है। उस काले अध्याय के बाद गुजरात ने विकास की जैसी दिशा पकड़ ली है वही ऐसी त्रासदी से उबरने का सर्वोत्तम उपाय है। जो लोग सार्वजनिक रूप से नरेन्द्र मोदी से गुजरात को मुक्त कराने की मुहिम चला रहे है वे भी यह स्वीकार किए बिना नहीं रह पाते हैं कि देश में यदि सर्वाधिक विकासोन्मुख कोई राज्य है तो वह गुजरात है और इसका श्रेय भी वे नरेन्द्र मोदी को देते है। आज के राजनीतिक माहौल में जहां ज्यादातर मुख्यमंत्री या अन्य राजनेता किसी न किसी निजी आचरण के कारण चर्चित है तब नरेन्द्र मोदी की चर्चा उनकी प्रशासन क्षमता के कारण हो रही है।
गुजरात में विधानसभा का चुनाव का वक्त आ गया है। नरेन्द्र मोदी के खिलाफ देश के सेकुलरिस्टों और कांग्रेस के साथ-साथ भाजपा के कुछ असंतुष्टों ने कमर कस ली है, लेकिन वे जो भी वार करते है उसकी धार मुड़ जाती है। तहलका द्वारा गोधरा के बाद की स्थिति के संदर्भ में जो स्टिंग आपरेशन किया गया उसके प्रसारण से देश के अन्य भागों में चाहे जैसी प्रतिक्रिया रही हो, गुजरात में उस कथित रहस्योद्घाटन को कोई महत्व नहीं दे रहा। अब तो सेकुलरिस्ट भी उसकी चर्चा नहीं करते, क्योंकि उन्हे भय है कि वर्णित तथ्यों के प्रचार का लाभ नरेन्द्र मोदी को ही मिलेगा। गुजराती स्वभाव से अध्यावसायी हैं। उनमें उद्यमशीलता कूट-कूट कर भरी हुई है। भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद से इस गुजराती स्वभाव को परवान चढ़ाने का प्रयास किया गया। नरेन्द्र मोदी ने उसे सफल कर दिखाया। साबरमती नदी में नौकायन हो रहा है। नदियों का जल समुद्र में जाने से रोक कर अनेक विशाल जलाशयों में संरक्षित किया गया ताकि लोगों को पर्याप्त जल मिल सके। कृषि में भी इस जल का भरपूर उपयोग हो रहा है। गुजरातियों की मानसिकता का अनुमान भयावह भूकंप से हुई तबाही के बाद पुन: संरचना के प्रयासों की सफलता से लगाया जा सकता है। ऐसी मानसिकता वाले अवाम को जब उसी मानसिकता का नेतृत्व मिल जाता है तो उसका वही परिणाम होता है जो आज गुजरात में हो रहा है। नरेन्द्र मोदी को राजनीतिज्ञ चाहे जिस दृष्टि से देखते हों, उनकी अपनी पार्टी में भी उनके प्रति चाहे जैसा असंतोष हो, गुजरात की जनता तो इस संभावना से चिंतित है कि आगामी लोकसभा चुनाव के बाद नरेन्द्र मोदी की भूमिका कहीं दिल्ली में केंद्रित न हो जाए। वे मोदी को अभी मुख्यमंत्री के रूप में ही देखना चाहते है।
यह आकलन उन सेकुलर पत्रकारों का है जो मोदी को जेल के सीखचों में बंद देखना चाहते है। मेरा मकसद नरेन्द्र मोदी की तारीफ में कसीदे काढ़ना नहीं है और न मेरा तात्पर्य यह समझाने का प्रयास करना है कि मोदी की चुनावी सफलता सुनिश्चित है। द्वितीय विश्व युद्ध जीतने के बावजूद यदि ब्रिटेन में विंस्टन चर्चिल चुनाव हार सकते हैं तो गुजरात में नरेन्द्र मोदी क्यों नहीं हार सकते। हमारे देश में चुनाव में हार-जीत तात्कालिक उभरी स्थानीय भावना का अधिक योगदान होता है। जो लोग गोधरा के बाद की घटनाओं को उजागर करने में लगे है वे ऐसा करते समय यह भूल जाते है कि आखिरकार बाद की घटनाएं क्यों घटित हुईं। गोधरा रेलवे स्टेशन पर साबरमती एक्सप्रेस के डिब्बे में दर्जनों लोगों को जिंदा जला देने की प्रतिक्रिया को वे लोग स्वाभाविक नहीं मानते जो विवादित ढांचा ध्वस्त होने के बाद की प्रतिक्रिया को स्वाभाविक मान लेने की वकालत बराबर करते रहे हैं। गोधरा न हुआ होता तो बाद की घटनाएं न होतीं। इसलिए जब बाद की घटनाओं को उभारा जाता है तो गोधरा अपने आप उभरकर सामने आ जाता है।
गुजरात के सभी विचारवान लोगों का मानना है कि उस काले अध्याय को भूलकर भविष्य की ओर देखने में ही गुजरात का भला है। नरेन्द्र मोदी ने यह किया और उसका लाभ प्रत्येक गुजराती को मिल रहा है। अतीत में जब भी कहीं ऐसी घटनाएं हुई है उन्हे और कुरेदने के बजाय मरहम लगाने का प्रयास किया गया। इसी कारण दंगों की जांच रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की जाती रही है, लेकिन अब इस मामले में भी कांग्रेस ने सेकुलरिस्टों और वामपंथियों के दबाव में झुकना शुरू कर दिया है। जिस कांग्रेस ने राजीव गांधी हत्याकांड में डीएमके की लिप्तता के संदर्भ में जैन कमीशन के निष्कर्ष के आधार पर गुजराल सरकार को गिरा दिया वही आज डीएमके के साथ मिलकर केंद्र की सत्ता चला रही है। यदि यह प्रयास अतीत के घावों को न कुरेदने की नीति के अनुरूप है तो फिर ऐसे अन्य घावों पर मरहम लगाने के बजाय उन्हें कुरेदने की कोशिश क्यों की जा रही है। गुजरात की जनता ही अब इसका उत्तर देगी।
रविवार, 25 नवंबर 2007
आपरेशन कलंक और गुजरात का सच - बलबीर पुंज
विगत 25 अक्टूबर को कुछ टीवी चैनलों पर आपरेशन कलंक और गुजरात का सच शीर्षक से गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को निशाना बनाने के लिए किए गए स्टिंग ऑपरेशन को प्रसारित किया गया। कांग्रेस को मदद पहुंचाने में जुटे चर्च और विदेशी सहायता प्राप्त कुछ स्वयंसेवी संगठनों के वित्तपोषण पर रची गई इस साजिश का एक ही उद्देश्य था, 2002 के गुजरात दंगों के जख्मों को कुरेद कर कांग्रेस के लिए चुनावी मुद्दा उपलब्ध कराना और भाजपा सरकार ने अपने कार्यकाल में जिस विकसित और सशक्त गुजरात का निर्माण किया है उसकी ओर से जनता का ध्यान हटाकर समाज को पंथिक तनाव में झोंकना। जिन चौदह लोगों के बयान कैमरे में कैद किए गए हैं उनमें से तीन- बजरंग दल के पूर्व नेता बाबू बजरंगी, विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ता सुरेश रिचर्ड और रमेश दवे का सफेद झूठ सामने आ चुका है। बाबू बजरंगी और रिचर्ड ने कैमरे पर कहा कि उसने नरोदा पाटिया में मुसलमानों की हत्या की और पल-पल की जानकारी गृहमंत्री को मिलती रही। गृहमंत्री और मुख्यमंत्री से उसे शाबाशी भी मिली और जब नरेंद्र मोदी दंगे के एक दिन बाद (28 फरवरी) नरोदा पाटिया के दौरे पर आए तो उन्हें धन्यवाद कहा। आधिकारिक रिकार्ड के अनुसार उक्त तिथि को मोदी वहां गए ही नहीं।
बाबू बजरंगी और रिचर्ड की तरह विहिप कार्यकर्ता रमेश दवे ने दावा किया कि दरियापुर क्षेत्र के डीएसपी एसके गांधी ने उनसे पांच मुसलमानों को मारने का वादा किया था और उन्होंने अपना वादा पूरा भी किया। जबकि आधिकारिक रिकार्ड के अनुसार दरियापुर दंगे के एक माह बाद गांधी की वहां बहाली हुई थी और उनके कार्यकाल में दंगे की एक भी घटना नहीं हुई। जालसाज पत्रकारों का एक और निशाना बने सरकारी वकील अरविंद पांड्या। उनके मुंह से नानावती आयोग के दोनों न्यायाधीशों की प्रामाणिकता और निष्पक्षता पर कीचड़ उछलवाया गया था, जबकि पांड्या के अनुसार एक चैनल के पुराने परिचित पत्रकार ने उनसे एक टीवी सीरियल पागल तमाशा के लिए संपर्क किया था। पत्रकार ने कुछ वास्तविक चरित्रों को शामिल करने के नाम पर उन्हें अपने जाल में लपेट लिया। अरविंद पांड्या को एक लिखित स्क्रिप्ट पढ़ने को दी गई। तीन-साढ़े तीन घंटे की इस रिकार्डिग में से अनुकूल वाक्यों को इस स्टिंग ऑपरेशन में जोड़ दिया गया।
वस्तुत: गुजरात में चुनावी सरगर्मी बढ़ने के साथ ही सेकुलरिस्टों का दुष्प्रचार भी तेज हो गया है। गोधरा संहार की प्रतिक्रिया में भड़के दंगों में 790 मुसलमान और 254 हिंदू मारे गए थे। पांच साल पूर्व की इस घटना के लिए अब तक पंद्रह से अधिक हिंदू-मुसलमानों को दंडित किया जा चुका है। इसकी तुलना में 23 साल पूर्व कांग्रेस पार्टी द्वारा प्रायोजित देशव्यापी सिख नरसंहार में तीन हजार से अधिक सिख मारे गए थे, किंतु अब तक केवल तेरह पर ही आरोप लगाए गए हैं, दोष सिद्ध होना बाकी है। कांग्रेस से जुड़े तमाम बड़े नेता आरोपों से बरी किए जा चुके हैं। जगदीश टाइटलर पर अभी मामला अदालत में चल रहा है, लेकिन कांग्रेस के बचाव में सीबीआई ने हाल में उन्हें भी क्लीन चिट दे दी, जिस पर अदालत ने अपनी आपत्ति भी व्यक्त की है। सेकुलर मीडिया को यहां दायित्वबोध नहीं होता। लोकतंत्र का सजग प्रहरी होने के नाम पर गुजरात दंगों के दौरान सेकुलर मीडिया ने जिस तरह अतिरंजित कथानकों के साथ समाचार परोसे, उसका एक ही उद्देश्य था- सारी दुनिया में नरेंद्र मोदी और भाजपा की छवि हिटलर और नीरो के रूप में बनाना। हकीकत यह है कि वहां के स्थानीय समाचार पत्र गुजरात के जिस सच को प्रकाशित कर रहे थे उसकी सेकुलर राष्ट्रीय मीडिया में अनदेखी की गई, किंतु राज्य की जनता उससे प्रभावित नहीं हुई।
गुजरात दंगों के लिए भाजपा पर लगाए जा रहे झूठे आरोपों के बावजूद जनता ने दूसरी बार भी राजकाज चलाने का भार भाजपा को सौंपा। उसके बाद हुए नगर निगम, नगर पालिका और ग्राम सभा के चुनावों में भी भाजपा को भारी बढ़त के साथ जीत हासिल हुई। भाजपा के दूसरे कार्यकाल में एक भी दंगा नहीं हुआ। दिल्ली-कोलकाता-चेन्नई में आज चौबीस घंटे भले ही बिजली की आपूर्ति नहीं हो, किंतु गुजरात के गांवों में दिन-रात बिजली की अबाधित आपूर्ति हो रही है। कभी पानी की किल्लत से जूझ रहे गांवों को नियमित जल उपलब्ध हो रहा है। गुजरात आज दूसरे राज्यों को भी जल की आपूर्ति कर रहा है। विकास के मामले में गुजरात देश का अव्वल व समृद्ध राज्य है। यहां विकास दर 10 प्रतिशत से अधिक है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने कहा है कि विदेशी निवेश के मामले में गुजरात पहले नंबर पर है और पूरे देश का चौथाई से अधिक विदेशी पूंजी निवेश अकेले गुजरात में हुआ। अंतरराष्ट्रीय संस्था-अर्नस्ट एंड यंग ने गुजरात की 72 योजनाओं का अध्ययन किया और उसे देश के दूसरे राज्यों के लिए अनुकरणीय बताया। राजीव गांधी फाउंडेशन ने गुजरात को सर्वोत्तम राज्य कहा है। अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य संगठन ने गुजरात की स्वास्थ्य संबंधी योजनाओं की सराहना की है, जिसे हाल में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री भी दोहरा चुके हैं। जिस विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज) योजना के कारण कई राज्यों में हिंसा व्याप्त है, उस सेज योजना में भी गुजरात सबसे आगे है। कहीं कोई हिंसा नहीं। 2007 में जो राज्य विकास की प्रयोगशाला बन चुका है, उसे बार-बार 2002 के कथित हिंदुत्व की प्रयोगशाला से क्यों जोड़ा जा रहा है। सन 2002 से ही नरेंद्र मोदी और गुजरात पर निरंतर कीचड़ उछालने में लगे शबनम हाशमी, तीस्ता सीतलवाड़, हर्ष मंदर, मुकुल सिन्हा, कैथोलिक चर्च के फादर सेड्रिक प्रकाश, दलित नेता मक्वान मार्टिन और उनके द्वारा खड़े किए गए स्वयंसेवी संगठनों के वित्तीय स्त्रोत क्या हैं।
यदि फर्जी आंकड़ों और गवाहों के आधार पर 2002 की गुजरात सरकार नरसंहार की आरोपी है तो 1984 की कांग्रेस सरकार को क्या संज्ञा दी जाए। गुजरात के दंगों के तुरंत बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने दंगों को देश का कलंक की संज्ञा दी और मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को राजधर्म निभाने का निर्देश दिया। इसके विपरीत 1984 के सिख दंगों के मामले में देश को 21 वर्ष प्रतीक्षा करनी पड़ी। 2005 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 1984 के दंगों के लिए देश से क्षमा याचना की। 1984 के दंगों की विभीषिका के बीच तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने दंगों को लगभग न्यायोचित ठहराते हुए कहा था, जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती ही है। अगले महीने गुजरात की जनता को अपनी नई सरकार चुननी है। चुनावी मुद्दा क्या होना चाहिए। 2002 का गोधरा कांड और उसके बाद के दंगे या गुजरात का अब तक का विकास और आगे की योजना। नरेंद्र मोदी, जिनका वर्षो से पंथिक आधार पर दानवीकरण किया गया, तो साढ़े पांच करोड़ गुजरातियों के विकास और अस्मिता के मुद्दे पर चुनाव लड़ रहे हैं, किंतु उनके विरोधी दंगों के जख्मों को कुरेद कर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकना चाहते हैं। क्या यह भारतीय सेकुलरिज्म का घिनौना सच नहीं।
लेखक भाजपा के राष्ट्रीय सचिव हैं।
बाबू बजरंगी और रिचर्ड की तरह विहिप कार्यकर्ता रमेश दवे ने दावा किया कि दरियापुर क्षेत्र के डीएसपी एसके गांधी ने उनसे पांच मुसलमानों को मारने का वादा किया था और उन्होंने अपना वादा पूरा भी किया। जबकि आधिकारिक रिकार्ड के अनुसार दरियापुर दंगे के एक माह बाद गांधी की वहां बहाली हुई थी और उनके कार्यकाल में दंगे की एक भी घटना नहीं हुई। जालसाज पत्रकारों का एक और निशाना बने सरकारी वकील अरविंद पांड्या। उनके मुंह से नानावती आयोग के दोनों न्यायाधीशों की प्रामाणिकता और निष्पक्षता पर कीचड़ उछलवाया गया था, जबकि पांड्या के अनुसार एक चैनल के पुराने परिचित पत्रकार ने उनसे एक टीवी सीरियल पागल तमाशा के लिए संपर्क किया था। पत्रकार ने कुछ वास्तविक चरित्रों को शामिल करने के नाम पर उन्हें अपने जाल में लपेट लिया। अरविंद पांड्या को एक लिखित स्क्रिप्ट पढ़ने को दी गई। तीन-साढ़े तीन घंटे की इस रिकार्डिग में से अनुकूल वाक्यों को इस स्टिंग ऑपरेशन में जोड़ दिया गया।
वस्तुत: गुजरात में चुनावी सरगर्मी बढ़ने के साथ ही सेकुलरिस्टों का दुष्प्रचार भी तेज हो गया है। गोधरा संहार की प्रतिक्रिया में भड़के दंगों में 790 मुसलमान और 254 हिंदू मारे गए थे। पांच साल पूर्व की इस घटना के लिए अब तक पंद्रह से अधिक हिंदू-मुसलमानों को दंडित किया जा चुका है। इसकी तुलना में 23 साल पूर्व कांग्रेस पार्टी द्वारा प्रायोजित देशव्यापी सिख नरसंहार में तीन हजार से अधिक सिख मारे गए थे, किंतु अब तक केवल तेरह पर ही आरोप लगाए गए हैं, दोष सिद्ध होना बाकी है। कांग्रेस से जुड़े तमाम बड़े नेता आरोपों से बरी किए जा चुके हैं। जगदीश टाइटलर पर अभी मामला अदालत में चल रहा है, लेकिन कांग्रेस के बचाव में सीबीआई ने हाल में उन्हें भी क्लीन चिट दे दी, जिस पर अदालत ने अपनी आपत्ति भी व्यक्त की है। सेकुलर मीडिया को यहां दायित्वबोध नहीं होता। लोकतंत्र का सजग प्रहरी होने के नाम पर गुजरात दंगों के दौरान सेकुलर मीडिया ने जिस तरह अतिरंजित कथानकों के साथ समाचार परोसे, उसका एक ही उद्देश्य था- सारी दुनिया में नरेंद्र मोदी और भाजपा की छवि हिटलर और नीरो के रूप में बनाना। हकीकत यह है कि वहां के स्थानीय समाचार पत्र गुजरात के जिस सच को प्रकाशित कर रहे थे उसकी सेकुलर राष्ट्रीय मीडिया में अनदेखी की गई, किंतु राज्य की जनता उससे प्रभावित नहीं हुई।
गुजरात दंगों के लिए भाजपा पर लगाए जा रहे झूठे आरोपों के बावजूद जनता ने दूसरी बार भी राजकाज चलाने का भार भाजपा को सौंपा। उसके बाद हुए नगर निगम, नगर पालिका और ग्राम सभा के चुनावों में भी भाजपा को भारी बढ़त के साथ जीत हासिल हुई। भाजपा के दूसरे कार्यकाल में एक भी दंगा नहीं हुआ। दिल्ली-कोलकाता-चेन्नई में आज चौबीस घंटे भले ही बिजली की आपूर्ति नहीं हो, किंतु गुजरात के गांवों में दिन-रात बिजली की अबाधित आपूर्ति हो रही है। कभी पानी की किल्लत से जूझ रहे गांवों को नियमित जल उपलब्ध हो रहा है। गुजरात आज दूसरे राज्यों को भी जल की आपूर्ति कर रहा है। विकास के मामले में गुजरात देश का अव्वल व समृद्ध राज्य है। यहां विकास दर 10 प्रतिशत से अधिक है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने कहा है कि विदेशी निवेश के मामले में गुजरात पहले नंबर पर है और पूरे देश का चौथाई से अधिक विदेशी पूंजी निवेश अकेले गुजरात में हुआ। अंतरराष्ट्रीय संस्था-अर्नस्ट एंड यंग ने गुजरात की 72 योजनाओं का अध्ययन किया और उसे देश के दूसरे राज्यों के लिए अनुकरणीय बताया। राजीव गांधी फाउंडेशन ने गुजरात को सर्वोत्तम राज्य कहा है। अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य संगठन ने गुजरात की स्वास्थ्य संबंधी योजनाओं की सराहना की है, जिसे हाल में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री भी दोहरा चुके हैं। जिस विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज) योजना के कारण कई राज्यों में हिंसा व्याप्त है, उस सेज योजना में भी गुजरात सबसे आगे है। कहीं कोई हिंसा नहीं। 2007 में जो राज्य विकास की प्रयोगशाला बन चुका है, उसे बार-बार 2002 के कथित हिंदुत्व की प्रयोगशाला से क्यों जोड़ा जा रहा है। सन 2002 से ही नरेंद्र मोदी और गुजरात पर निरंतर कीचड़ उछालने में लगे शबनम हाशमी, तीस्ता सीतलवाड़, हर्ष मंदर, मुकुल सिन्हा, कैथोलिक चर्च के फादर सेड्रिक प्रकाश, दलित नेता मक्वान मार्टिन और उनके द्वारा खड़े किए गए स्वयंसेवी संगठनों के वित्तीय स्त्रोत क्या हैं।
यदि फर्जी आंकड़ों और गवाहों के आधार पर 2002 की गुजरात सरकार नरसंहार की आरोपी है तो 1984 की कांग्रेस सरकार को क्या संज्ञा दी जाए। गुजरात के दंगों के तुरंत बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने दंगों को देश का कलंक की संज्ञा दी और मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को राजधर्म निभाने का निर्देश दिया। इसके विपरीत 1984 के सिख दंगों के मामले में देश को 21 वर्ष प्रतीक्षा करनी पड़ी। 2005 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 1984 के दंगों के लिए देश से क्षमा याचना की। 1984 के दंगों की विभीषिका के बीच तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने दंगों को लगभग न्यायोचित ठहराते हुए कहा था, जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती ही है। अगले महीने गुजरात की जनता को अपनी नई सरकार चुननी है। चुनावी मुद्दा क्या होना चाहिए। 2002 का गोधरा कांड और उसके बाद के दंगे या गुजरात का अब तक का विकास और आगे की योजना। नरेंद्र मोदी, जिनका वर्षो से पंथिक आधार पर दानवीकरण किया गया, तो साढ़े पांच करोड़ गुजरातियों के विकास और अस्मिता के मुद्दे पर चुनाव लड़ रहे हैं, किंतु उनके विरोधी दंगों के जख्मों को कुरेद कर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकना चाहते हैं। क्या यह भारतीय सेकुलरिज्म का घिनौना सच नहीं।
लेखक भाजपा के राष्ट्रीय सचिव हैं।
शुक्रवार, 2 नवंबर 2007
गुजरात विधानसभा चुनाव पर विशेष

विकास और विचारधारा होगा मुख्य चुनावी मुद्दा : अरुण जेटली
भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव श्री अरुण जेटली गुजरात के चुनाव प्रभारी बनाए गए हैं। वे पिछले चुनाव में भी वहां के प्रभारी थे और गुजरात से राज्यसभा सदस्य भी हैं। उन्होंने गुजरात को पिछले कुछ वर्षों में बहुत करीब से देखा, परखा और जांचा है। राज्य के वर्तमान चुनावी परिदृश्य पर मैंने श्री जेटली से 'कमल संदेश' पत्रिका के लिए बातचीत की। प्रस्तुत है संपादित अंश-
चुनाव कार्यक्रमों की घोषणा के बाद गुजरात में क्या दृश्य आपके सामने है?
गुजरात का चुनाव मोटे तौर पर द्विध्रुवीय चुनाव है। प्रमुख रूप से चुनाव
भाजपा और कांग्रेस के बीच है। भाजपा को इस चुनाव में एक विशिष्ट लाभ
है। यह लाभ इस रूप में है कि हमारे पास श्री नरेन्द्र मोदी का मजबूत
नेतृत्व है। भाजपा की विचारधारा मुख्यत: राष्ट्रवादी विचारधारा है, जो
गुजरात के लोगों की भावनाओं से मेल खाती है।
आपकी राय में वे कौन से कारण है, जिनसे लोग प्रभावित होकर फिर से भाजपा सरकार को सत्ता में लाएंगे?
ऐसे मानने के अनेक कारण है, जिनसे मुझे विश्वास है कि भाजपा फिर से
गुजरात में सत्ता प्राप्त कर लेगी। पार्टी मोदी सरकार को उसके अपने प्रदर्शन
पर जिस तरह से लोगों का प्रतिसाद मिल रहा है, वही मेरे विश्वास का
आधार है। कांग्रेस ने राज्य में इस समय लोगों के साथ सम्पर्क करने का
कोई काम नहीं किया है। गुजरात में हमारी सरकार का प्रदर्शन और
विचारधारा प्रमुख मुद्दा बनी रहेगी। हमारा दृष्टिकोण राष्ट्रवादी और
आतंकवाद-विरोधी रहा है। पिछले कई वर्षों से राज्य में हमने बहुत
सफलतापूर्वक सरकार चलाई है। हमारे विरोधी, प्रमुखत: कांग्रेस, केवल
सामाजिक विभाजन और अल्पसंख्यकवाद को लेकर चल रहे है।
भाजपा किन प्रमुख मुद्दों को लेकर चुनाव लड़ेगी?
जैसा मैंने पहले कहा, गुजरात में हमारे मुख्य मुद्दे हमारा प्रदर्शन और
विचारधारा रहेगा। हमने एक उत्कृष्ट प्रकार का नेतृत्व प्रदान किया है। तो
दूसरी तरफ इसकी तुलना में यूपीए का दब्बू, अनिर्णयकारी तथा हर काम में
कोताही बरतने वाला नेतृत्व दिखाई पड़ता है, जिसने आतंकवाद से लड़ने की
ताकत को ही कमजोर कर दिया है। यूपीए और कांग्रेस केवल
अल्पसंख्यकवाद का इस्तेमाल करने में लगी हुई है। जहां तक हमारी सरकार
के प्रदर्शन की बात है, आज गुजरात देश के अत्यधिक विकसित राज्यों में
से एक है और भली-भांति प्रगति के मार्ग पर चल रहा है और इस सफलता
का प्रमुख श्रेय लोगों को, गुजरात भाजपा के नेतृत्व एवं भाजपा सरकार के
कार्य प्रदर्शन को जाता है।
चुनाव परिणाम के बारे में आपकी आशाएं क्या है?
जहां तक चुनाव परिणाम के बारे में मेरी आशा का प्रश्न है, मुझे लगता है
कि भाजपा के पास एक विशिष्ट लाभ है। सामान्यत: हम संख्या के रूप में
अपनी आशाएं व्यक्त नहीं करते है, परन्तु हमें विश्वास है कि भाजपा एक
अच्छे-खासे बहुमत से सत्ता में वापस आएगी।
आपकी आशावादिता का आधार क्या है?
जिस प्रकार से हमें पिछले कई महीनों से प्रतिसाद मिल रहा है, वही हमारी
आशावादिता का आधार है।
आप 2002 में भी चुनाव के समय गुजरात के प्रभारी थे और अब भी है। आप तब में और आज में क्या अन्तर देखते है?
2002 और 2007 के बीच एक बड़ा महत्वपूर्ण अन्तर आया है। 2002 में
श्री मोदी सरकार के लिए नए थे। लोगों ने उनके कामकाज को बहुत समय
तक परखा नहीं था। लोगों के पास उनके कामकाज को परखने का पर्याप्त
समय नहीं मिला था। अब पिछले अनेक वर्षों से उनके कामकाज के प्रदर्शन
को देखकर लोगों के मन में उनके नेतृत्व के प्रति और आस्था बढ़ गई है
और वे समझने लगे है कि श्री मोदी में काम करने की क्षमता है और वे
विकास के कार्य को सिरे तक पहुंचा सकते है।
पार्टी ने असंतुष्टों की नेतृत्व परिवर्तन की मांग को स्वीकार नहीं किया है। आप उन्हें पार्टी को चुनौती देने में कितनी गम्भीरता से लेते है?
यह बिल्कुल भी गम्भीर मामला नहीं है। मैंने देखा है कि असंतुष्टों ने जिन
मुद्दों को उठाया है, वे विचारधारा के मुद्दे नहीं हैं। ये सभी मुद्दे व्यक्तित्व
केन्द्रित हैं और इसलिए पार्टी उनके अनुरोध को स्वीकार नहीं कर सकती
थी। जो लोग कांग्रेस में शामिल होना चाहते है और भाजपा को हराने के
लिए विपक्ष के साथ मिलने को तैयार है, ऐसे लोगों को स्वयं को भाजपा का
असंतुष्ट कहलाने का कोई नैतिक हक नहीं रह जाता है। उन्होंने तो पार्टी के
राजनैतिक विरोधियों की भूमिका अपना ली है।
लगता है मोदी-विरोधी ताकतों ने मिलकर भाजपा को चुनौती दी है। आपकी रणनीति क्या है?
गुजरात में भाजपा और नरेन्द्र मोदी का समर्थन आधाार इतना व्यापक है
कि हमें इससे कोई चुनौती या खतरा दिखाई नहीं पड़ता है।
गुजरात में किनके बीच लड़ाई है?
यह लड़ाई गुजरात की कामकाज करने वाली सरकार और केन्द्र में यूपीए की
निष्क्रिय सरकार के बीच की लड़ाई है। यह एक राष्ट्रवादी विचारधारा और
अल्पसंख्यकवाद के बीच की लड़ाई है।
आपका क्या विचार है कि गुजरात चुनाव के परिणामों का राष्ट्रीय राजनीति पर कितना प्रभाव पड़ने जा रहा है?
राज्य के चुनाव परिणामों से लोकसभा में राजनीतिक समीकरण नहीं बदलेंगे। फिर भी, केन्द्र सरकार की विचारधारा के रूप में इन परिणामों का महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ेगा। गुजरात चुनाव परिणामों से भारत में एक आदर्श के रूप में राष्ट्रवाद की नवजागृति अवश्य ही एक महत्वपूर्ण प्रभाव डालेगी। इससे अवश्य ही केन्द्रीय राजनीति की गतिविधियों पर प्रभाव पड़ेगा।
चुनाव कार्यक्रमों की घोषणा के बाद गुजरात में क्या दृश्य आपके सामने है?
गुजरात का चुनाव मोटे तौर पर द्विध्रुवीय चुनाव है। प्रमुख रूप से चुनाव
भाजपा और कांग्रेस के बीच है। भाजपा को इस चुनाव में एक विशिष्ट लाभ
है। यह लाभ इस रूप में है कि हमारे पास श्री नरेन्द्र मोदी का मजबूत
नेतृत्व है। भाजपा की विचारधारा मुख्यत: राष्ट्रवादी विचारधारा है, जो
गुजरात के लोगों की भावनाओं से मेल खाती है।
आपकी राय में वे कौन से कारण है, जिनसे लोग प्रभावित होकर फिर से भाजपा सरकार को सत्ता में लाएंगे?
ऐसे मानने के अनेक कारण है, जिनसे मुझे विश्वास है कि भाजपा फिर से
गुजरात में सत्ता प्राप्त कर लेगी। पार्टी मोदी सरकार को उसके अपने प्रदर्शन
पर जिस तरह से लोगों का प्रतिसाद मिल रहा है, वही मेरे विश्वास का
आधार है। कांग्रेस ने राज्य में इस समय लोगों के साथ सम्पर्क करने का
कोई काम नहीं किया है। गुजरात में हमारी सरकार का प्रदर्शन और
विचारधारा प्रमुख मुद्दा बनी रहेगी। हमारा दृष्टिकोण राष्ट्रवादी और
आतंकवाद-विरोधी रहा है। पिछले कई वर्षों से राज्य में हमने बहुत
सफलतापूर्वक सरकार चलाई है। हमारे विरोधी, प्रमुखत: कांग्रेस, केवल
सामाजिक विभाजन और अल्पसंख्यकवाद को लेकर चल रहे है।
भाजपा किन प्रमुख मुद्दों को लेकर चुनाव लड़ेगी?
जैसा मैंने पहले कहा, गुजरात में हमारे मुख्य मुद्दे हमारा प्रदर्शन और
विचारधारा रहेगा। हमने एक उत्कृष्ट प्रकार का नेतृत्व प्रदान किया है। तो
दूसरी तरफ इसकी तुलना में यूपीए का दब्बू, अनिर्णयकारी तथा हर काम में
कोताही बरतने वाला नेतृत्व दिखाई पड़ता है, जिसने आतंकवाद से लड़ने की
ताकत को ही कमजोर कर दिया है। यूपीए और कांग्रेस केवल
अल्पसंख्यकवाद का इस्तेमाल करने में लगी हुई है। जहां तक हमारी सरकार
के प्रदर्शन की बात है, आज गुजरात देश के अत्यधिक विकसित राज्यों में
से एक है और भली-भांति प्रगति के मार्ग पर चल रहा है और इस सफलता
का प्रमुख श्रेय लोगों को, गुजरात भाजपा के नेतृत्व एवं भाजपा सरकार के
कार्य प्रदर्शन को जाता है।
चुनाव परिणाम के बारे में आपकी आशाएं क्या है?
जहां तक चुनाव परिणाम के बारे में मेरी आशा का प्रश्न है, मुझे लगता है
कि भाजपा के पास एक विशिष्ट लाभ है। सामान्यत: हम संख्या के रूप में
अपनी आशाएं व्यक्त नहीं करते है, परन्तु हमें विश्वास है कि भाजपा एक
अच्छे-खासे बहुमत से सत्ता में वापस आएगी।
आपकी आशावादिता का आधार क्या है?
जिस प्रकार से हमें पिछले कई महीनों से प्रतिसाद मिल रहा है, वही हमारी
आशावादिता का आधार है।
आप 2002 में भी चुनाव के समय गुजरात के प्रभारी थे और अब भी है। आप तब में और आज में क्या अन्तर देखते है?
2002 और 2007 के बीच एक बड़ा महत्वपूर्ण अन्तर आया है। 2002 में
श्री मोदी सरकार के लिए नए थे। लोगों ने उनके कामकाज को बहुत समय
तक परखा नहीं था। लोगों के पास उनके कामकाज को परखने का पर्याप्त
समय नहीं मिला था। अब पिछले अनेक वर्षों से उनके कामकाज के प्रदर्शन
को देखकर लोगों के मन में उनके नेतृत्व के प्रति और आस्था बढ़ गई है
और वे समझने लगे है कि श्री मोदी में काम करने की क्षमता है और वे
विकास के कार्य को सिरे तक पहुंचा सकते है।
पार्टी ने असंतुष्टों की नेतृत्व परिवर्तन की मांग को स्वीकार नहीं किया है। आप उन्हें पार्टी को चुनौती देने में कितनी गम्भीरता से लेते है?
यह बिल्कुल भी गम्भीर मामला नहीं है। मैंने देखा है कि असंतुष्टों ने जिन
मुद्दों को उठाया है, वे विचारधारा के मुद्दे नहीं हैं। ये सभी मुद्दे व्यक्तित्व
केन्द्रित हैं और इसलिए पार्टी उनके अनुरोध को स्वीकार नहीं कर सकती
थी। जो लोग कांग्रेस में शामिल होना चाहते है और भाजपा को हराने के
लिए विपक्ष के साथ मिलने को तैयार है, ऐसे लोगों को स्वयं को भाजपा का
असंतुष्ट कहलाने का कोई नैतिक हक नहीं रह जाता है। उन्होंने तो पार्टी के
राजनैतिक विरोधियों की भूमिका अपना ली है।
लगता है मोदी-विरोधी ताकतों ने मिलकर भाजपा को चुनौती दी है। आपकी रणनीति क्या है?
गुजरात में भाजपा और नरेन्द्र मोदी का समर्थन आधाार इतना व्यापक है
कि हमें इससे कोई चुनौती या खतरा दिखाई नहीं पड़ता है।
गुजरात में किनके बीच लड़ाई है?
यह लड़ाई गुजरात की कामकाज करने वाली सरकार और केन्द्र में यूपीए की
निष्क्रिय सरकार के बीच की लड़ाई है। यह एक राष्ट्रवादी विचारधारा और
अल्पसंख्यकवाद के बीच की लड़ाई है।
आपका क्या विचार है कि गुजरात चुनाव के परिणामों का राष्ट्रीय राजनीति पर कितना प्रभाव पड़ने जा रहा है?
राज्य के चुनाव परिणामों से लोकसभा में राजनीतिक समीकरण नहीं बदलेंगे। फिर भी, केन्द्र सरकार की विचारधारा के रूप में इन परिणामों का महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ेगा। गुजरात चुनाव परिणामों से भारत में एक आदर्श के रूप में राष्ट्रवाद की नवजागृति अवश्य ही एक महत्वपूर्ण प्रभाव डालेगी। इससे अवश्य ही केन्द्रीय राजनीति की गतिविधियों पर प्रभाव पड़ेगा।
सोमवार, 29 अक्टूबर 2007
आर्थिक प्रगति में गुजरात ने कैसे लगायी लम्बी छलांग
लेखक- दीनानाथ मिश्र
हाल ही में भारतीय रिजर्व बैंक ने एक अध्ययन किया है जिसका निष्कर्ष यह है कि 2007 के दौरान सीधे विदेशी निवेश के जरिए भारत को कुल 69 अरब डॉलर पूंजी मिलेगी। यह आंकड़ा करीब 380 लाख करोड़ रुपए के बराबर है। उसमें से 25.8 प्रतिशत विदेशी पूंजी निवेश अकेले गुजरात राज्य में आया। यानि एक चौथाई से ज्यादा। इससे कम, घटते हुए क्रम में, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और तमिलनाडु में विदेशी पूंजी निवेश हुआ। बाकी राज्यों में तो और भी कम। गुजरात में भारत के पांच प्रतिशत लोग हैं और 6 प्रतिशत भूमि इसका क्षेत्रफल है। गुजरात का निर्यात देश का 12 प्रतिशत है। भारत के शेयर बाजार में इस राज्य की भागीदारी 30 प्रतिशत है। गुजरात में गरीबी रेखा के नीचे की आबादी लगभग 15 प्रतिशत है। करीब 40 प्रतिशत लोग शहरों में रहते हैं।
''सेंटर फॉर मॉनीटरिंग इंडियन इकोनॉमी'' के अनुसार आद्योगीकरण के क्षेत्र में गुजरात अन्य राज्यों से कहीं आगे प्रथम स्थान पर है। सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाले राजीव गांधी फाउंडेशन ने अपने अध्ययन में यह निष्कर्ष निकाला था कि गुजरात में सर्वाधिक आर्थिक स्वतंत्रता है। गुजरात की शिक्षा दर 70 प्रतिशत से ज्यादा है। 2003, 2005 और 2007 में मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 'वाइबंरेट गुजरात' महासम्मेलन का आयोजन किया था। विश्व भर से उद्योगपति और निवेशक वहां आए। रतन टाटा, मुकेश अंबानी और कुमार मंगलम बिड़ला जैसे उद्योगपतियों ने गुजरात की आर्थिक गतिविधियों और चौमुखी विकास की जबरदस्त सराहना की। विशेष आर्थिक क्षेत्रों के मामले में भी गुजरात देश में प्रथम स्थान पर है। गुजरात में इस समय 51 से अधिक एसईजेड (विशेष आर्थिक क्षेत्र) कार्य कर रहे हैं। आर्थिक क्षेत्र के मामले में महाराष्ट्र को गुजरात ने पीछे छोड़ दिया है। गुजरात के लगभग 19000 गांवों में तीन फेज बिजली की आपूर्ति 24 घंटे होती है। इंग्लैण्ड में रहने वाले कपैरो ग्रुप के लॉर्ड स्वराज पाल ने कहा है कि मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राज्य में उच्च कोटि का बुनियादी ढांचा खड़ा किया है। गुजरात में उत्कृष्ट सड़कें हैं।
गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने चीन यात्रा के दौरान यह दावा किया था कि गुजरात विशेष आर्थिक क्षेत्र के मामले में भारत की राजधानी है। एक अन्य वक्तव्य में उन्होंने दावा किया कि पूरा गुजरात ही विशेष आर्थिक क्षेत्र है। सरदार सरोवर बांध बन जाने के बाद नर्मदा नदीं गुजरात की जीवन रेखा बन गई है। गुजरात में अब पानी का संकट नहीं है। वनवासियों को भी दूर गांव से पानी लाने की जरूरत नहीं है। उच्च शिक्षा और कम्प्यूटरीकरण के मामले में गुजरात तीव्रतर विकास करने वाला राज्य है। ई-गवर्नेन्स से अर्थात कम्प्यूटर के जरिए प्रशासन संभालने का सफल प्रयोग गुजरात में हुआ है। नतीजा यह है कि पिछड़े से पिछड़े गांव के गरीब से गरीब परिवार के खतरनाक बीमारियों से जूझ रहे रोगियों को सर्वोत्तम स्वास्थ्य सेवाओं से जोड़ दिया गया है। आवश्यकता होने पर वह श्रेष्ठतम चुनिन्दा अस्पतालों में इलाज करवा सकते हैं। गर्ववती महिलाओं की स्वास्थ्य सेवाओं का विशेष ध्यान रखा गया है।
'इण्डिया टुडे' ने पिछले पांच वर्षों में गुजरात को दो बार सर्वोत्तम शासन मुहैया कराने वाला राज्य कहा है। भाजपा और नरेन्द्र मोदी के कट्टर से कट्टर विरोधी भी विकास के सवाल पर नरेन्द्र मोदी का लोहा मानते हैं। भले ही कुछ अन्य मुद्दों पर उनका विरोध भी करते हों। गुजरात में इस दिसम्बर के मध्य में विधानसभाई चुनाव होने वाले हैं। प्रशासन में शुचिता और मुख्यमंत्री की व्यक्तिगत ईमानदारी के सवाल पर प्राय: उनका लोहा माना जाता है। प्रसिध्द अन्तर्राष्ट्रीय कंसलटेंसी कम्पनी 'अर्नस्ट एण्ड यंग' ने अपने विशद अध्ययन पर एक रिपोर्ट प्रस्तुत की है। उसमें गुजरात को भारत की विकास यात्रा और आत्म निर्भरता के मामले में एक सुनहरा उदाहरण बताया है। कहा है कि गुजरात सरकार ने 72 अभिनव पहल किए हैं और उन प्रायोगों की उपलब्धियों का व्योरा दिया है। यह ऐसे प्रयोग हैं जिसमें घिसे पिटे और पुराने लकीर के फकीर की विकास रेखाओं पर नहीं चले हैं, नई रेखाएं बनाई हैं।
यह नहीं कि नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व ने केवल उद्योग जगत की महाशक्तियों, बड़े बड़े व्यक्तित्वों को प्रभावित किया हो बल्कि वनवासी, किसान, महिलाओ, स्वरोजगार करने वाले युवाओं मध्यम वर्ग और निम्न वर्ग से भी सराहना हासिल कर रहे हैं। व्यापार और उद्योग जगत की दोनों प्रमुख संस्थाओं सीआईआई और फिक्की ने गुजरात का विशेष अध्ययन कराया है। और उनका भी वही निषकर्ष है जो आम धारणा है। गुजरात को लोग भारत की पेट्रो राजधानी भी कहते हैं। पिछले पांच वर्षों की गुजरात की विकास कथा दो-ढाई सौ शब्दों में नहीं कही जा सकती। कुछ सांकेतिक बातें यहां पर कही गई हैं।
मैं पिछले दिनो सूरत गया था। वहां मैं सूरत के विशेष आर्थिक क्षेत्र में भी गया। यह आधे मील लम्बे-चौड़े से भी बड़ा क्षेत्र है। इसमें कई सौ इकाइयां हैं। हजारों मजदूर काम करते देखे जा सकते हैं। निर्यात के लिए लदते हुए लम्बे चौड़े कंटेनर्स को भी देखा। क्या मतलब है इस विशाल उद्योग समूह का? इसका अर्थ है साढ़े पांच हजार करोड़ रूपए का इस वर्ष का निर्यात। इसका अर्थ है हजारों परिवारों की रोजी रोटी। इसका अर्थ है औद्योगिक विकास। इसका अर्थ है उद्यमिता को अवसर। इसके संचालक हैं एसएन शर्मा। शर्मा उस बिहार के जन्मे पढ़े उद्यमी हैं जिस राज्य को कहा जाता है कि राज्य में उद्यमी प्रतिभाएं नहीं हैं। गुजरात में उद्योगों और व्यवसाय को फलने फूलने के बड़े असवर उपलब्ध हैं। पूंजी उपलब्ध है। प्रतिभाशाली शिक्षित और प्रशिक्षित लोग उपलब्ध हैं। बुनियादी ढांचा है, सड़के हैं, हवाई अड्डे हैं। पैसेंजर सेवा के 9 हवाई अड्डे नियमित रूप से कार्य करते हैं। ऐसा किसी अन्य राज्य में नहीं है। छोटे मोटे अनेक बंदरगाह हैं। बंदरगाहों को जोड़ने वाली रेलवे लाइनें हैं। बिजली है, पानी है। यानि औद्योगीकरण के लिए जो कुछ चाहिए वह सब है। और इनके विकास का बहुत बड़ा हिस्सा पूरा किया है अपने छह वर्षों के शासन काल में मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की गतिशील और दूरदृष्टि नेतृत्व ने।
आगामी चुनाव में जाहिर है मुख्य मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच में होगा। 2002 के चुनाव गोधरा तथा उसके कारण घटित दंगों की पृष्ठभूमि में हुए थे। मीडिया और विरोधियों ने दंगों का पूरा दोष नरेन्द्र मोदी पर मढ़ दिया। मोदी देश और दुनिया में तब के सबसे बदनाम मुख्यमंत्री थे। लेकिन राज्य में नहीं। तमाम विरोधी अभियानों, गैर-राजनीतिक संगठनों की फौज के दुशप्रचारों और इसमें बढ़-चढ़ कर अतिरंजित प्रोपेगंडा करने वाले मीडिया समूहों के दानवीकरण के बावजूद नरेन्द्र मोदी दो-तिहाई बहुमत से जीत कर आए थे। लेकिन मोदी वैसे हैं ही नहीं, जैसे उन्हें चित्रित किया गया था। वह पूरे गुजरात को सामने रखकर चलते रहे। वह छह करोड़ गुजरात वासियों को विकास के पथ पर लेकर चले। प्रशासन और विकास यात्रा में उन्होंने गुजरात को ध्यान में रखा, हिन्दुआें और मुसलमानों को नहीं। और आज देखिए गुजरात कहां पहुंच गया है। ऐसी स्थिति में कांग्रेस 2002 के मुकाबले हतबल है। 2002 में कांग्रेस ने शंकर सिंह वाघेला के नेतृत्व में चुनाव लड़ा था। इस बार किसी को नेता पेश कर चुनाव लड़ने की स्थिति में कांग्रेस नहीं है।
वैसे प्रचार की आंधी नरेन्द्र मोदी के खिलाफ आज भी है। पिछले दिनों नरेन्द्र मोदी को प्रसिध्द भेंटवार्ताकार करन थापर ने अपने साप्ताहिक कार्यक्रम में बुलाया। उनकी कोशिश यही थी कि घूम-फिर कर गुजरात दंगों के लिए बदनाम किए गए नरेन्द्र मोदी को इस पुरानी जमीन पर खड़ा कर दिया जाए। मोदी उनके सवालों के जवाब, बिना राजनीतिक मात खाए हुए, टालू मुद्रा में दिया। मगर करन थापर भी कुछ कम नहीं थे। वह छवि के सवाल पर घूम-फिर कर गुजरात के दंगों पर आ जाते थे। अंतत: यह हुआ कि सिर्फ चार मिनट बाद ही नरेन्द्र मोदी ने एक गिलास पानी पिया और भेंटवार्ता का बहिर्गमन कर दिया।
केन्द्रीय गृह राज्यमंत्री ने गुजरात के दंगों में मरने वालों के मजहबी आंकड़े दिए हैं। उन आंकड़ों का मतलब यह है कि वह एकतरफा नहीं थे, दोतरफा थे। बड़ी संख्या में मुसलमान मारे गए लेकिन एक चौथाई संख्या में हिन्दू भी मारे गए। इसमें अगर गोधरा काण्ड के नम्बरों को जोड़ दिया जाए तो मरने वाले हिन्दुओं की संख्या मुसलमानों की संख्या की एक तिहाई से ज्यादा हो जाएगी। बहुत से मुसलमान उजाड़ दिए गए लेकिन हिन्दुओं की भी अच्छी खासी संख्या उजाड़ दी गई। गुजरात में और विशेष रूप से अहमदाबाद में दंगों का लम्बा इतिहास रहा है। कांग्रेस शासन में माधव सिंह सोलंकी के मुख्यमंत्री काल में 1969 में 2002 के मुकाबले कहीं बड़ा दंगा हुआ था। कहीं लम्बा चला था। उसमें हताहतों की संख्या कहीं अधिक थी। यह श्रेय नरेन्द्र मोदी को जाता है कि उन्होंने एक हफ्ते में ही दंगों पर काबू पा लिया। पुलिस की गोलीबारी से करीब सौ लोग मारे गए। हिन्दू भी मारे गए और मुसलमान भी। अहमदाबाद दंगा 1969 वाले दंगों की तरह था। वह नियोजित तो बिलकुल नहीं था। जबकि 1984 में नियोजित ढंग से कांग्रेस ने सिक्खों के खिलाफ दंगे कराए थे। इसकी पुष्टि अनेक सरकारी जांच रिपोर्टों में की गई है। लेकिन पांच साल बाद के इस चुनाव को भी गुजरात के दंगों के नाम पर लड़ने की कोशिश नरेन्द्र मोदी के विरोधियों की है और इसीलिए प्रचारतंत्र में नरेन्द्र मोदी की बहुप्रचारित दानव छवि को फिर से जीवित करने की कोशिश होती रही है।
लेकिन नरेन्द्र मोदी ने तो विकास का रिकॉर्ड बनाया है। उससे हिन्दुओं और मुसलमानों का पूरा समाज आगे बढ़ा है। विरोधियों की रणनीति भले ही अखबारों में कहीं झलक जाए मतपेटियों के हरगिज नहीं झलकेगी। आज तो नरेन्द्र मोदी तमाम विरोधियों की कोशिशों के बावजूद विकास पुरुष ही हैं। नरेन्द्र मोदी के प्रचार अभियान के केन्द्र में विकास है। विरोधी लोग चुनाव को नरेन्द्र मोदी के पक्ष और विपक्ष में जनमत संग्रह के रूप में कराना चाहते हैं। इससे कोई फर्क पड़ने वाला नहीं। चुनाव आयोग निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव कराने के नाम पर नरेन्द्र मोदी पर अपने निर्णयों से जैसा दबाव बनाया है, वैसा दबाव हिमाचल, जहां करीब-करीब साथ ही चुनाव होने हैं, सरकार पर नहीं बनाया है। भाजपा और संघ परिवार के भीतर उनका जो विरोध है, उसका श्रेय भी नरेन्द्र मोदी को ही है। वह पार्टी के साथियों को साथ लेकर नहीं चलते। क्या आज का राजनीतिक महौल ऐसा है, जिसमें बिना व्यापक हितों से समझौता करके कोई मुख्यमंत्री शासन कर सकता है? संभव है ऐसी स्थिति हो। नरेन्द्र मोदी समझौतावादी नहीं हैं। अपने निर्णयों पर अडिग रहने की उनकी आदत है। वह तब भी ऐसे ही थे जब मुख्यमंत्री नहीं थे। अपनी बात से पलटते नहीं थे। जब संगठन कार्य में लगे थे तब भी मोदी वैसे ही थे। यही उनकी सफलता का राज है।
हाल ही में भारतीय रिजर्व बैंक ने एक अध्ययन किया है जिसका निष्कर्ष यह है कि 2007 के दौरान सीधे विदेशी निवेश के जरिए भारत को कुल 69 अरब डॉलर पूंजी मिलेगी। यह आंकड़ा करीब 380 लाख करोड़ रुपए के बराबर है। उसमें से 25.8 प्रतिशत विदेशी पूंजी निवेश अकेले गुजरात राज्य में आया। यानि एक चौथाई से ज्यादा। इससे कम, घटते हुए क्रम में, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और तमिलनाडु में विदेशी पूंजी निवेश हुआ। बाकी राज्यों में तो और भी कम। गुजरात में भारत के पांच प्रतिशत लोग हैं और 6 प्रतिशत भूमि इसका क्षेत्रफल है। गुजरात का निर्यात देश का 12 प्रतिशत है। भारत के शेयर बाजार में इस राज्य की भागीदारी 30 प्रतिशत है। गुजरात में गरीबी रेखा के नीचे की आबादी लगभग 15 प्रतिशत है। करीब 40 प्रतिशत लोग शहरों में रहते हैं।
''सेंटर फॉर मॉनीटरिंग इंडियन इकोनॉमी'' के अनुसार आद्योगीकरण के क्षेत्र में गुजरात अन्य राज्यों से कहीं आगे प्रथम स्थान पर है। सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाले राजीव गांधी फाउंडेशन ने अपने अध्ययन में यह निष्कर्ष निकाला था कि गुजरात में सर्वाधिक आर्थिक स्वतंत्रता है। गुजरात की शिक्षा दर 70 प्रतिशत से ज्यादा है। 2003, 2005 और 2007 में मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 'वाइबंरेट गुजरात' महासम्मेलन का आयोजन किया था। विश्व भर से उद्योगपति और निवेशक वहां आए। रतन टाटा, मुकेश अंबानी और कुमार मंगलम बिड़ला जैसे उद्योगपतियों ने गुजरात की आर्थिक गतिविधियों और चौमुखी विकास की जबरदस्त सराहना की। विशेष आर्थिक क्षेत्रों के मामले में भी गुजरात देश में प्रथम स्थान पर है। गुजरात में इस समय 51 से अधिक एसईजेड (विशेष आर्थिक क्षेत्र) कार्य कर रहे हैं। आर्थिक क्षेत्र के मामले में महाराष्ट्र को गुजरात ने पीछे छोड़ दिया है। गुजरात के लगभग 19000 गांवों में तीन फेज बिजली की आपूर्ति 24 घंटे होती है। इंग्लैण्ड में रहने वाले कपैरो ग्रुप के लॉर्ड स्वराज पाल ने कहा है कि मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राज्य में उच्च कोटि का बुनियादी ढांचा खड़ा किया है। गुजरात में उत्कृष्ट सड़कें हैं।
गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने चीन यात्रा के दौरान यह दावा किया था कि गुजरात विशेष आर्थिक क्षेत्र के मामले में भारत की राजधानी है। एक अन्य वक्तव्य में उन्होंने दावा किया कि पूरा गुजरात ही विशेष आर्थिक क्षेत्र है। सरदार सरोवर बांध बन जाने के बाद नर्मदा नदीं गुजरात की जीवन रेखा बन गई है। गुजरात में अब पानी का संकट नहीं है। वनवासियों को भी दूर गांव से पानी लाने की जरूरत नहीं है। उच्च शिक्षा और कम्प्यूटरीकरण के मामले में गुजरात तीव्रतर विकास करने वाला राज्य है। ई-गवर्नेन्स से अर्थात कम्प्यूटर के जरिए प्रशासन संभालने का सफल प्रयोग गुजरात में हुआ है। नतीजा यह है कि पिछड़े से पिछड़े गांव के गरीब से गरीब परिवार के खतरनाक बीमारियों से जूझ रहे रोगियों को सर्वोत्तम स्वास्थ्य सेवाओं से जोड़ दिया गया है। आवश्यकता होने पर वह श्रेष्ठतम चुनिन्दा अस्पतालों में इलाज करवा सकते हैं। गर्ववती महिलाओं की स्वास्थ्य सेवाओं का विशेष ध्यान रखा गया है।
'इण्डिया टुडे' ने पिछले पांच वर्षों में गुजरात को दो बार सर्वोत्तम शासन मुहैया कराने वाला राज्य कहा है। भाजपा और नरेन्द्र मोदी के कट्टर से कट्टर विरोधी भी विकास के सवाल पर नरेन्द्र मोदी का लोहा मानते हैं। भले ही कुछ अन्य मुद्दों पर उनका विरोध भी करते हों। गुजरात में इस दिसम्बर के मध्य में विधानसभाई चुनाव होने वाले हैं। प्रशासन में शुचिता और मुख्यमंत्री की व्यक्तिगत ईमानदारी के सवाल पर प्राय: उनका लोहा माना जाता है। प्रसिध्द अन्तर्राष्ट्रीय कंसलटेंसी कम्पनी 'अर्नस्ट एण्ड यंग' ने अपने विशद अध्ययन पर एक रिपोर्ट प्रस्तुत की है। उसमें गुजरात को भारत की विकास यात्रा और आत्म निर्भरता के मामले में एक सुनहरा उदाहरण बताया है। कहा है कि गुजरात सरकार ने 72 अभिनव पहल किए हैं और उन प्रायोगों की उपलब्धियों का व्योरा दिया है। यह ऐसे प्रयोग हैं जिसमें घिसे पिटे और पुराने लकीर के फकीर की विकास रेखाओं पर नहीं चले हैं, नई रेखाएं बनाई हैं।
यह नहीं कि नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व ने केवल उद्योग जगत की महाशक्तियों, बड़े बड़े व्यक्तित्वों को प्रभावित किया हो बल्कि वनवासी, किसान, महिलाओ, स्वरोजगार करने वाले युवाओं मध्यम वर्ग और निम्न वर्ग से भी सराहना हासिल कर रहे हैं। व्यापार और उद्योग जगत की दोनों प्रमुख संस्थाओं सीआईआई और फिक्की ने गुजरात का विशेष अध्ययन कराया है। और उनका भी वही निषकर्ष है जो आम धारणा है। गुजरात को लोग भारत की पेट्रो राजधानी भी कहते हैं। पिछले पांच वर्षों की गुजरात की विकास कथा दो-ढाई सौ शब्दों में नहीं कही जा सकती। कुछ सांकेतिक बातें यहां पर कही गई हैं।
मैं पिछले दिनो सूरत गया था। वहां मैं सूरत के विशेष आर्थिक क्षेत्र में भी गया। यह आधे मील लम्बे-चौड़े से भी बड़ा क्षेत्र है। इसमें कई सौ इकाइयां हैं। हजारों मजदूर काम करते देखे जा सकते हैं। निर्यात के लिए लदते हुए लम्बे चौड़े कंटेनर्स को भी देखा। क्या मतलब है इस विशाल उद्योग समूह का? इसका अर्थ है साढ़े पांच हजार करोड़ रूपए का इस वर्ष का निर्यात। इसका अर्थ है हजारों परिवारों की रोजी रोटी। इसका अर्थ है औद्योगिक विकास। इसका अर्थ है उद्यमिता को अवसर। इसके संचालक हैं एसएन शर्मा। शर्मा उस बिहार के जन्मे पढ़े उद्यमी हैं जिस राज्य को कहा जाता है कि राज्य में उद्यमी प्रतिभाएं नहीं हैं। गुजरात में उद्योगों और व्यवसाय को फलने फूलने के बड़े असवर उपलब्ध हैं। पूंजी उपलब्ध है। प्रतिभाशाली शिक्षित और प्रशिक्षित लोग उपलब्ध हैं। बुनियादी ढांचा है, सड़के हैं, हवाई अड्डे हैं। पैसेंजर सेवा के 9 हवाई अड्डे नियमित रूप से कार्य करते हैं। ऐसा किसी अन्य राज्य में नहीं है। छोटे मोटे अनेक बंदरगाह हैं। बंदरगाहों को जोड़ने वाली रेलवे लाइनें हैं। बिजली है, पानी है। यानि औद्योगीकरण के लिए जो कुछ चाहिए वह सब है। और इनके विकास का बहुत बड़ा हिस्सा पूरा किया है अपने छह वर्षों के शासन काल में मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की गतिशील और दूरदृष्टि नेतृत्व ने।
आगामी चुनाव में जाहिर है मुख्य मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच में होगा। 2002 के चुनाव गोधरा तथा उसके कारण घटित दंगों की पृष्ठभूमि में हुए थे। मीडिया और विरोधियों ने दंगों का पूरा दोष नरेन्द्र मोदी पर मढ़ दिया। मोदी देश और दुनिया में तब के सबसे बदनाम मुख्यमंत्री थे। लेकिन राज्य में नहीं। तमाम विरोधी अभियानों, गैर-राजनीतिक संगठनों की फौज के दुशप्रचारों और इसमें बढ़-चढ़ कर अतिरंजित प्रोपेगंडा करने वाले मीडिया समूहों के दानवीकरण के बावजूद नरेन्द्र मोदी दो-तिहाई बहुमत से जीत कर आए थे। लेकिन मोदी वैसे हैं ही नहीं, जैसे उन्हें चित्रित किया गया था। वह पूरे गुजरात को सामने रखकर चलते रहे। वह छह करोड़ गुजरात वासियों को विकास के पथ पर लेकर चले। प्रशासन और विकास यात्रा में उन्होंने गुजरात को ध्यान में रखा, हिन्दुआें और मुसलमानों को नहीं। और आज देखिए गुजरात कहां पहुंच गया है। ऐसी स्थिति में कांग्रेस 2002 के मुकाबले हतबल है। 2002 में कांग्रेस ने शंकर सिंह वाघेला के नेतृत्व में चुनाव लड़ा था। इस बार किसी को नेता पेश कर चुनाव लड़ने की स्थिति में कांग्रेस नहीं है।
वैसे प्रचार की आंधी नरेन्द्र मोदी के खिलाफ आज भी है। पिछले दिनों नरेन्द्र मोदी को प्रसिध्द भेंटवार्ताकार करन थापर ने अपने साप्ताहिक कार्यक्रम में बुलाया। उनकी कोशिश यही थी कि घूम-फिर कर गुजरात दंगों के लिए बदनाम किए गए नरेन्द्र मोदी को इस पुरानी जमीन पर खड़ा कर दिया जाए। मोदी उनके सवालों के जवाब, बिना राजनीतिक मात खाए हुए, टालू मुद्रा में दिया। मगर करन थापर भी कुछ कम नहीं थे। वह छवि के सवाल पर घूम-फिर कर गुजरात के दंगों पर आ जाते थे। अंतत: यह हुआ कि सिर्फ चार मिनट बाद ही नरेन्द्र मोदी ने एक गिलास पानी पिया और भेंटवार्ता का बहिर्गमन कर दिया।
केन्द्रीय गृह राज्यमंत्री ने गुजरात के दंगों में मरने वालों के मजहबी आंकड़े दिए हैं। उन आंकड़ों का मतलब यह है कि वह एकतरफा नहीं थे, दोतरफा थे। बड़ी संख्या में मुसलमान मारे गए लेकिन एक चौथाई संख्या में हिन्दू भी मारे गए। इसमें अगर गोधरा काण्ड के नम्बरों को जोड़ दिया जाए तो मरने वाले हिन्दुओं की संख्या मुसलमानों की संख्या की एक तिहाई से ज्यादा हो जाएगी। बहुत से मुसलमान उजाड़ दिए गए लेकिन हिन्दुओं की भी अच्छी खासी संख्या उजाड़ दी गई। गुजरात में और विशेष रूप से अहमदाबाद में दंगों का लम्बा इतिहास रहा है। कांग्रेस शासन में माधव सिंह सोलंकी के मुख्यमंत्री काल में 1969 में 2002 के मुकाबले कहीं बड़ा दंगा हुआ था। कहीं लम्बा चला था। उसमें हताहतों की संख्या कहीं अधिक थी। यह श्रेय नरेन्द्र मोदी को जाता है कि उन्होंने एक हफ्ते में ही दंगों पर काबू पा लिया। पुलिस की गोलीबारी से करीब सौ लोग मारे गए। हिन्दू भी मारे गए और मुसलमान भी। अहमदाबाद दंगा 1969 वाले दंगों की तरह था। वह नियोजित तो बिलकुल नहीं था। जबकि 1984 में नियोजित ढंग से कांग्रेस ने सिक्खों के खिलाफ दंगे कराए थे। इसकी पुष्टि अनेक सरकारी जांच रिपोर्टों में की गई है। लेकिन पांच साल बाद के इस चुनाव को भी गुजरात के दंगों के नाम पर लड़ने की कोशिश नरेन्द्र मोदी के विरोधियों की है और इसीलिए प्रचारतंत्र में नरेन्द्र मोदी की बहुप्रचारित दानव छवि को फिर से जीवित करने की कोशिश होती रही है।
लेकिन नरेन्द्र मोदी ने तो विकास का रिकॉर्ड बनाया है। उससे हिन्दुओं और मुसलमानों का पूरा समाज आगे बढ़ा है। विरोधियों की रणनीति भले ही अखबारों में कहीं झलक जाए मतपेटियों के हरगिज नहीं झलकेगी। आज तो नरेन्द्र मोदी तमाम विरोधियों की कोशिशों के बावजूद विकास पुरुष ही हैं। नरेन्द्र मोदी के प्रचार अभियान के केन्द्र में विकास है। विरोधी लोग चुनाव को नरेन्द्र मोदी के पक्ष और विपक्ष में जनमत संग्रह के रूप में कराना चाहते हैं। इससे कोई फर्क पड़ने वाला नहीं। चुनाव आयोग निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव कराने के नाम पर नरेन्द्र मोदी पर अपने निर्णयों से जैसा दबाव बनाया है, वैसा दबाव हिमाचल, जहां करीब-करीब साथ ही चुनाव होने हैं, सरकार पर नहीं बनाया है। भाजपा और संघ परिवार के भीतर उनका जो विरोध है, उसका श्रेय भी नरेन्द्र मोदी को ही है। वह पार्टी के साथियों को साथ लेकर नहीं चलते। क्या आज का राजनीतिक महौल ऐसा है, जिसमें बिना व्यापक हितों से समझौता करके कोई मुख्यमंत्री शासन कर सकता है? संभव है ऐसी स्थिति हो। नरेन्द्र मोदी समझौतावादी नहीं हैं। अपने निर्णयों पर अडिग रहने की उनकी आदत है। वह तब भी ऐसे ही थे जब मुख्यमंत्री नहीं थे। अपनी बात से पलटते नहीं थे। जब संगठन कार्य में लगे थे तब भी मोदी वैसे ही थे। यही उनकी सफलता का राज है।
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