लेखक- डा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री
ऐसे संकेत तो पहले ही मिलने शुरू हो गए थे कि कांग्रेस हाई कमाण्ड वीरभद्र सिंह को हराने की कोशिश कर रहा है। पर मामला इतना आगे बढ़ जाएगा, ऐसी किसी ने आशा नहीं की थी। हाई कमाण्ड ने तीन बार विधायक बनने वाले हिमाचल विधानसभा के उपाध्यक्ष का टिकट काटकर उसकी जगह सोनिया गांधी के रसोईये के बेटे को टिकट दे दिया। वीरभद्र सिंह पूरा जोर लगाने के बावजूद अपने उपाध्यक्ष का टिकट बचा नहीं पाए। लेकिन हाई कमाण्ड की मंशा शायद इतने से ही पूरी नहीं हुईं उसने यह भी घोषणा कर दी कि कांग्रेस के जीतने पर हिमाचल का मुख्यमंत्री कौन बनेगा? अभी ऐसा तय नहीं हुआ है। संकेत स्पष्ट है कि जीतने की स्थिति में वीरभद्र सिंह ही अगले मुख्यमंत्री होंगे ऐसा निश्चित न माना जाए। यह संदेश कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को भी है और प्रदेश की जनता को भी इसका जो दुष्परिणाम होना था वह हो रहा हैं। पहले से ही धड़ों में बटी कांग्रेस में अराजकता की स्थिति पैदा हो गई है। यहाँ तक कि वीरभद्र सिंह के हनुमान कहे जाने वाले मनजीत डोगरा को भी। नादौनता विधानसभा क्षेत्र से टिकट नहीं मिला। डोगरा ने विद्रोह कर दियाऔर अपनी पत्नी को आजाद प्रत्याशी के तौर पर मैदान में उतार दिया। ऐसे विद्रोह एक नहीं अनेक स्थानों पर हुए। लेकिन वीरभद्र सिंह चाहकर भी विद्रोह को रोक नहीं पा रहे क्योंकि कांग्रेस ने पहले ही उनकी शक्ति छीन ली है। वे भविष्य के मुख्यमंत्री नहीं होंगे- इससे उभरे शून्य में जी.एस. बाली जैसे लोग भी मुख्यमंत्री बनने का सपना देखने लगे हैं। विद्या स्टोक्स काफी लंबे अरसे से मुख्यमंत्री बनने का सपना पाल रही हैं। अराजकता की इस स्थिति में कांग्रेस के भीतर भी धुंध है और बाहर भी। कभी वीरभद्र का सिक्का हिमाचल कांग्रेस में चलता था। लेकिन अब उनके अपने ही लोग उनसे किनारा कशी करने लगे हैं। क्योंकि हाईकमाण्ड के संकेत वीरभद्र के विपरीत जा रहे हैं।
पुराने हिमाचल में कभी कांग्रेस की तूती बोलती थी और बाद में वहां कांग्रेस का पर्याय वीरभद्र सिंह ही बन गए। लेकिन बदले हालात में लगता है कि पुराने हिमाचल में भी वीरभद्र सिंह की जड़ें हिलनी शुरू हो गई हैं। किसी स्थान पर उन्हें स्वयं ही अपने परंपरागत समर्थकों पर विश्वास नहीं रहा। दूसरे स्थानों पर उनके समर्थकों का उनमें विश्वास हिलता नजर आ रहा है। रामपुर के विधायक सिंगी राम जो वीरभद्र के परिवार के सदस्य ही माने जाते थे, उनको राजा ने स्वयं त्याग दिया है और टिकट न मिलने पर चौपाल के राजा जोगेन्द्र चंद्र विद्रोह पर उतर आए हैं। वहां भाजपा के डा. राधारमन शास्त्री मजबूत स्थिति में दिखाई दे रहे हैं। सिरमौर और शिमला जिले में कुछ कांग्रेस का भीतरी विद्रोह और कुछ भाजपा की अतिरिक्त सक्रियता दोनों ने मिलकर वीरभद्र की नींद हराम कर दी है।
रही सही कसर विजय सिंह मनकोटिया पूरी कर रहे हैं। मनकोटिया सेना में रह चुके हैं। धुंआधार भाषण देते हैं, कविता लिखते हैं, लेकिन सबसे बढ़कर इस बार मायावती के हाथी की सवारी कर रहे हैं। वीरभद्र सिंह के लिए चिडिया घर में बंधे हाथी से डरने का तो कोई कारण नहीं है लेकिन चुनाव के मैदान में मायावती के हाथी पर चढ़े विजय सिंह मनकोटिया भय पैदा करने के लिए पर्याप्त हैं। यदि बीएसपी ने अनुसूचित जातियों के एक दो प्रतिशत वोट भी काट दिए तो कांग्रेस की लुटिया डुबोने के लिए वे पर्याप्त होंगे। जिस प्रकार कभी पंडित सुखराम वीरभद्र सिंह के पीछे हाथ धोकर पड़ गए थे और उन्हें मुख्यमंत्री की गद्दी तक पहुँचने से रोक ही नहीं लिया था बल्कि वहां से खींचकर उतार भी दिया था। वही काम इस बार मनकोटिया कर रहे हैं। ऊपर से कोढ ने खाज़ यह कि भाजपा हाई कमाण्ड ने प्रेम कुमार धूमल को मुख्यमंत्री का प्रत्याशी घोषित करके रही-सही कसर भी पूरी कर दी है। इससे जहां भाजपा के कार्यकर्ताओं में उत्साह आया है वहीं कांग्रेस के हाथ से एक बहुत बड़ा चुनावी मुद्दा छिन गया है। चुनाव के परिणाम क्या होंगे? यह तो भविष्य ही तय करेगा। लेकिन कांग्रेस के लिए खतरे की घंटी बज रही है। यह हिमाचल में स्पष्ट सुना जा सकता है।
(नवोत्थान लेख सेवा हिन्दुस्थान समाचार)
सोमवार, 17 दिसंबर 2007
मंगलवार, 11 दिसंबर 2007
कांग्रेस को सोहराबुद्दीन की चिंता
लेखक- डा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री
कांग्रेस को आतंकवादियों की चिंता सता रही है। उनकी दृष्टि में आतंकवादियों के मानवाधिकारों की चिंता सरकार नहीं करेगी तो और कौन करेगा? लगता है कांग्रेस की दृष्टि में आतंकवादी का मसला अल्पसंख्यक से भी जुड़ा हुआ है। क्योंकि ज्यादातर आतंकवादी मुसलमान ही हैं इसलिए जब कोई आतंकवादी मरता है तो कांग्रेस का अल्पसंख्यक सैल तुरंत जीवित हो जाता है। उसको लगता है यह आतंकवादी नहीं मरा बल्कि एक बदनसीब अल्पसंख्यक को गोली मार दी गई है। ऐसा नहीं कि कांग्रेस आतंकवादियों के पक्ष में खुले तौर पर आ गई है। उसमें आतंकवादियों के पक्ष में आने के लिए कानूनी प्रक्रिया को ढाल के तौर पर इस्तेमाल किया है। शायद कांग्रेस यह मानती है कि सच्चा आतंकवादी होने के लिए जरूरी है पहले आतंकवादी अपनी ए.के. -47 से कुछ हिन्दुओं को मार गिराए। उसके बाद पुलिस उन आतंकवादियों को पकड़े और पकड़ने के बाद उस पर मुकदमा चलाए। मुकदमा में यदि इनको फांसी की सजा हो जाए तो उस पर दया की अपील करते हुए राष्ट्रपति के पास आवेदन भेजा जाए और वह आवेदन परंपरागत तरीके से लंबित हो जाए। आतंकवाद की भी एक पूरी प्रक्रिया है और आतंकवादी को पकड़ने की भी अलग प्रक्रिया है। लेकिन दुर्भाग्य से कई बार पुलिस को पता चल जाता है कि आतंकवादी कोई वारदात करने वाले हैं। पुलिस पहले ही घेराबंदी कर लेती हैं और उस आतंकवादी को मार गिराती है। कांग्रेस की दृष्टि में इससे बड़ा जघन्य अपराध और पाप कोई नहीं है। जब तक सड़क पर पाँच-छ: हिन्दुओं की लाशें न बिछ जाए तब तक किसी को आतंकवादी भला कैसे ठहराया जा सकता है? जैसे न्यायालय में किसी तथ्य को सिध्द करने के लिए सबूतों की जरूरत पड़ती है वैसे ही कांग्रेस की दृष्टि में आतंकवादी कहलवाने के लिए छ: सात हिन्दुओं की लाशों की जरूरत हैं। दुर्भाग्य से आतंकवादी भी कांग्रेस और सरकार दोनों की ही मानसिकता को अच्छी तरह समझ गए हैं और इसका वे पूरा लाभ भी उठा रहे हैं । कश्मीर में आतंकवादियों ने दिन दहाड़े हजारों लोगों की हत्या कर दी हैं।
लेकिन सौ दौ सौ आतंकवादियों को कानूनी प्रक्रिया के चलते फांसी की सजा हो गई हो और सचमुच ही उनको फांसी के तख्ते पर चढ़ा दिया हो अभी तक ऐसा देश के देखने में नहीं आया है। पंजाब में आतंकवादी वर्षों वर्ष अपना सिक्का जमाते रहे और निर्दोषों को मारते रहे। लेकिन आतंकवादियों को कानून ने कोई सजा दी हो ऐसा देखने के लिए पंजाब के डीजीपी के.पी.एस. गिल भी तरसते रहे। सीपीएम तो कांग्रेस से आगे बढ़ा हुआ है। उसका मानना है कि नंदीग्राम के किसानों को जो अपनी जमीन की रक्षा के लिए लड़ रहे हैं मारने का अधिकार सीपीएम के कैडर के पास है। पश्चिमी बंगाल के मुख्यमंत्री बुध्ददेव भट्टाचार्य ने तो कह दिया था कि जो जैसा करेगा वैसा भरेगा। संकेत स्पष्ट था कि नंदीग्राम का किसान पार्टी के खिलाफ गर्दन उठाएगा तो गर्दन कटेगी। लेकिन आतंकवादियों के मामले में सीपीएम का स्पष्ट मानना है कि पुलिस जगह-जगह उन पर अत्याचार कर रही है।
इस पृष्ठभूमि में सोहराबुद्दीन की मुठभेड़ को देखना होगा। गुजरात में आतंकवादी कोई बड़ी वारदात करने में सफल नहीं हो पा रहे हैं। सामान्य नागरिक तो इसका अर्थ यह निकालेगा कि वहां पुलिस सख्त है और आतंकवादी वारदात करने से पहले ही मार दिए जाते हैं। लेकिन कांग्रेस के लिए इसका दूसरा अर्थ है। यदि आतंकवादियों को काम करने का मौका नहीं दिया जा रहा तो इसका अर्थ है कि गुजरात सरकार आतंकवादियों के मानवाधिकारों का हनन कर रही है। कपिल सिब्बल से लेकर सोनिया गांधी तक सोहराबुद्दीन के लिए हलकान हो रहे हैं। उनका दु:ख यह है कि उन्होंने अफजल गुरू को तो फांसी के तख्ते पर लटकने से बचा लिया है लेकिन वे बेचारे सोहराबुद्दीन को बचा नहीं पाए। वह बेचारा अकेला पुलिस के हत्थे चढ़ गया और मुठभेड़ में मारा गया। कपिल सिब्बल मौके पर अपनी कानून की किताबें लेकर हाजिर नहीं हो पाए। उनका आग्रह है कि पुलिस को सोहराबुद्दीन जैसे आतंकवादियों को जिंदा पकड़ना चाहिए और फिर कचहरी में पेश करना चाहिए और फिर वकील मोटी फीस लेकर वकालत करने के लिए तैयार मिलेंगे ही। लेकिन शायद वे नहीं जानते ए.के. 47 लेकर घूम रहा आतंकवादी बकरी का बच्चा नहीं होता जिसको पुलिस जब चाहे रस्सी से बांध ले। कांग्रेस गुजरात में सोहराबुद्दीन की मुठभेड़ में हुई मौत को लेकर जनता का फतवा ढूँढ रही है। सोनिया गांधी तो इतने गुस्से में आ गई कि उसने नरेन्द्र मोदी को मौत का सौदागर तक कह दिया। अब गुजरात की जनता को ही फैसला करना है कि मौत का सौदागर सोहराबुद्दीन था या नरेन्द्र मोदी? और उससे बड़ा प्रश्न यह है कि सोहराबुद्दीन के पक्ष में खड़े होने वाले लोग कौन है? और उनकी मंशा क्या है?
(नवोत्थान लेख सेवा हिन्दुस्थान समाचार)
कांग्रेस को आतंकवादियों की चिंता सता रही है। उनकी दृष्टि में आतंकवादियों के मानवाधिकारों की चिंता सरकार नहीं करेगी तो और कौन करेगा? लगता है कांग्रेस की दृष्टि में आतंकवादी का मसला अल्पसंख्यक से भी जुड़ा हुआ है। क्योंकि ज्यादातर आतंकवादी मुसलमान ही हैं इसलिए जब कोई आतंकवादी मरता है तो कांग्रेस का अल्पसंख्यक सैल तुरंत जीवित हो जाता है। उसको लगता है यह आतंकवादी नहीं मरा बल्कि एक बदनसीब अल्पसंख्यक को गोली मार दी गई है। ऐसा नहीं कि कांग्रेस आतंकवादियों के पक्ष में खुले तौर पर आ गई है। उसमें आतंकवादियों के पक्ष में आने के लिए कानूनी प्रक्रिया को ढाल के तौर पर इस्तेमाल किया है। शायद कांग्रेस यह मानती है कि सच्चा आतंकवादी होने के लिए जरूरी है पहले आतंकवादी अपनी ए.के. -47 से कुछ हिन्दुओं को मार गिराए। उसके बाद पुलिस उन आतंकवादियों को पकड़े और पकड़ने के बाद उस पर मुकदमा चलाए। मुकदमा में यदि इनको फांसी की सजा हो जाए तो उस पर दया की अपील करते हुए राष्ट्रपति के पास आवेदन भेजा जाए और वह आवेदन परंपरागत तरीके से लंबित हो जाए। आतंकवाद की भी एक पूरी प्रक्रिया है और आतंकवादी को पकड़ने की भी अलग प्रक्रिया है। लेकिन दुर्भाग्य से कई बार पुलिस को पता चल जाता है कि आतंकवादी कोई वारदात करने वाले हैं। पुलिस पहले ही घेराबंदी कर लेती हैं और उस आतंकवादी को मार गिराती है। कांग्रेस की दृष्टि में इससे बड़ा जघन्य अपराध और पाप कोई नहीं है। जब तक सड़क पर पाँच-छ: हिन्दुओं की लाशें न बिछ जाए तब तक किसी को आतंकवादी भला कैसे ठहराया जा सकता है? जैसे न्यायालय में किसी तथ्य को सिध्द करने के लिए सबूतों की जरूरत पड़ती है वैसे ही कांग्रेस की दृष्टि में आतंकवादी कहलवाने के लिए छ: सात हिन्दुओं की लाशों की जरूरत हैं। दुर्भाग्य से आतंकवादी भी कांग्रेस और सरकार दोनों की ही मानसिकता को अच्छी तरह समझ गए हैं और इसका वे पूरा लाभ भी उठा रहे हैं । कश्मीर में आतंकवादियों ने दिन दहाड़े हजारों लोगों की हत्या कर दी हैं।
लेकिन सौ दौ सौ आतंकवादियों को कानूनी प्रक्रिया के चलते फांसी की सजा हो गई हो और सचमुच ही उनको फांसी के तख्ते पर चढ़ा दिया हो अभी तक ऐसा देश के देखने में नहीं आया है। पंजाब में आतंकवादी वर्षों वर्ष अपना सिक्का जमाते रहे और निर्दोषों को मारते रहे। लेकिन आतंकवादियों को कानून ने कोई सजा दी हो ऐसा देखने के लिए पंजाब के डीजीपी के.पी.एस. गिल भी तरसते रहे। सीपीएम तो कांग्रेस से आगे बढ़ा हुआ है। उसका मानना है कि नंदीग्राम के किसानों को जो अपनी जमीन की रक्षा के लिए लड़ रहे हैं मारने का अधिकार सीपीएम के कैडर के पास है। पश्चिमी बंगाल के मुख्यमंत्री बुध्ददेव भट्टाचार्य ने तो कह दिया था कि जो जैसा करेगा वैसा भरेगा। संकेत स्पष्ट था कि नंदीग्राम का किसान पार्टी के खिलाफ गर्दन उठाएगा तो गर्दन कटेगी। लेकिन आतंकवादियों के मामले में सीपीएम का स्पष्ट मानना है कि पुलिस जगह-जगह उन पर अत्याचार कर रही है।
इस पृष्ठभूमि में सोहराबुद्दीन की मुठभेड़ को देखना होगा। गुजरात में आतंकवादी कोई बड़ी वारदात करने में सफल नहीं हो पा रहे हैं। सामान्य नागरिक तो इसका अर्थ यह निकालेगा कि वहां पुलिस सख्त है और आतंकवादी वारदात करने से पहले ही मार दिए जाते हैं। लेकिन कांग्रेस के लिए इसका दूसरा अर्थ है। यदि आतंकवादियों को काम करने का मौका नहीं दिया जा रहा तो इसका अर्थ है कि गुजरात सरकार आतंकवादियों के मानवाधिकारों का हनन कर रही है। कपिल सिब्बल से लेकर सोनिया गांधी तक सोहराबुद्दीन के लिए हलकान हो रहे हैं। उनका दु:ख यह है कि उन्होंने अफजल गुरू को तो फांसी के तख्ते पर लटकने से बचा लिया है लेकिन वे बेचारे सोहराबुद्दीन को बचा नहीं पाए। वह बेचारा अकेला पुलिस के हत्थे चढ़ गया और मुठभेड़ में मारा गया। कपिल सिब्बल मौके पर अपनी कानून की किताबें लेकर हाजिर नहीं हो पाए। उनका आग्रह है कि पुलिस को सोहराबुद्दीन जैसे आतंकवादियों को जिंदा पकड़ना चाहिए और फिर कचहरी में पेश करना चाहिए और फिर वकील मोटी फीस लेकर वकालत करने के लिए तैयार मिलेंगे ही। लेकिन शायद वे नहीं जानते ए.के. 47 लेकर घूम रहा आतंकवादी बकरी का बच्चा नहीं होता जिसको पुलिस जब चाहे रस्सी से बांध ले। कांग्रेस गुजरात में सोहराबुद्दीन की मुठभेड़ में हुई मौत को लेकर जनता का फतवा ढूँढ रही है। सोनिया गांधी तो इतने गुस्से में आ गई कि उसने नरेन्द्र मोदी को मौत का सौदागर तक कह दिया। अब गुजरात की जनता को ही फैसला करना है कि मौत का सौदागर सोहराबुद्दीन था या नरेन्द्र मोदी? और उससे बड़ा प्रश्न यह है कि सोहराबुद्दीन के पक्ष में खड़े होने वाले लोग कौन है? और उनकी मंशा क्या है?
(नवोत्थान लेख सेवा हिन्दुस्थान समाचार)
बुधवार, 5 दिसंबर 2007
हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव पर विशेष

लेखक- डा. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री
गुजरात और हिमाचल प्रदेश दोनों प्रदेशों में हो रहे विधानसभा चुनावों में भाजपा अपनी जीत के प्रति आश्वस्त दिखाई दे रही है। गुजरात का चुनाव तो एक प्रकार से अंतरराष्ट्रीय फोकस में ही आ गया है क्योंकि यह चुनाव केवल भाजपा की ही नहीं बल्कि देश की भविष्य की राजनीति के दिशा संकेत भी देगा। पश्चिमोत्तर में होने वाले हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनाव भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। हिमाचल प्रदेश के चुनाव आस पास के कई राज्यों के चुनावों को प्रभावित करते हैं। भाजपा इस प्रदेश में सरकार बनाने की दावेदारी भी कर रही है। लेकिन अब तक इस रास्ते में एक ही बाधा आ रही थी। भाजपा जीतती है तो मुख्यमंत्री कौन बनेगा इसको लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं थी और भाजपा हाइकमांड शायद इस अस्पष्टता को चुनावों में लाभकारी मान रहा था। भावी मुख्यमंत्री को लेकर प्रो. प्रेम कुमार धूमल के साथ साथ शांताकुमार का नाम भी मीडिया उछालता रहता है। उससे कार्यकर्ता में भी भ्रम पैदा होता है और प्रदेश की जनता में भी दुविधा बनी रहती है। प्रो. प्रेम कुमार धूमल अभी हाल ही में लोकसभा का चुनाव जीते थे, इसलिए कुछ लोगों ने यह अनुमान लगाना शुरु कर दिया था कि उनकी वापसी का रास्ता कठिन है। इससे भी भाजपा को नुकसान होने की संभावना बढती जा रही थी ।
कांग्रेसी खेमा यह चाहता था कि चुनाव के दौरान भाजपा अपने मुख्यमंत्री प्रत्याशी के नाम का उल्लेख न करे। उससे कांग्रेस को यह कहने का अवसर मिल जाता था कि भाजपा में फूट है और उसके भीतर मुख्यमंत्री के कई प्रत्याशी हैं। इसके चलते भाजपा किसी एक प्रत्याशी के नाम की घोषणा करने में हिचकिचा रही है। कांग्रेस का मुख्य आधार ऊपरी और पुराने हिमाचल में ही है। परंतु अपने पांच साल के मुख्यमंत्रित्व काल में प्रो. प्रेम कुमार धूमल ने पुराने हिमाचल में भी भाजपा का एक बहुत बडा समर्थक आधार खडा करने में सफलता प्राप्त कर ली थी। इसलिए कांग्रेस को भय था कि यदि भाजपा मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी का नाम और खास कर प्रो. धूमल के नाम की घोषणा कर देती है तो उसे पुराने हिमाचल में भी काफी नुकसान हो जाता। लेकिन अलग कारणों से भाजपा के कार्यकर्ताओँ की इच्छा थी कि चुनाव से पूर्व भावी मुख्यमंत्री के नाम की घोषणा कर दी जानी चाहिए।
भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने कल अनिश्चय की स्थिति को समाप्त कर दिया। उन्होंने यह घोषणा कर दी कि चुनाव प्रो. प्रेम कुमार धूमल के नेतृत्व में लडे जाएंगे और वही सत्ता में आने पर मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी होंगे। इस घोषणा से निश्चय ही भाजपा को नया आत्मबल प्राप्त होगा और शांता कुमार ने जिस प्रकार पार्टी के इस निर्णय का प्रसन्न मन से स्वागत किया है उनसे उन विश्लेषकों की अटकलों को भी विराम लग जाएगा जो शांता और धूमल को एक दूसरे के आमने सामने खडा करने में ही तमाम ऊर्जा खर्च करते रहते हैं। धूमल शायद भाजपा के ऐसे पहले नेता हैं जिनका नये और पुराने दोनों क्षेत्रों में समान सम्मान और आधार है। धूमल की सबसे बडी पूंजी कार्यकर्ताओँ में उनकी पैठ है। वे प्रदेश में जमीन से जुडे नेता माने जाते हैं। प्रदेश की जनता और कार्यकर्ता सहज भाव से उनसे बात भी कर सकता और अपने सुख दुख सांझी कर सकता है। धूमल राजनैतिक मतभिन्नताओं और विद्वेषों को बहुत दूर तक खींचने के आदी नहीं हैं। जिसके कारण उनके विरोधी भी उनकी प्रशंसा करते हैं। धूमल का नाम मुख्यमंत्री के पद के लिए लेकर भाजपा ने कांग्रेस की रणनीति पर छक्का मारा है ।
इसके साथ ही भाजपा ने यह प्रयास किया है कि ईमानदार, कर्मठ और संगठन के प्रति कार्यकर्ताओं को टिकट दिये जाएं। आज सभी राजनीतिक दलों में निहित भ्रष्ट तत्वों की घुसपैठ हो रही है। भाजपा ने ऐसा प्रयास किया है कि ऐसे तत्वों को टिकट न दी जाए। जबकि इसके विपरीत कांग्रेस ने टिकट आवंटन में इस प्रकार का बोझ अपने मन पर नहीं लादा। विधानसभा के उपाध्यक्ष का टिकट सोनिया गांधी के रसोइये के बेटे को दे दिया गया। इससे पूरे सोलन जिला की कांग्रेस में हा हा कार मचा हुआ है। इसी प्रकार मुख्यमंत्री वीरभद्र के पारिवारिक सदस्य कहे जाने वाले सिंगीराम की जगह सोनिया गांधी के किसी बाडीगार्ड को दिया गया है । सिंगीराम पिछले तीस सालों से विधायक बनते चले आ रहे हैं। हिमाचल में सोनिया गांधी की तानाशाही के खिलाफ विद्रोह के स्वर उठ रहे हैं। निश्चय ही इससे भाजपा को फायदा मिलेगा।
चुनावी रणनीति में कांग्रेस की दरारें यहां साफ और स्पष्ट दिखाई दे रही हैं। भाजपा ने भौगलिक संतुलन बना कर हिमाचल के सभी वर्गों की भावनाओं का सम्मान करने का प्रयास किया है। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष जयराम ठाकुर मंडी जिले के रहने वाले हैं। मंडी हिमाचल प्रदेश का तीसरा महतवपूर्ण खंड है। मंडी के हाथों में भाजपा की कमान शायद पहली बार ही आयी है। इसलिए मंडी में भाजपा का प्रदर्शन आगे से बेहतर होगा ऐसा माना जा रहा है। जयराम ठाकुर ने पिछले कुछ अर्से से निरंतर प्रवास कर भाजपा कार्यकर्ताओं में वैचारिक प्रतिबध्दता जागृत की है और मंडी जिले में विशेष कर भाजपा के पक्ष में एक भावात्मक उभार पैदा किया है। कांगडा जिले में जो प्रदेश का सबसे बडा जिला है, शांता कुमार का खासा जनाधार है और यह जिला व्यक्तिविशेष से ऊपर उठ कर पंजाब के समय से ही भाजपा समर्थक जिला रहा है। कांग्रेस की सरकार जिस प्रकार कांगडा जिले के साथ विकास के मामले में मतभेद करती है उससे भी यहां के लोगों में कांग्रेस के प्रति रोष बना रहता है। हमीरपुर, ऊना और बिलासपुर धूमल के गृह जिले हैं। कुछ माह पहले हुए लोकसभा की सीट के लिए उपचुनाव में धूमल ने दो विधानसभा सीटों को छोड कर बाकी सभी विधानसभाई क्षेत्रों में बढत हासिल की थी। इससे उनके प्रभाव का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। भाजपा द्वारा की गई ऐसी सफल मोर्चाबंदी में केवल एक ही कमी थी कि इस चुनावी लडाई का सेनापति कौन होगा ? राजनाथ सिंह ने उसकी घोषणा कर के इस अंतिम कमी को भी दूर कर दिया है और यकीनन भाजपा को इससे लडाई लडने में आसानी होगी ।
(नवोत्थान लेख सेवा हिन्दुस्थान समाचार)
कांग्रेसी खेमा यह चाहता था कि चुनाव के दौरान भाजपा अपने मुख्यमंत्री प्रत्याशी के नाम का उल्लेख न करे। उससे कांग्रेस को यह कहने का अवसर मिल जाता था कि भाजपा में फूट है और उसके भीतर मुख्यमंत्री के कई प्रत्याशी हैं। इसके चलते भाजपा किसी एक प्रत्याशी के नाम की घोषणा करने में हिचकिचा रही है। कांग्रेस का मुख्य आधार ऊपरी और पुराने हिमाचल में ही है। परंतु अपने पांच साल के मुख्यमंत्रित्व काल में प्रो. प्रेम कुमार धूमल ने पुराने हिमाचल में भी भाजपा का एक बहुत बडा समर्थक आधार खडा करने में सफलता प्राप्त कर ली थी। इसलिए कांग्रेस को भय था कि यदि भाजपा मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी का नाम और खास कर प्रो. धूमल के नाम की घोषणा कर देती है तो उसे पुराने हिमाचल में भी काफी नुकसान हो जाता। लेकिन अलग कारणों से भाजपा के कार्यकर्ताओँ की इच्छा थी कि चुनाव से पूर्व भावी मुख्यमंत्री के नाम की घोषणा कर दी जानी चाहिए।
भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने कल अनिश्चय की स्थिति को समाप्त कर दिया। उन्होंने यह घोषणा कर दी कि चुनाव प्रो. प्रेम कुमार धूमल के नेतृत्व में लडे जाएंगे और वही सत्ता में आने पर मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी होंगे। इस घोषणा से निश्चय ही भाजपा को नया आत्मबल प्राप्त होगा और शांता कुमार ने जिस प्रकार पार्टी के इस निर्णय का प्रसन्न मन से स्वागत किया है उनसे उन विश्लेषकों की अटकलों को भी विराम लग जाएगा जो शांता और धूमल को एक दूसरे के आमने सामने खडा करने में ही तमाम ऊर्जा खर्च करते रहते हैं। धूमल शायद भाजपा के ऐसे पहले नेता हैं जिनका नये और पुराने दोनों क्षेत्रों में समान सम्मान और आधार है। धूमल की सबसे बडी पूंजी कार्यकर्ताओँ में उनकी पैठ है। वे प्रदेश में जमीन से जुडे नेता माने जाते हैं। प्रदेश की जनता और कार्यकर्ता सहज भाव से उनसे बात भी कर सकता और अपने सुख दुख सांझी कर सकता है। धूमल राजनैतिक मतभिन्नताओं और विद्वेषों को बहुत दूर तक खींचने के आदी नहीं हैं। जिसके कारण उनके विरोधी भी उनकी प्रशंसा करते हैं। धूमल का नाम मुख्यमंत्री के पद के लिए लेकर भाजपा ने कांग्रेस की रणनीति पर छक्का मारा है ।
इसके साथ ही भाजपा ने यह प्रयास किया है कि ईमानदार, कर्मठ और संगठन के प्रति कार्यकर्ताओं को टिकट दिये जाएं। आज सभी राजनीतिक दलों में निहित भ्रष्ट तत्वों की घुसपैठ हो रही है। भाजपा ने ऐसा प्रयास किया है कि ऐसे तत्वों को टिकट न दी जाए। जबकि इसके विपरीत कांग्रेस ने टिकट आवंटन में इस प्रकार का बोझ अपने मन पर नहीं लादा। विधानसभा के उपाध्यक्ष का टिकट सोनिया गांधी के रसोइये के बेटे को दे दिया गया। इससे पूरे सोलन जिला की कांग्रेस में हा हा कार मचा हुआ है। इसी प्रकार मुख्यमंत्री वीरभद्र के पारिवारिक सदस्य कहे जाने वाले सिंगीराम की जगह सोनिया गांधी के किसी बाडीगार्ड को दिया गया है । सिंगीराम पिछले तीस सालों से विधायक बनते चले आ रहे हैं। हिमाचल में सोनिया गांधी की तानाशाही के खिलाफ विद्रोह के स्वर उठ रहे हैं। निश्चय ही इससे भाजपा को फायदा मिलेगा।
चुनावी रणनीति में कांग्रेस की दरारें यहां साफ और स्पष्ट दिखाई दे रही हैं। भाजपा ने भौगलिक संतुलन बना कर हिमाचल के सभी वर्गों की भावनाओं का सम्मान करने का प्रयास किया है। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष जयराम ठाकुर मंडी जिले के रहने वाले हैं। मंडी हिमाचल प्रदेश का तीसरा महतवपूर्ण खंड है। मंडी के हाथों में भाजपा की कमान शायद पहली बार ही आयी है। इसलिए मंडी में भाजपा का प्रदर्शन आगे से बेहतर होगा ऐसा माना जा रहा है। जयराम ठाकुर ने पिछले कुछ अर्से से निरंतर प्रवास कर भाजपा कार्यकर्ताओं में वैचारिक प्रतिबध्दता जागृत की है और मंडी जिले में विशेष कर भाजपा के पक्ष में एक भावात्मक उभार पैदा किया है। कांगडा जिले में जो प्रदेश का सबसे बडा जिला है, शांता कुमार का खासा जनाधार है और यह जिला व्यक्तिविशेष से ऊपर उठ कर पंजाब के समय से ही भाजपा समर्थक जिला रहा है। कांग्रेस की सरकार जिस प्रकार कांगडा जिले के साथ विकास के मामले में मतभेद करती है उससे भी यहां के लोगों में कांग्रेस के प्रति रोष बना रहता है। हमीरपुर, ऊना और बिलासपुर धूमल के गृह जिले हैं। कुछ माह पहले हुए लोकसभा की सीट के लिए उपचुनाव में धूमल ने दो विधानसभा सीटों को छोड कर बाकी सभी विधानसभाई क्षेत्रों में बढत हासिल की थी। इससे उनके प्रभाव का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। भाजपा द्वारा की गई ऐसी सफल मोर्चाबंदी में केवल एक ही कमी थी कि इस चुनावी लडाई का सेनापति कौन होगा ? राजनाथ सिंह ने उसकी घोषणा कर के इस अंतिम कमी को भी दूर कर दिया है और यकीनन भाजपा को इससे लडाई लडने में आसानी होगी ।
(नवोत्थान लेख सेवा हिन्दुस्थान समाचार)
महिलाओं के पक्षधर श्री नरेन्द्र मोदी

गुजरात के मुख्यमंत्री श्री नरेंद्र मोदी देश के अत्यधिक प्रसिद्ध अविवाहितों में से एक है। फिर भी, गुजरात के सर्वांगीण विकास को लेकर श्री मोदी महिलाओं के प्रति उदार हृदय हैं। इसी कारण वे चुनावी मैदान में महिलाओं को उतारने में पीछे नहीं हैं।
दिसम्बर में होने वाले चुनाव में जहां कांग्रेस ने सिर्फ 14 महिला उम्मीदवारी को चुनावी जंग में खड़ा किया है। वहीं भाजपा ने 26 महिला उम्मीदवारों को सियासी जंग में उतार रहा है।
श्री मोदी कहते हैं कि वे महिला उत्थान और उनके जुड़े मामलों को पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
साबरमती से खड़ी भाजपा उम्मीदवार गीताबेन पटेल का कहना है कि मोदी के पीछे सारे गुजरात की महिलाओं का समर्थन हैं।
नारोदा से खड़ी माया कोदानी कहती हैं कि काफी सोच विचार के बाद ही पार्टी ने उन्हें खड़ा करने का फैसला लिया है। उन्होंने कहा कि इससे पता चलता है कि भाजपा महिलाओं की भागेदारी बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है।
दिसम्बर में होने वाले चुनाव में जहां कांग्रेस ने सिर्फ 14 महिला उम्मीदवारी को चुनावी जंग में खड़ा किया है। वहीं भाजपा ने 26 महिला उम्मीदवारों को सियासी जंग में उतार रहा है।
श्री मोदी कहते हैं कि वे महिला उत्थान और उनके जुड़े मामलों को पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
साबरमती से खड़ी भाजपा उम्मीदवार गीताबेन पटेल का कहना है कि मोदी के पीछे सारे गुजरात की महिलाओं का समर्थन हैं।
नारोदा से खड़ी माया कोदानी कहती हैं कि काफी सोच विचार के बाद ही पार्टी ने उन्हें खड़ा करने का फैसला लिया है। उन्होंने कहा कि इससे पता चलता है कि भाजपा महिलाओं की भागेदारी बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है।
मंगलवार, 4 दिसंबर 2007
गुजरात में विकास युग - भाग- 3
शिक्षा में गुजरात मॉडल
भारत सरकार ने सर्वशिक्षा अभियान के गुजरात माडल की सराहना की है और अन्य राज्यों से भी इसे अपनाने का आग्रह किया है। कन्या केलावरी रथ यात्रा के माध्यम से प्राइमरी प्रवेश 85 से बढ़कर 100 प्रतिशत हो गया है और बीच में स्कूल छोड़ने वालों की संख्या में 34 प्रतिशत से घट कर 3.24 प्रतिशत रह गया है। अब राज्य में कांग्रेसी शासन के बाद से एक लाख अध्यापकों और एक लाख क्लास रूमों की कमी पूरी कर ली गई है और 44000 स्कलों में भी शौचालय की सुविधा उपलब्ध हो गई है। पिछले 5 वर्षों में उच्च शिक्षा संस्थान तथा तकनीकी/मेडिकल की सीटें दुगुनी हो गयी हैं क्योंकि गुजरात को इन उच्च शिक्षा सुविधाओं से वंचित रखा गया था। विश्वविद्यालयों की संख्या 7 से बढ़कर 17 हो गई है जिसमें प्राइवेट भागीदारी भी शमिल है, जैसे अंबानी, निरमा आदि।
कन्या केलावाड़ी निधि का निर्माण मुख्यमंत्री द्वारा प्राप्त उपहारों की नीलामी से किया गया है तथा 1000 रूपए के विद्यालक्ष्मी बंधपत्र प्रत्येक सरकारी विद्यार्थी को प्रवेश के समय दिए जाते हैं। गांव में पढ़नेवाली कन्याओं को स्कूल के लिए नि:शुल्क बस सेवा उपलब्ध कराई जाती है। बेरोजगारों को नि:शुल्क कंप्यूटर प्रशिक्षण दिया जाता है और युवाओं को भी अंग्रेजी प्रशिक्षण दिया जाता है। बड़ी संख्या में उच्च शिक्षा संस्थाएं स्थापित की गई हैं। नेशनल लॉ स्कूल तथा 19 विश्वस्तरीय पाठयक्रम शुरू किए गए हैं जिसमें दूरसंचार, मेरीन इंजीनियंरिंग आदि शामिल हैं।
निवेश के मोर्चे पर सबसे आगे
औद्योगिक मोर्चो पर 2003, 2005, तथा 2007 में तीन शिखर बैठकें हुई थी जिसमें गुजरात में 20 लाख लोगों को रोजगार देने के लिए 666000 करोड़ रूपए के निवेश के लिए 666 सहमति पत्रों पर हस्ताक्षर किए गए थे; 2 लाख करोड़ के एक और निवेश प्रस्ताव पर भी हस्ताक्षर किए गए थे। भारतीय रिजर्व बैंक की घोषणा के अनुसार, सभी राज्यों में से 2006-07 में निवेश के मामले में गुजरात का प्रथम स्थान रहा, जहां कुल निवेश का 25 प्रतिशत निवेश हुआ। गुजरात में औद्योगिक अशांति के कारण कार्य दिनों की क्षति के रूप में सबसे कम 0.9 प्रतिशत थी जबकि इसकी तुलना में राष्ट्रीय औसत 5.25 प्रतिशत है।
गुजरात के 40 लघु और मध्यम दर्जे के बंदरगाह निर्यात-आयात माल का 104 मिलियन टन कार्गो को संभालते हैं जो पूरे भारत का 74 प्रतिशत भाग बनता है। 2003 में श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने सबसे बड़े राजमार्ग अहमदाबाद-बड़ोदरा का उद्धाटन किया था। गुजरात के अधिकांश पीएसयू की हानि अब उलट गई है आर इनमें विशाल लाभ हो रहा है। गुजरात 132'/200' फीट रिंग रोड, फ्लाई ओवर, ऑप्टीकल फाइबर में भी तेजी से प्रगति कर रहा है जिससे वह विश्व तथा अन्य कई क्षेत्रों में दूसरे नंबर आने वाला राज्य बन गया है।
सर्वोत्कृष्ट शहरी योजना
साबरमती रिवर फ्रंट प्रोजेक्ट को सर्वोत्कृष्ट शहरी डिजाइन एवार्ड प्रधानमंत्री के हाथों प्राप्त हुआ था। अहमदाबाद में बीआरटीएस परियोजना पर काम चल रहा है। एएसमसी में स्लम अपग्रेडेशन प्रोग्राम को संयुक्त राष्ट्र संघ से अंतर्राष्ट्रीय एवार्ड मिला। अब गुजरात में मल्टीप्लेक्स, सुपरमाल और 15 फाइव स्टार होटलों की बाढ़ सी आ गई है।
अपवंचितों का विकास
किसानों, गरीबों और अपवंचित लोगों के लिए उनहें अनाज, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य तथा रोजगार देने के लिए बहुत सारे उपाय किए गए हैं। उन सभी का यहां वर्णन करना संभव नहीं है। परंतु, हाल में मुख्यमंत्री ने 185 लाख लोगों के लिए 39000 करोड़ रूपए के तीन मेगा पैकेज समर्पित किए थे जो 11वीं योजना में कुल 37 प्रशित जनसंख्या के लिए इस प्रकार हैं:
1- 60 लाख सागरखेड़ू (मछुआरे, खारवा, अगावियास आदि) के लिए 11000 करोड़ रूपए का पैकेज
2- 75 लाख वन बंधुओं (आदिवासी) के लिए 15000 करोड़ रूपए और
3- 50 लाख शहरी गरीबों के लिए 13000 करोड़ रूपए।
गुजरात पहला राज्य है जिसने अपवंचित तथा गरीब लोगों के लिए इतने समन्वित रूप में उपाय किए हैं।
क्षेत्रीय असंतुलन की समाप्ति
गुजरात ने 1 लाख करोड़ रूपए से अधिक की 11वीं योजना को 11 प्रतिशत विकास दर के साथ स्वीकार किया। योजना आयोग ने गुजरात के लिए 11 प्रतिशत विकास दर निश्चित की जो अन्य राज्यों से कहीं अधिक है, जबकि भारत की विकास दर 9 प्रतिशत निश्चित हुई है। गुजरात ने फिर इसे स्वीकार किया। गुजरात ने अपने राज्य से क्षेत्रीय असंतुलन समाप्त करने की एक और चुनौती भी स्वीकार की जिसके लिए विशेष रूप से 30 पिछड़े जिलों के लए उपाय किए गए।
विवेकपूर्ण वित्तीय प्रबंधन
गुजरात की वित्तीय प्रबंधन देश में सर्वोत्कृष्ट है। पिछले 3 वर्षों में इसका राजस्व अधिक रहा जबकि पिछले 5 वषों से कोई टैक्स बढ़ाया नहीं गया बल्कि 1200 करोड़ रूपए की रियायतें दी गई, स्टांप डयूटी 15 प्रतिशत से घटाकर 5 प्रतिशत की गई, वैट की दर 27 प्रशित रखकर शुरूआत की गई, ऑक्ट्राय शुल्क समाप्त कर दिया गया, वित्तीय संस्थानों के ऋण से 2000 करोड़ रूपए ब्याज की बचत की गई; कच्चे तेल की रायल्टी बढ़ाकर प्रति वर्ष 350 करोड़ रूपए की गई और कोयले की कीमत को घटाकर 125 करोड़ रूपए किया गया - ये सभी कदम गुजरात ने विवेकपूर्ण ढंग से किए। यही देश का एकमात्र राज्य है जिसने राजस्व अधिशेष, वित्तीय घाटे, सार्वजनिक ऋण और गारंटी आदि जैसे सभी लक्ष्य प्राप्त किए हैं।
नेतृत्व
ये तथ्य स्वयं अपनी कहानी कह रहे हैं कि गुजरात ने नवीन खोजें तथा पहल करके अपनी विकास रणनीति तैयार की और इस प्रकार गुजरात ने राज्य की प्रगति तथा लोगों के कल्याण के लिए लाभकारी परिणाम प्राप्त किए। मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अटल बिहारी वाजपेयी की गरीबों के प्रति उदारता और पूर्व अमरीकी महान राष्ट्रपति श्री जान एफ केनेडी के ग्लोबल विजन का गहन प्रदर्शन किया। हमारे आंकड़े तथा जमीनी हकीकत दर्शाती है कि मुख्यमंत्री ने लोगों के सपनों को साकार करने का प्रयास किया और लोगों का विश्वास जीता है। यही एक ऐसा तथ्य है जिसके कारण उनके नेतृत्व में भाजपा गुजरात चुनाव में विजय प्राप्त करेगी।
भारत सरकार ने सर्वशिक्षा अभियान के गुजरात माडल की सराहना की है और अन्य राज्यों से भी इसे अपनाने का आग्रह किया है। कन्या केलावरी रथ यात्रा के माध्यम से प्राइमरी प्रवेश 85 से बढ़कर 100 प्रतिशत हो गया है और बीच में स्कूल छोड़ने वालों की संख्या में 34 प्रतिशत से घट कर 3.24 प्रतिशत रह गया है। अब राज्य में कांग्रेसी शासन के बाद से एक लाख अध्यापकों और एक लाख क्लास रूमों की कमी पूरी कर ली गई है और 44000 स्कलों में भी शौचालय की सुविधा उपलब्ध हो गई है। पिछले 5 वर्षों में उच्च शिक्षा संस्थान तथा तकनीकी/मेडिकल की सीटें दुगुनी हो गयी हैं क्योंकि गुजरात को इन उच्च शिक्षा सुविधाओं से वंचित रखा गया था। विश्वविद्यालयों की संख्या 7 से बढ़कर 17 हो गई है जिसमें प्राइवेट भागीदारी भी शमिल है, जैसे अंबानी, निरमा आदि।
कन्या केलावाड़ी निधि का निर्माण मुख्यमंत्री द्वारा प्राप्त उपहारों की नीलामी से किया गया है तथा 1000 रूपए के विद्यालक्ष्मी बंधपत्र प्रत्येक सरकारी विद्यार्थी को प्रवेश के समय दिए जाते हैं। गांव में पढ़नेवाली कन्याओं को स्कूल के लिए नि:शुल्क बस सेवा उपलब्ध कराई जाती है। बेरोजगारों को नि:शुल्क कंप्यूटर प्रशिक्षण दिया जाता है और युवाओं को भी अंग्रेजी प्रशिक्षण दिया जाता है। बड़ी संख्या में उच्च शिक्षा संस्थाएं स्थापित की गई हैं। नेशनल लॉ स्कूल तथा 19 विश्वस्तरीय पाठयक्रम शुरू किए गए हैं जिसमें दूरसंचार, मेरीन इंजीनियंरिंग आदि शामिल हैं।
निवेश के मोर्चे पर सबसे आगे
औद्योगिक मोर्चो पर 2003, 2005, तथा 2007 में तीन शिखर बैठकें हुई थी जिसमें गुजरात में 20 लाख लोगों को रोजगार देने के लिए 666000 करोड़ रूपए के निवेश के लिए 666 सहमति पत्रों पर हस्ताक्षर किए गए थे; 2 लाख करोड़ के एक और निवेश प्रस्ताव पर भी हस्ताक्षर किए गए थे। भारतीय रिजर्व बैंक की घोषणा के अनुसार, सभी राज्यों में से 2006-07 में निवेश के मामले में गुजरात का प्रथम स्थान रहा, जहां कुल निवेश का 25 प्रतिशत निवेश हुआ। गुजरात में औद्योगिक अशांति के कारण कार्य दिनों की क्षति के रूप में सबसे कम 0.9 प्रतिशत थी जबकि इसकी तुलना में राष्ट्रीय औसत 5.25 प्रतिशत है।
गुजरात के 40 लघु और मध्यम दर्जे के बंदरगाह निर्यात-आयात माल का 104 मिलियन टन कार्गो को संभालते हैं जो पूरे भारत का 74 प्रतिशत भाग बनता है। 2003 में श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने सबसे बड़े राजमार्ग अहमदाबाद-बड़ोदरा का उद्धाटन किया था। गुजरात के अधिकांश पीएसयू की हानि अब उलट गई है आर इनमें विशाल लाभ हो रहा है। गुजरात 132'/200' फीट रिंग रोड, फ्लाई ओवर, ऑप्टीकल फाइबर में भी तेजी से प्रगति कर रहा है जिससे वह विश्व तथा अन्य कई क्षेत्रों में दूसरे नंबर आने वाला राज्य बन गया है।
सर्वोत्कृष्ट शहरी योजना
साबरमती रिवर फ्रंट प्रोजेक्ट को सर्वोत्कृष्ट शहरी डिजाइन एवार्ड प्रधानमंत्री के हाथों प्राप्त हुआ था। अहमदाबाद में बीआरटीएस परियोजना पर काम चल रहा है। एएसमसी में स्लम अपग्रेडेशन प्रोग्राम को संयुक्त राष्ट्र संघ से अंतर्राष्ट्रीय एवार्ड मिला। अब गुजरात में मल्टीप्लेक्स, सुपरमाल और 15 फाइव स्टार होटलों की बाढ़ सी आ गई है।
अपवंचितों का विकास
किसानों, गरीबों और अपवंचित लोगों के लिए उनहें अनाज, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य तथा रोजगार देने के लिए बहुत सारे उपाय किए गए हैं। उन सभी का यहां वर्णन करना संभव नहीं है। परंतु, हाल में मुख्यमंत्री ने 185 लाख लोगों के लिए 39000 करोड़ रूपए के तीन मेगा पैकेज समर्पित किए थे जो 11वीं योजना में कुल 37 प्रशित जनसंख्या के लिए इस प्रकार हैं:
1- 60 लाख सागरखेड़ू (मछुआरे, खारवा, अगावियास आदि) के लिए 11000 करोड़ रूपए का पैकेज
2- 75 लाख वन बंधुओं (आदिवासी) के लिए 15000 करोड़ रूपए और
3- 50 लाख शहरी गरीबों के लिए 13000 करोड़ रूपए।
गुजरात पहला राज्य है जिसने अपवंचित तथा गरीब लोगों के लिए इतने समन्वित रूप में उपाय किए हैं।
क्षेत्रीय असंतुलन की समाप्ति
गुजरात ने 1 लाख करोड़ रूपए से अधिक की 11वीं योजना को 11 प्रतिशत विकास दर के साथ स्वीकार किया। योजना आयोग ने गुजरात के लिए 11 प्रतिशत विकास दर निश्चित की जो अन्य राज्यों से कहीं अधिक है, जबकि भारत की विकास दर 9 प्रतिशत निश्चित हुई है। गुजरात ने फिर इसे स्वीकार किया। गुजरात ने अपने राज्य से क्षेत्रीय असंतुलन समाप्त करने की एक और चुनौती भी स्वीकार की जिसके लिए विशेष रूप से 30 पिछड़े जिलों के लए उपाय किए गए।
विवेकपूर्ण वित्तीय प्रबंधन
गुजरात की वित्तीय प्रबंधन देश में सर्वोत्कृष्ट है। पिछले 3 वर्षों में इसका राजस्व अधिक रहा जबकि पिछले 5 वषों से कोई टैक्स बढ़ाया नहीं गया बल्कि 1200 करोड़ रूपए की रियायतें दी गई, स्टांप डयूटी 15 प्रतिशत से घटाकर 5 प्रतिशत की गई, वैट की दर 27 प्रशित रखकर शुरूआत की गई, ऑक्ट्राय शुल्क समाप्त कर दिया गया, वित्तीय संस्थानों के ऋण से 2000 करोड़ रूपए ब्याज की बचत की गई; कच्चे तेल की रायल्टी बढ़ाकर प्रति वर्ष 350 करोड़ रूपए की गई और कोयले की कीमत को घटाकर 125 करोड़ रूपए किया गया - ये सभी कदम गुजरात ने विवेकपूर्ण ढंग से किए। यही देश का एकमात्र राज्य है जिसने राजस्व अधिशेष, वित्तीय घाटे, सार्वजनिक ऋण और गारंटी आदि जैसे सभी लक्ष्य प्राप्त किए हैं।
नेतृत्व
ये तथ्य स्वयं अपनी कहानी कह रहे हैं कि गुजरात ने नवीन खोजें तथा पहल करके अपनी विकास रणनीति तैयार की और इस प्रकार गुजरात ने राज्य की प्रगति तथा लोगों के कल्याण के लिए लाभकारी परिणाम प्राप्त किए। मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अटल बिहारी वाजपेयी की गरीबों के प्रति उदारता और पूर्व अमरीकी महान राष्ट्रपति श्री जान एफ केनेडी के ग्लोबल विजन का गहन प्रदर्शन किया। हमारे आंकड़े तथा जमीनी हकीकत दर्शाती है कि मुख्यमंत्री ने लोगों के सपनों को साकार करने का प्रयास किया और लोगों का विश्वास जीता है। यही एक ऐसा तथ्य है जिसके कारण उनके नेतृत्व में भाजपा गुजरात चुनाव में विजय प्राप्त करेगी।
गुजरात में विकास युग - भाग- 2
लेखक-डा. भरत जरीवाला
गुजरात के मुख्यमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी का कहना है कि 'गुजरात भारत को विकास की राह पर ले जाने का साधन बन गया है।' श्री मोदी ने सचमुच इसे सच कर दिखाया है। आज गुजरात भारत के राज्यों में एक आदर्श (मॉडल) बन गया है। गुजरात में इस कदर विकास हुआ है जिसे राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय स्तरों पर मान्यता दी जा रही है। गुजरात को विश्व बैंक, संयुक्त राष्ट्र संघ, यूनेस्को, कामनवेल्थ एसोसिएशन, माइक्रोसाफ्ट, वाशिंगटन पोस्ट, भारत सरकार, योजना आयोग, प्रधानमंत्री, राजीव गांधी फाउंडेशन, इंडिया टूडे और न जाने देश में कहां-कहां से 66 एवार्ड्स/मेडल/मान्यताएं प्राप्त हो चुकी हैं। ऐसा कौन सा क्षेत्र है जहां गुजरात का नाम 'विकास' के दायरे में नहीं आता है-भूकंप प्रबंधन से लेकर देश की विरासत को संभालकर रखना, ई-गवर्नेंस से लेकर विद्युत क्षेत्र में सुधार तक, स्त्री-शिक्षा से लेकर मातृत्व स्वास्थ्य तक, नगरीय डिजाइन तैयार करने से लेकर आर्थिक स्वतंत्रता तक और यहां तक कि सर्वश्रेष्ठ राज्य से लेकर सर्वश्रेष्ठ मुख्यमंत्री तक गुजरात का भंडार श्रेष्ठतम उत्कृष्टताओं से भरा पड़ा है। इतना ही नहीं गुजरात राज्य को तो कल्याण कार्यक्रमों के मामले में भी प्रथम स्थान पर रखा गया है।
कृषि क्रांति
पिछले 5 वर्षों में जल क्रांति के साथ साथ कृषि क्रांति भी आई; अब फसल उत्पादन 9000 करोड़ रूपए से बढ़कर 34000 करोड़ रूपए तक जा पहुंचा है और उपज के हिसाब से दुगुनी हो गई है, कपास की फसल में छह गुणा वृध्दि हुई है जो 2002-03 में 23 लाख गांठों से बढ़कर 2006-07 में 123 लाख गांठ तक पहुंच गई है और इस प्रकार प्रति हेक्टेयर में 700 कि.ग्रा. की पैदावार शुरू हो गई है जो विश्व में एक रिकार्ड है। अब चीन गुजरात से 60 प्रतिशत कपास का आयात करता है। फलों और सब्जियों की उपज में भी गुजरात का स्थान सबसे ऊपर है और यहां प्रति हेक्टेयर 16 मीट्रिक टन की उपज होती है। 'भूमि से प्रयोगशाला' तक कार्यक्रम में 20 लाख किसानों को 'साइल हैल्थ कार्ड' दिए गए हैं ताकि बेहतर फसल उगाने के तरीकों की उत्कृष्ट किस्म का पता लगाया जा सके। राज्य में ड्रिप तथा स्प्रिंकलर सिंचाई को फैलाने के लिए 'गुजरात ग्रीन रेवोल्यूशन कं.' बनाई गई है। गुजरात के किसान अब दो से चार फसलों तक उपज करते हैं और इससे राज्य की जीडीपी में कृषि का हिस्सा बढ़ गया है।
बिजली में आत्मनिर्भरता
अब गुजरात बिजली में लगभग आत्मनिर्भर हो चुका है। 2002 में लगभग 2500 मेगावाट बिजली की कमी थी और 5 वर्षों के अंदर गुजरात ने सेंट्रल सेक्टर तथा प्राइवेट भागीदारी से 8100 मेगावाट से 11000 मेगावाट तक अपनी क्षमता बढ़ा ली है। 9000 मेगावाट बिजली संयंत्र और भी बन रहे हैं जिसमें एनटीपीसी/टाटा संयुक्त रूप से 4000 मेगावाट के संयत्र लगा रहे हैं। गुजरात ने 2003 में बिजी सेक्टर में सुधार का काम शुरू जिससे टी एंड डी क्षति को 45 प्रतिशत से घटा कर 23 प्रतिशत तक ले आया गया और इसे फिर से गठित किया गया। परिणामस्वरूप 2500 करोड़ रूपए की हानि वाली जीईबी में प्रोडक्शन, ट्रांसमिशन, डिस्ट्रीब्यूशन और प्रशासन के लिए 7 कंपनियां बना कर अब इसे 250 करोड़ रूपए वाले लाभकारी कंपनी बना दिया गया है। बिजली का वितरण भी उचित ढंग से होता है - कृषि को 33 प्रतिशत, उद्योग को 33 प्रतिशत तथा निवासीय/वाणिज्य/उपयोगिताओं को 33 प्रतिशत बिजली दी जाती है।
बिजली सुधार
पिछले दो वर्षों से राज्य में बिजली की कटौती नहीं होती है। किसानों को 1700 करोड़ रूपए की बिजली सब्सिडी दी जाती है जो देश में सबसे अधिक है। पांच वर्षों से बिजली की दरें बढ़ाई नहीं गई है और वास्तव में कृषि बिजली पर पिछले 20 वर्षों से चले आ रहे पुराने बिक्री कर को खत्म कर 975 करोड़ रूपए का अनुदान दिया गया और घरों तथा औद्योगिक बिजली के शुल्क में 60 प्रतिशत से घटा कर 20 प्रतिशत कर दिया गया। ज्योतिग्राम योजना के अंतर्गत राज्य के सभी 18000 गांवों को 1200 करोड़ रूपए की लागत से पिछले 4 वर्षों के रिकार्ड समय में बिजली की व्यवस्था की गई, जिससे इन सभी को 24 घंटे बिजली उपलब्ध रहती है। गुजरात ही पहला प्रदेश है, जिसने यह सब कुछ कर दिखाया है। गुजरात में प्रति व्यक्ति बिजली का प्रयोग 1313 यूनिट है जो राष्ट्रीय औसत के 700 यूनिट से दुगूना है। गुजरात को भारत सरकार ने बिजली की इस उपलब्धि के लिए 'इंडिया एक्सीलेंस एवार्ड-2005' दिया था।
गैस इंटरनेशनल बिड
गैस और पेट्रोलियम सेक्टर में गुजरात पहला प्रदेश है जिसने दहेज और हाजिरा में दो एलएनजी टर्मिनल बनाए हैं तथा दो और टर्मिनल भी बनने वाले हैं। 20 शहरों में 2000 किमी लंबी गैस पाइप लाइन से 20 लाख घरों को शीघ्र ही रसोई गैस मिलने लगेगी। गुजरात पीएसयू पेट्रोलियम कार्पोरेशन को आस्ट्रेलिया में ऑयल एक्सप्लोरेशन के लिए 3 ब्लाक तथा मिस्र में 2 ब्लाक प्राप्त हुए हैं और कृष्णा-गोदावरी बेसिन में भी 2 लाख करोड़ रूपए प्राप्त हुए हैं। गुजरात ने सभी सार्वजनिक परिवहनों के लिए सीएनजी गैस में बदलने का काम शुरू कर दिया है ताकि पर्यावरण में सुधार लाया जा सके।
स्वास्थ्य में नई खोजें
'चिरंजीवी योजना' को सिंगापुर में वाशिंगटन पोस्ट का एशियन इन्नोवेटिव एवार्ड प्राप्त हुआ है। 'बेटी वैभव आंदोलन' के कारण महिलाओं की दर प्रति 1000 पुरूष के पीछे 802 से बढ़कर 870 हो गई है। विद्यार्थियों के नि:शुल्क मेडिकल चेक अप का काम हाथ में लिया जा रहा है और उनहें डाक्टरी उपचार तथा आप्रेशन मुफ्त दिया जाएगा। 44000 आंगनवाड़ियों के 3 वर्षा से कम आयु के 10 लाख बच्चों को विटामिन ए-डी पोषाहार दिया जाएगा। विश्व बैंक की सहायता से 30000 टन प्रतिदिन मल उपचार का काम हाथ में लिया जा रहा है जिसकी प्रशंसा सुप्रीम कोर्ट ने भी की है। मेडिकल टूरिज्म की संकल्पना सफल सिध्द हुई है और अहमदाबाद में प्रत्येक अंतर्राष्ट्रीय उड़ान से विदेशी/एनआरआई रोगी यहां आते है। नमक मजदूरों, मछुआरों, आदिवासियों तथा अंदरूनी क्षेत्रों के लए 85 मोबाइल वैन डाक्टरी सेवाओं के लिए दी गई है। शहरी क्षेत्रों से नगर स्वास्थ्य केंद्र शुरू किए गए है।
गुजरात के मुख्यमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी का कहना है कि 'गुजरात भारत को विकास की राह पर ले जाने का साधन बन गया है।' श्री मोदी ने सचमुच इसे सच कर दिखाया है। आज गुजरात भारत के राज्यों में एक आदर्श (मॉडल) बन गया है। गुजरात में इस कदर विकास हुआ है जिसे राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय स्तरों पर मान्यता दी जा रही है। गुजरात को विश्व बैंक, संयुक्त राष्ट्र संघ, यूनेस्को, कामनवेल्थ एसोसिएशन, माइक्रोसाफ्ट, वाशिंगटन पोस्ट, भारत सरकार, योजना आयोग, प्रधानमंत्री, राजीव गांधी फाउंडेशन, इंडिया टूडे और न जाने देश में कहां-कहां से 66 एवार्ड्स/मेडल/मान्यताएं प्राप्त हो चुकी हैं। ऐसा कौन सा क्षेत्र है जहां गुजरात का नाम 'विकास' के दायरे में नहीं आता है-भूकंप प्रबंधन से लेकर देश की विरासत को संभालकर रखना, ई-गवर्नेंस से लेकर विद्युत क्षेत्र में सुधार तक, स्त्री-शिक्षा से लेकर मातृत्व स्वास्थ्य तक, नगरीय डिजाइन तैयार करने से लेकर आर्थिक स्वतंत्रता तक और यहां तक कि सर्वश्रेष्ठ राज्य से लेकर सर्वश्रेष्ठ मुख्यमंत्री तक गुजरात का भंडार श्रेष्ठतम उत्कृष्टताओं से भरा पड़ा है। इतना ही नहीं गुजरात राज्य को तो कल्याण कार्यक्रमों के मामले में भी प्रथम स्थान पर रखा गया है।
कृषि क्रांति
पिछले 5 वर्षों में जल क्रांति के साथ साथ कृषि क्रांति भी आई; अब फसल उत्पादन 9000 करोड़ रूपए से बढ़कर 34000 करोड़ रूपए तक जा पहुंचा है और उपज के हिसाब से दुगुनी हो गई है, कपास की फसल में छह गुणा वृध्दि हुई है जो 2002-03 में 23 लाख गांठों से बढ़कर 2006-07 में 123 लाख गांठ तक पहुंच गई है और इस प्रकार प्रति हेक्टेयर में 700 कि.ग्रा. की पैदावार शुरू हो गई है जो विश्व में एक रिकार्ड है। अब चीन गुजरात से 60 प्रतिशत कपास का आयात करता है। फलों और सब्जियों की उपज में भी गुजरात का स्थान सबसे ऊपर है और यहां प्रति हेक्टेयर 16 मीट्रिक टन की उपज होती है। 'भूमि से प्रयोगशाला' तक कार्यक्रम में 20 लाख किसानों को 'साइल हैल्थ कार्ड' दिए गए हैं ताकि बेहतर फसल उगाने के तरीकों की उत्कृष्ट किस्म का पता लगाया जा सके। राज्य में ड्रिप तथा स्प्रिंकलर सिंचाई को फैलाने के लिए 'गुजरात ग्रीन रेवोल्यूशन कं.' बनाई गई है। गुजरात के किसान अब दो से चार फसलों तक उपज करते हैं और इससे राज्य की जीडीपी में कृषि का हिस्सा बढ़ गया है।
बिजली में आत्मनिर्भरता
अब गुजरात बिजली में लगभग आत्मनिर्भर हो चुका है। 2002 में लगभग 2500 मेगावाट बिजली की कमी थी और 5 वर्षों के अंदर गुजरात ने सेंट्रल सेक्टर तथा प्राइवेट भागीदारी से 8100 मेगावाट से 11000 मेगावाट तक अपनी क्षमता बढ़ा ली है। 9000 मेगावाट बिजली संयंत्र और भी बन रहे हैं जिसमें एनटीपीसी/टाटा संयुक्त रूप से 4000 मेगावाट के संयत्र लगा रहे हैं। गुजरात ने 2003 में बिजी सेक्टर में सुधार का काम शुरू जिससे टी एंड डी क्षति को 45 प्रतिशत से घटा कर 23 प्रतिशत तक ले आया गया और इसे फिर से गठित किया गया। परिणामस्वरूप 2500 करोड़ रूपए की हानि वाली जीईबी में प्रोडक्शन, ट्रांसमिशन, डिस्ट्रीब्यूशन और प्रशासन के लिए 7 कंपनियां बना कर अब इसे 250 करोड़ रूपए वाले लाभकारी कंपनी बना दिया गया है। बिजली का वितरण भी उचित ढंग से होता है - कृषि को 33 प्रतिशत, उद्योग को 33 प्रतिशत तथा निवासीय/वाणिज्य/उपयोगिताओं को 33 प्रतिशत बिजली दी जाती है।
बिजली सुधार
पिछले दो वर्षों से राज्य में बिजली की कटौती नहीं होती है। किसानों को 1700 करोड़ रूपए की बिजली सब्सिडी दी जाती है जो देश में सबसे अधिक है। पांच वर्षों से बिजली की दरें बढ़ाई नहीं गई है और वास्तव में कृषि बिजली पर पिछले 20 वर्षों से चले आ रहे पुराने बिक्री कर को खत्म कर 975 करोड़ रूपए का अनुदान दिया गया और घरों तथा औद्योगिक बिजली के शुल्क में 60 प्रतिशत से घटा कर 20 प्रतिशत कर दिया गया। ज्योतिग्राम योजना के अंतर्गत राज्य के सभी 18000 गांवों को 1200 करोड़ रूपए की लागत से पिछले 4 वर्षों के रिकार्ड समय में बिजली की व्यवस्था की गई, जिससे इन सभी को 24 घंटे बिजली उपलब्ध रहती है। गुजरात ही पहला प्रदेश है, जिसने यह सब कुछ कर दिखाया है। गुजरात में प्रति व्यक्ति बिजली का प्रयोग 1313 यूनिट है जो राष्ट्रीय औसत के 700 यूनिट से दुगूना है। गुजरात को भारत सरकार ने बिजली की इस उपलब्धि के लिए 'इंडिया एक्सीलेंस एवार्ड-2005' दिया था।
गैस इंटरनेशनल बिड
गैस और पेट्रोलियम सेक्टर में गुजरात पहला प्रदेश है जिसने दहेज और हाजिरा में दो एलएनजी टर्मिनल बनाए हैं तथा दो और टर्मिनल भी बनने वाले हैं। 20 शहरों में 2000 किमी लंबी गैस पाइप लाइन से 20 लाख घरों को शीघ्र ही रसोई गैस मिलने लगेगी। गुजरात पीएसयू पेट्रोलियम कार्पोरेशन को आस्ट्रेलिया में ऑयल एक्सप्लोरेशन के लिए 3 ब्लाक तथा मिस्र में 2 ब्लाक प्राप्त हुए हैं और कृष्णा-गोदावरी बेसिन में भी 2 लाख करोड़ रूपए प्राप्त हुए हैं। गुजरात ने सभी सार्वजनिक परिवहनों के लिए सीएनजी गैस में बदलने का काम शुरू कर दिया है ताकि पर्यावरण में सुधार लाया जा सके।
स्वास्थ्य में नई खोजें
'चिरंजीवी योजना' को सिंगापुर में वाशिंगटन पोस्ट का एशियन इन्नोवेटिव एवार्ड प्राप्त हुआ है। 'बेटी वैभव आंदोलन' के कारण महिलाओं की दर प्रति 1000 पुरूष के पीछे 802 से बढ़कर 870 हो गई है। विद्यार्थियों के नि:शुल्क मेडिकल चेक अप का काम हाथ में लिया जा रहा है और उनहें डाक्टरी उपचार तथा आप्रेशन मुफ्त दिया जाएगा। 44000 आंगनवाड़ियों के 3 वर्षा से कम आयु के 10 लाख बच्चों को विटामिन ए-डी पोषाहार दिया जाएगा। विश्व बैंक की सहायता से 30000 टन प्रतिदिन मल उपचार का काम हाथ में लिया जा रहा है जिसकी प्रशंसा सुप्रीम कोर्ट ने भी की है। मेडिकल टूरिज्म की संकल्पना सफल सिध्द हुई है और अहमदाबाद में प्रत्येक अंतर्राष्ट्रीय उड़ान से विदेशी/एनआरआई रोगी यहां आते है। नमक मजदूरों, मछुआरों, आदिवासियों तथा अंदरूनी क्षेत्रों के लए 85 मोबाइल वैन डाक्टरी सेवाओं के लिए दी गई है। शहरी क्षेत्रों से नगर स्वास्थ्य केंद्र शुरू किए गए है।
रविवार, 2 दिसंबर 2007
गुजरात में विकास युग - भाग-1
लेखक-डा. भरत जरीवाला
गुजरात के मुख्यमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी का कहना है कि 'गुजरात भारत को विकास की राह पर ले जाने का साधन बन गया है।' श्री मोदी ने सचमुच इसे सच कर दिखाया है। आज गुजरात भारत के राज्यों में एक आदर्श (मॉडल) बन गया है। गुजरात में इस कदर विकास हुआ है जिसे राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय स्तरों पर मान्यता दी जा रही है। गुजरात को विश्व बैंक, संयुक्त राष्ट्र संघ, यूनेस्को, कामनवेल्थ एसोसिएशन, माइक्रोसाफ्ट, वाशिंगटन पोस्ट, भारत सरकार, योजना आयोग, प्रधानमंत्री, राजीव गांधी फाउंडेशन, इंडिया टूडे और न जाने देश में कहां-कहां से 66 एवार्ड्स/मेडल/मान्यताएं प्राप्त हो चुकी हैं। ऐसा कौन सा क्षेत्र है जहां गुजरात का नाम 'विकास' के दायरे में नहीं आता है-भूकंप प्रबंधन से लेकर देश की विरासत को संभालकर रखना, ई-गवर्नेंस से लेकर विद्युत क्षेत्र में सुधार तक, स्त्री-शिक्षा से लेकर मातृत्व स्वास्थ्य तक, नगरीय डिजाइन तैयार करने से लेकर आर्थिक स्वतंत्रता तक और यहां तक कि सर्वश्रेष्ठ राज्य से लेकर सर्वश्रेष्ठ मुख्यमंत्री तक गुजरात का भंडार श्रेष्ठतम उत्कृष्टताओं से भरा पड़ा है। इतना ही नहीं गुजरात राज्य को तो कल्याण कार्यक्रमों के मामले में भी प्रथम स्थान पर रखा गया है।
हर मामले में सर्वोत्कृष्ट
एक मामूली से संकेत से सब कुछ सामने आ जाता है। 10वीं योजना (2002-07) की अवधि में गुजरात की विकास दर (जीडीपी) सभी राज्यों में सर्वश्रेष्ठ 10.67 प्रतिशत रही जबकि लक्ष्य 10 प्रतिशत का था और स्वयं देश की जीडीपी मात्र 8 प्रतिशत रही।
योजना आयोग के अनुसार गुजरात निर्धनता उन्मूलन में सभी राज्यों में प्रथम स्थान रखता है। इस राज्य में गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों की संख्या सब से कम 15 प्रतिशत मात्र हैं। गुजरात ने दलितों के 20 सूत्री कार्यक्रम कार्यान्वयन में भी तमाम 5 वर्षों में अव्वल श्रेणी प्राप्त की है। गुजरात ही ऐसा प्रदेश है जहां सभी असंगठित मजदूरों, किसानों, विकलांगों, विद्यार्थियों, विधवाओं आदि के लिए एक लाख रूपए का दुर्घटना बीमा किया जाता है। गुजरात ही रोजगार दफ्तरों के माध्यम से रोजगार प्रदान करता है, यहां सभी राज्यों का कुल 54 प्रतिशत रोजगार का हिस्सा बना हुआ है। पिछले 5 वर्षों से मोतियाबंद के आप्रेशन में भी गुजरात ने अपना प्रथम स्थान बनाए रखा है।
ग्रामीण बुनियादी ढांचा
गुजरात में 100 प्रतिशत गांवों में 24 घंटे बिजली उपलब्ध है, 99 प्रतिशत गांवों में सभी मौसमों वाली सड़कें बनी हुई हैं जिनमें 96 प्रतिशत गांवों में पक्की सड़कें बनी हैं, 99 प्रतिशत गांवों में सार्वजनिक बस सेवा उपलब्ध है और 99 प्रतिशत गांवों में स्वच्छ पेयजल मिलता रहता है जबकि इसकी तुलना में पूरे भारत का औसत केवल 50 प्रतिशत बैठता है।
जल क्रांति
स्वतंत्रता के समय से सूखा पीड़ित तथा चिरंतन जल के अभाव वाले राज्य में अब गुजरात जल क्रांति की दिशा में बढ़ रहा है। गुजरात में 18000 चैक-बांध, 45000 बोरी बांध, 13700 फार्म पौंड और गहरी खुदाई वाले 15000 ग्राम जलाशय बनाए गए हैं। जल स्तर बढ़ा कर 121.92 मीटर किया गया है जिससे सभी गांवों को पाइपलाइन के जरिए स्वच्छ जल मिल सके। भूमिगत जल टयूबवेल 150 फीट गहरे खोदे गए हैं। अब गुजरात टैंकर मुक्त राज्य बन गया है। सूखा पीड़ित राज्य तो इतिहास बन चुका है तथा सौराष्ट्र, कच्छ और उत्तरी गुजरात से लोगों का पलायन बंद हो गया है।
नर्मदा बिजली
सरदार सरोवर बांध का कंक्रीट वाला काम पूरा हो चुका है और अब केवल 30 द्वारों को पूरा करना बांकी है। 11450 मेगावाट के दोनों बिजली घरों का काम 2004 तथा 2006 में शुरू हुआ था। सरदार सरोवर परियोजना से मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र को उनके हिस्से की 57 प्रतिशत तथा 27 प्रतिशत बिजली मिलनी शुरू हो चुकी है। सुजला सुफलां योजना लगभग पूरी हो चुकी है जिससे नर्मदा नदी से बानस नदी से प्राप्त पानी को उपशहरों तथा 4000 गांवों को दिया जाता है।
गुजरात के मुख्यमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी का कहना है कि 'गुजरात भारत को विकास की राह पर ले जाने का साधन बन गया है।' श्री मोदी ने सचमुच इसे सच कर दिखाया है। आज गुजरात भारत के राज्यों में एक आदर्श (मॉडल) बन गया है। गुजरात में इस कदर विकास हुआ है जिसे राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय स्तरों पर मान्यता दी जा रही है। गुजरात को विश्व बैंक, संयुक्त राष्ट्र संघ, यूनेस्को, कामनवेल्थ एसोसिएशन, माइक्रोसाफ्ट, वाशिंगटन पोस्ट, भारत सरकार, योजना आयोग, प्रधानमंत्री, राजीव गांधी फाउंडेशन, इंडिया टूडे और न जाने देश में कहां-कहां से 66 एवार्ड्स/मेडल/मान्यताएं प्राप्त हो चुकी हैं। ऐसा कौन सा क्षेत्र है जहां गुजरात का नाम 'विकास' के दायरे में नहीं आता है-भूकंप प्रबंधन से लेकर देश की विरासत को संभालकर रखना, ई-गवर्नेंस से लेकर विद्युत क्षेत्र में सुधार तक, स्त्री-शिक्षा से लेकर मातृत्व स्वास्थ्य तक, नगरीय डिजाइन तैयार करने से लेकर आर्थिक स्वतंत्रता तक और यहां तक कि सर्वश्रेष्ठ राज्य से लेकर सर्वश्रेष्ठ मुख्यमंत्री तक गुजरात का भंडार श्रेष्ठतम उत्कृष्टताओं से भरा पड़ा है। इतना ही नहीं गुजरात राज्य को तो कल्याण कार्यक्रमों के मामले में भी प्रथम स्थान पर रखा गया है।
हर मामले में सर्वोत्कृष्ट
एक मामूली से संकेत से सब कुछ सामने आ जाता है। 10वीं योजना (2002-07) की अवधि में गुजरात की विकास दर (जीडीपी) सभी राज्यों में सर्वश्रेष्ठ 10.67 प्रतिशत रही जबकि लक्ष्य 10 प्रतिशत का था और स्वयं देश की जीडीपी मात्र 8 प्रतिशत रही।
योजना आयोग के अनुसार गुजरात निर्धनता उन्मूलन में सभी राज्यों में प्रथम स्थान रखता है। इस राज्य में गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों की संख्या सब से कम 15 प्रतिशत मात्र हैं। गुजरात ने दलितों के 20 सूत्री कार्यक्रम कार्यान्वयन में भी तमाम 5 वर्षों में अव्वल श्रेणी प्राप्त की है। गुजरात ही ऐसा प्रदेश है जहां सभी असंगठित मजदूरों, किसानों, विकलांगों, विद्यार्थियों, विधवाओं आदि के लिए एक लाख रूपए का दुर्घटना बीमा किया जाता है। गुजरात ही रोजगार दफ्तरों के माध्यम से रोजगार प्रदान करता है, यहां सभी राज्यों का कुल 54 प्रतिशत रोजगार का हिस्सा बना हुआ है। पिछले 5 वर्षों से मोतियाबंद के आप्रेशन में भी गुजरात ने अपना प्रथम स्थान बनाए रखा है।
ग्रामीण बुनियादी ढांचा
गुजरात में 100 प्रतिशत गांवों में 24 घंटे बिजली उपलब्ध है, 99 प्रतिशत गांवों में सभी मौसमों वाली सड़कें बनी हुई हैं जिनमें 96 प्रतिशत गांवों में पक्की सड़कें बनी हैं, 99 प्रतिशत गांवों में सार्वजनिक बस सेवा उपलब्ध है और 99 प्रतिशत गांवों में स्वच्छ पेयजल मिलता रहता है जबकि इसकी तुलना में पूरे भारत का औसत केवल 50 प्रतिशत बैठता है।
जल क्रांति
स्वतंत्रता के समय से सूखा पीड़ित तथा चिरंतन जल के अभाव वाले राज्य में अब गुजरात जल क्रांति की दिशा में बढ़ रहा है। गुजरात में 18000 चैक-बांध, 45000 बोरी बांध, 13700 फार्म पौंड और गहरी खुदाई वाले 15000 ग्राम जलाशय बनाए गए हैं। जल स्तर बढ़ा कर 121.92 मीटर किया गया है जिससे सभी गांवों को पाइपलाइन के जरिए स्वच्छ जल मिल सके। भूमिगत जल टयूबवेल 150 फीट गहरे खोदे गए हैं। अब गुजरात टैंकर मुक्त राज्य बन गया है। सूखा पीड़ित राज्य तो इतिहास बन चुका है तथा सौराष्ट्र, कच्छ और उत्तरी गुजरात से लोगों का पलायन बंद हो गया है।
नर्मदा बिजली
सरदार सरोवर बांध का कंक्रीट वाला काम पूरा हो चुका है और अब केवल 30 द्वारों को पूरा करना बांकी है। 11450 मेगावाट के दोनों बिजली घरों का काम 2004 तथा 2006 में शुरू हुआ था। सरदार सरोवर परियोजना से मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र को उनके हिस्से की 57 प्रतिशत तथा 27 प्रतिशत बिजली मिलनी शुरू हो चुकी है। सुजला सुफलां योजना लगभग पूरी हो चुकी है जिससे नर्मदा नदी से बानस नदी से प्राप्त पानी को उपशहरों तथा 4000 गांवों को दिया जाता है।
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